Tuesday, June 2, 2020

कोरोना मेेरी मान.. कविता



 कोरोना मेेरी मान..

क्या सोचा था तुम बहुत खुश होगे यहां आकर
हां हम मेहमान ही नहीं अतिथि का भी स्वागत करते हैं

बिगड़ें अगर वो किसी वजह से तो हाथ जोड़  मनाते है
घर आये कि इज्जत खातिर तो हम पैरों भी पड़ जाते हैं

तुमने सोचा होगा ये बेवकूफ हैं, इनसे ही पेच्चे लड़ाते हैं
हमने ढ़ील देकर ऊपर बैठा लिया, अब सद्दी तक ले जाते हैं

कटेंगे कन्ने से कनकव्वे, पंख जो तेरे फड़फड़ाते हैं
तुम ने सोचा होगा यहाँ भाई-भाई आपस में लड़ रहे हैं

यहां मेरा सही काम बन जायेगा
खुद ही आपस में लड़ रहे हो तो मुझसे कौन लड़ेगा

इतिहास एक पढ़ लेता बावले
कि जब भी बाहरी विपदा आई है
हम एक साथ खड़े हो जाते हैं

अब तुम्हारी यात्रा का अन्तिम पड़ाव है।
यहां तो डाक्टर ही जुगाड़ ऐसा बेठा देते हैं

कि बिमारी हो कैसी भी जड़ से खा जाते हैं
कोरोना, मेरी मान, अभी भी  निकल ले पतली गली से..


3 comments:

  1. Bahut achhe! Thanks to all the doctors, nursing officers and all workers working day and night for our safety

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    1. आपकी बात को सही ठहराते हुए केवल यहीं कहूंगा कि कोरोना अब भी वक्त है भाग जा..

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