Thursday, January 31, 2019

वास्तव में


29.01.2019
वास्तव में

जीवन में यूँ ही सब कुछ चलता रहता है, हमें लगता है कि मैं कर रहा हूँ, हकीकत क्या हैसही वक्त आने पर ही सभी काम पूरे होते हैं, जैसे समय आने पर ही वृक्षों पर फल-फूल आते हैं, मौसम बदलते हैं, जन्म एवं मृत्यु होती है। ये सोचना कि मैने एैसा किया तो वैसा हुआकहीं एैसा तो नहीं जो होना होता है वो ही होता है,

कभी कभी कुछ और ही मंजूर होता है जिसके बारे में हम कल्पना भी नहीं कर सकते, शायद इसीलिये ही हम ये कहते हैं, कि उसे तो उम्मीद से कहीं ज्यादा मिल गया अथवा जब बुरे दिन आये तो चारों दिशाओं से एक साथ आ गये, कोई जीना चाहता है उसे अपने पास बुला लेता है तो कोई मरना चाहता है उसे मौत नही आती, ऐसा क्यों होता होगा।
 अपने जीवन में  कर्म का फल-प्रतिफल , (एक्शन रिएक्शन सिद्धान्त ) हम सभी को भलीं भांति पता है। आज जो कर्म कर रहें हैं उसका फल हमें भोगना ही होगा ये कटु सच्चाई है अब नहीं तो दुसरे जीवन में हमें सदा ये विदित रहे कि कर्म का फल निश्चित ही मिलेगाइसमे तनिक भी संदेह करना नहीं चाहिए। 

बहुत सी ऐसी बातें हैं बताने को जो हमें यह सोचने के मजबूर करती हैं कि जैसा करोगे वैसा ही भरोगे, एक बात याद आ रही है जोकि मुझे स्वयं उसी ने बताई जिसके साथ धोखा हुआ, व्यक्ति को उसी के दोस्त ने धोखा दिया जिसे वह अपना बचपन का दोस्त समझता था उसे एक मजिंल रहने के लिए दे दी, कई सालों बाद उसने उस घर को कब्जा लिया, ये बात मुझे स्वयं उस पीड़ित व्यक्ति ने बताई, कुछ सालों बाद मुझे फिर वही व्यक्ति मिले मैने पुछा कि आपके साथ जो धोखा हुआ था आप कह रहे थे कि सिविल केस दायर करुंगा, क्या हुआ आगे? उसने कहा कि मैनें कई साल कोर्ट कचहरी के चक्कर काटे मेरे पास सारे सबूत होते हुए भी केस खत्म नहीं हो सका, तो थक हारकर समझौता किया, अतं में मुझे समझ गया कि इतने सालों से जो ये दुख भोग रहा हूँ वह दुख मेरे ही कर्मों का फल है, मैने जानना चाहा, कौन से कर्मो का फल? तो उसने कहा, मैनें भी अपने पराये सभी को बहुत धोखा दिया था  उसके लिये मैं ही जिम्मेदार हूँ उनका हक मारा था, जिसका फल मुझे मिला, मैं हैरान था कि आजकल ऐसे भी लोग हैं जो अपनी गलती को स्वीकारतें हैं। ऒम शान्ति 

Monday, January 28, 2019

दिन और रात

दिन और रात

28.01.2019

जन्म से लेकर मृत्यु तक जीवन का सफर , यूँ कहें कि रात के बाद दिन और दिन के बाद रात अनवरत चलता रहता है ना कभी थकता है ना कभी रुकता है रोज वही सूरज निकलता है जो तब  निकलता था, वही चाँद तारे, कुछ बदला ही नहीं लगता, लगता है मानों कल ही की बात हो ।

लेकिन बीते समय को निहारुँ तो लगता है कि जाने कौन सी दुनिया से आये हैं उस समय और इस समय में दिन रात का अन्तर हो गया है। कहाँ गये वो दिन जब सब नया सा लगता था, दोस्तों के साथ हंसी -ठठ्ठा होता था,खुब आनन्द आता था। देखते देखते सभी साथियों के बाल सफेद हो गये, चेहरे की चमक कम हो गई, आँखों के नीचे झुरियाँ दिखाई देने लगीं और जोड़ों का दर्द भी सताने लगा। कुछ दोस्तों को उच्च रक्तचाप हो गया तो कई दोस्तों को मधुमेह ने घेरा हुआ है, सभी मोटे से हो गये,  कोई पतला हो गया है शायद आनुवांशिक असर हो।

गये जमाने के सारे सुख के आगे आज के सुख  फीके से लगते हैं, जाने ये सभी को लगता है या फिर मुझे ही ऐसा  लगता है। आज घर में सारे सुख साधन हैं लेकिन माँ का प्यार नहीं है। रुपये पैसे हैं लेकिन सच्चा यार नहीं है। कभी लगता है कि कोई ताकत तो है जिसके आगे हम सभी कठपुतली की तरह नाचते रहते हैं। किसी शायर ने क्या खूब कहा है,
                                    "कौन किसका हबीब होता है, कौन किसका रकीब होता है,
                                    यूँ तो बन जाते हैं रिश्ते-नाते जिसका जैसा नसीब होता है"। 

इस  दुनिया में कौन  दुश्मन हो जाये और कौन प्यारा ,  कहा नही जा सकता । जर, जोरु और जमीन,  इन तीनों के लिए झगड़ा होता है,  बरसों बरस के बहुत प्यारे रिश्ते भी पल भर में टूटते देखें हैं इनके कारण, अलग ही दुनियादारी की एक तसवीर सामने आती है,  बात जो  समझ आई वो ये कि किसी भी रिश्तेदार का आँख मूंद कर विश्वास  नहीं करना चाहिये चाहे कितना ही प्यारा हो, ये दुनिया है प्यारे  कुछ भी हो सकता है । ऒम शान्ति

       

Friday, January 25, 2019

रिश्ते-नाते

रिश्ते-नाते

24.01.2019


ये बात (1980-85) की है जब सभी बच्चे क्रिकेट,(बैट-बाल) गुल्ली डंडा, पिठ्ठू, स्टापू, लुका-छिप्पी इत्यादि खेलों के बहुत शौकीन थे, ना घर में टी.वी.,  टेलीफोन था ना ही फ्रीज़ आदि घर में कुछ ही चीजें होती थी जैसे  पलंग (दिवान), दो चार कुर्सीयां, मुढ्ढे, बक्सा, सन्दूक वगैरह और रसोई में अंगीठी, स्टोव  सिलबट्टा, हमाम-दस्ता जैसी बहुत सी चीजें हुआ करती थी,  कभी कोई घर आता तो  मन ये सोचकर खुशी से नाच उठता  कि मेरे लिए कुछ मिठाई, खिलोने या नये नये कपड़े आयें होगें।  मेरे परिवार के सदस्य  दिन भर आवभागवत में लगे रहते,  ओर मैं बच्चों के साथ खेलते रहता,  जब मुझे प्यास या भूख लगती तो में घर आता और माँ  पिताजी मुझसे कहते की राजा बेटा कहाँ गया था, देख तेरे  मामा मामी या चाचा जी,  ताऊ  जी तेरे लिये कितना अच्छा खिलोना या चीज लायें है।

       गाँव से चाचा जी, ताऊ जी देशी घी का चूरमा ,नूणी घी, सीत,(लस्सी) गरमियों में पील(अगूँर की तरह दिखता था लेकिन अलग ही स्वाद होता था), कचरी आदि लाते और गाँव में किसी का शादी ब्याह होता तो किसी न किसी के हाथ वो मिठाई जरुर घर आती थी, जिसमॆं पारम्परिक  जलेबी, लड्डू, इमरती, कभी कोई सुहाली लेकर आता एक बार तो कोई गुलगुले ही लेकर आ गया था  कभी घेवर, जोये(सेवियाँ) खाने को मिलतीं, सांठी, पवांड, संरसों की डाकलें, सरसों का साग, चने की टाट,बाजरे की सिरटीयां, गुड़, और भी कई प्रकार की चीजें लेकर आते थे सभी  रिश्तेदार।

      समय के साथ साथ रिश्ते नाते भी कहीं खो से गये, एैसा लगता है, आपसी भाईचारा, रिश्ते-नाते धीरे धीरे कम होते जा रहें हैं, कोई किसी के घर  तभी जाता है जब बेहद जरुरी काम हो  वरना यूँ ही मिलने-मिलाने वाले दिन तो बहुत पहले से गये।

        दरअसल,  मीडिया भी हमे रिश्तों से दूर कर रहा है क्योंकी हम उसी दुनिया  में जीने लगे हैं आमने सामने बात होती ही कहाँ है आजकल,  इसलिए  रिश्तों में पहले वाला प्यार प्रेम नही रहा, सभी के पास सारी सुख सुविधाएं हो गई हैं इसलिये औरों की जरुरत बेहद कम हो गई है। ऒम शान्ति

   




Tuesday, January 22, 2019

मेहनत और समय



23/01/2019
मेहनत और समय 
जब  कभी समस्याओं से घिरा हूँ तब समय का एक एक पल कई साल के बराबर लगा, लेकिन जब समय अच्छा आया तो कई दिन- महीेने भी कुछ पल भर लगे। क्या ये समय कभी तेज तो कभी धीरे-धीरे चलता है, आप कहेंगे की क्या कभी समय भी अपनी गति कम ज्यादा करता है गंभीर प्रश्न... चिन्तन अवश्य कीजियेगा... 
जो समय बचपन एवं जवानी में  ठहरा सा लगता था आज दिन महीने साल जल की तेज धारा की तरह बहा जा रहा है।

           जिंदगी बहुत छोटी है, जो हमसे अच्छा व्यवहार करें उन्हे दिल की गहराई से शुक्रिया कहो ओर बाकि के बारे में कभी भी बुरा मत सोचो, ये जीवन सही से जीने की कला है।  हमारी जरुरत कितनी हैं? और हमारी अगली पीढ़ी की  जरुरत कितनी होंगी कहा नही जा सकता इसलिए जो आप से आसानी से बन पड़े उतना ही संचय करें,  आप केवल अगली पीढ़ीयों के लिए ही मर-खपने के लिए इस दुनिया में आये हो क्या? क्या कभी सोचा है कि आपके दादा -दादी या पड़दादा पड़दादी ने कितनी शान्ति से जीवन  बिताया होगा, वे यकीन करते थे कि परमात्मा या ईश्वर के फैसले हमेशा ख्वाहिशों से बेहतर होते हैं। कभी उनके बारे में सोचते हो क्या? वे कैसे जीवन यापन करते होंगे कितनी दुख तकलीफों को सहा होगा हम सोच भी नहीं सकते उनके जीवनशैली के बारे में,  उन्हे ज्ञान था  "क्यों करते हो गुरुर अपने चार दिन के ठाठ पर, मुठ्ठी भी खाली रहेंगी जब पहँचोगे घाट पर.."  इसलिए उनके द्वारा बहुत कम ही आपके लिए संचित सम्पत्ति  मिली होगी ये तो सच है, है कि नहीं? लेकिन हम अपने और बच्चों के लिए मशीन हुए जा रहें हैं,  इस दौड़ का कोई अन्त नहीं है प्यारे। 

           समय का कुछ पता नहीं है कि अगले पल क्या होगा,  कोई क्या करेगा  कौन जान सकता है भला ! उन्हे मेहनत और समय की कीमत समझ आये  ये जरुरी है, अन्यथा जीवन में अनेक मुश्किले मुह बाहें खड़ी हैं।
ऒम शान्ति


 
















सर्वप्रथम, ब्लॉग से  अवगत कराने के लिए भाई उन्नीकृृष्णन को अनेक धन्यवाद। यह सुखद अनुभव है कि मुझे अपनी दिल की बात इस प्लेटफार्म पर कहने का मोका मिल रहा है।सभी पाठकों को मेरा हाथ जोड़कर प्रणाम, अभिनन्दन।

दिनांक 22.01.2019
राजेश कुमार पूनिया,
आज हमे सब तरफ एक अनुभव होता है चाहे घर, दफ्तर, स्कूल, कॉलेज, बाज़ार, गांव , शहर या कोई भी जगह हो, कुछ ना कुछ ईच्छा सदैव बनी रहती है, शायद एक जगह है जहां कुछ देर के लिए हम  ये कहते हैं कि "सब कुछ मिथ्या है" मन का ये भाव क्षण भर के लिए हमें संसार की हकीकत  से रुबरु करा देता है ज्यों ही हम उस जगह से दूर होतें हैं जाने कैसे मन जगह-जगह डोलने लगता है। कई बार लगता है कि दुनिया में उस एक चीज के बिना रहा ही नहीं जा सकता, क्या कभी आपने सोचा है की वो कोन सी चीज है । शायद आपका जवाब होगा धन- दौलत, मगर  में बात कर रहा हुँ किसी ओर की क्या है वह फिर से सोचो जरा।

हमें जो सदा ईच्छा है वह है आनन्द की , हम सभी आनन्द की तलाश में सारा समय बिता देते हैं कभी हम खुश हुए कभी दुखी हुए यूँ ही सारा जीवन निकल गया लेकिन वो आनन्द नहीं मिला जो सदा बना रहे लगता है कि वो सारी इच्छायें फिजूल थीं, जिन्हे ढूंढा किये।  जब हम बच्चे हुआ करते थे उन दिनों हमें मां के हाथ की सारी चीजें परम सुख एवं आनन्द देती थी जबकि हमें धन-दौलत क्या है पता भी नहीं था, सवाल उठता है तो क्या हमें वह आनन्द केवल मां के वात्सल्य के कारण मिला या जो माँ हमें नो महीने अपने कोख में रखती है उस सम्बन्ध को हम सदा महसुस करते रहते हैं इसी कारण हम सभी अपनी माँ को ताउम्र याद करते रहते हैं इस दुनिया को सदा सदा के लिए छोड़ जाने के बाद भी शायद यही कारण है कि हमें अपनी माँ का स्मरण मात्र होने से ही एक नई सी दुनिया का नजारा होने लगता है उन दिनों की याद करके मन भर सा जाता है जबकी हमें पता है कि अब वह नही आयेगी क्योंकी एक बार वहाँ जाने वाला कहां कोई आया है।

मेरे दोस्तो, प्यारो सुनो आज जिसे भी माँ रुपी आनन्द  सुख मिल रहा हो अपने को धन्य मानना क्योंकी जब कभी यह माँ का आनन्द नहीं होगा, तब आप जान पायेंगे कि मै सही कह रहा हुँ। इसलिये आज ही अपनी माँ की देह को थो़ड़ा सा गुदगुदाना थोड़ा हाथ पावं दबाना और गोद में बैठकर वही आनन्द का अनुभव करना जो आप अपने बचपन में करते थे फिर देखिये कैसे आपके घर में आनन्द का डेरा बसेरा करने लगेगा। ऒम शान्ति