Tuesday, May 7, 2019

ड्यूकी


ड्यूकी

घर के पास बने एक सामुदायिक केन्द्र में एक कुतिया ने बच्चे दिये। सारे बच्चे देखने लायक थे। किसी के माथे पर सफेद टीका था, कोई बिलकुल भूरे रंग का था, किसी के काले सफेद चतके, कोई चितकबरा कोई बिलकुल काला। कुल आठ बच्चे दिये थे। उस दिन बच्चों ने मुझसे पप्पी घर लाने की इतनी जिद की, के हारकर मुझे उन्हें कहना ही पड़ा कि पिल्ले अभी आठेक दिन के ही हैं जब थोड़े बड़े हो जाएंगे तो एक पिल्ला ले आऊंगा घर। बच्चे, खुश होकर मुझसे लिपट गये। समझ में नहीं आया कि मुझे तो कुत्तों से कितना डर लगता था लेकिन, ये तो बिलकुल भी नहीं डरते।

दोनो बच्चे आज बहुत खुश थे, घर पहुंचते ही अपनी मां को सारी बात कह सुनाई कि पापा हमारे लिए कुछ दिन में एक पप्पी (पिल्ला) लायेंगे। लेकिन उनकी मां को इस बात से सख्त नाराजगी थी कि छोटे से घर में पिल्ला पाला जाये। तुम दोनों, एक तो अपना ही सामान, किताबें यहां वहां बिखराये रहते हो ऊपर से उसकी और साफ-सफाई करो। आप ये बताओ कि ये नया पंगा क्यों मोल ले रहे हो? आप को पता है कि एक बार हमारे बच्चे को कुत्ते ने काटा था तो कितने इन्जेक्शन लगवाने पड़े थे। मैनें उन्हे समझाया कि पड़ोस में ही कुतिया ने कई बच्चों को जन्म दिया है। वहीं से एक पिल्ला ले आऊंगा, मैं कोई खरीद कर नहीं ला रहा।

बच्चों में मायूसी सी छा गई। सभी चुप हो गये। मैनें कहा इनकी कोई गलती नहीं है। मैनें ही पिल्ला लाने के लिए कहा था। तुम चिन्ता मत करो, बच्चों ने कहा है कि वे खुद ही उसकी देखभाल करेंगे। अभी तक खुद से खाना आता नहीं है, उसे कैसे खिलाएगें? तुम चिन्ता मत करो। हमारी पत्नी ने कहा क्यों बच्चों के साथ-साथ आप भी जिद कर रहे हैं? उसे कौन संभालेगा? घर से बाहर निकलो तो अनेक कुत्ते दिखते हैं जहां भी जाओ आवारा कुत्तों की भरमार है। इन्हें घर में लाने की क्या जरुरत है, जो कुछ खिलाना है घर के बाहर ही दे दो। मुझे पत्नी की बात तो एकदम ही सही लग रही थी। मगर क्या करें बच्चों के आगे मेरी एक न चल रही थी। पत्नी ने कहा मुझे पता है दो-चार दिन तो सभी उसका ख्याल करोगे। फिर सिर्फ मेरे लिए मुसीबत बनेगी। बच्चों ने हमारी बात सुनी तो वे एक साथ बोले मां जी आप को बिलकुल भी चिन्ता करने की जरुरत नहीं है। हम ही उसे घुमाने ले जायेंगे, उसकी सारी देखभाल करेंगे। बस आप हां कह दो, प्लीज, प्लीज। मां का ह्र्दय मिनट में पिघलता है, ये बात भली-भांति पता थी बच्चों को। जैसे ही उन्हें अपनी मां की इजाजत मिली वे पूरे घर में किलकारियां मार के खुश होने लगे।

अगले कुछ दिनों बाद मेैं एक पिल्ला, जिसे पहले ही पसंद कर आया था लेने गया। वहां अब केवल पांच ही पिल्ले बचे थे। हमारी अच्छी किस्मत थी कि जिसे पसंद किया था वो अभी भी वहां पर खेल रहा था। वह बहुत भूरे रंग का था, उसके माथे पर एक सफेद निशान था। कुछ इंतजार के बाद मैनें पिल्ले को अपने पास बुलाया, धीरे धीरे उसे पीनट बटर खिलाया तो वो मेरे पीछे-पीछे हो लिया। घर लाते ही बच्चे खुशी से पागल हो गये। बच्चों ने ही उसका नाम ड्यूकि फाईनल किया। ये आलम तो तब था जब ये पिल्ला देशी नस्ल का था, यदि किसी खास नस्ल का होता तो क्या होता, समझ से परे है। सप्ताह भर में ही वह हमें पहचानने लगा। हर शाम को घर पहुंचते ही वो हमें देखते ही दौड़ कर आता और हमारे पैरों में लिपट जाता। वह झूमता, पूँछ हिला-हिला के हमें अपनी खुशी का अहसास कराता, ऐसे लगता कि वह हमारा ही इन्तजार कर रहा हो। उसे दोनो समय बाहर घुमाने की जिम्मेदारी अब मेरी थी, क्योंकि बच्चों के इम्तहान शुरु होने वाले थे। हमारी वाईफ ने पप्पी को नहलाते हुए हंसकर कहा कि देखा मैनें पहले ही कहा था, कि मुझे ही देखभाल करनी पड़ेगी। बावजूद गुस्से के उन्हे नन्हा सा पप्पी बहुत प्यारा लगता।

जब दस-पन्द्रह दिन में ही वह इतना प्यारा लगने लगा, कि थोड़ी देर के लिए यदि न दिखे तो उसकी कमी बच्चों के साथ-साथ हमें भी खलने लगती थी। उसकी पसंद की चीजों में फल व सब्जियों के अलावा दूध व ब्रैड ज्यादा थीं। वह पपिता, केला, आम इत्यादि और कई सुखी सब्जियां बड़े चाव से खाता था। हम शाकाहारी थे, इसलिए वह भी वैजिटेरियन बन गया। वह जब बिमार पड़ता तो उसे तुरन्त डॉक्टर के पास ले जाता। एक बार दस्तों की वजह से दो दिन उसे एडमिट कराना पड़ा, तब ठीक हो पाया। यकायक, ये ख्याल आया कि वो एक जानवर ही है, फिर भी वह हमें और हम उसको देखे बिना रह नहीं पाते। हम लोग आपस में क्यों नहीं प्यार से रह सकते? जब हम जानवरों तक को इतना प्यार करने लगते हैं। हमें क्या हो गया, क्यों एक-दूसरे को दुश्मन समझने लगे? एक पिल्ले से इतना प्रेम और इन्सान आपस में एक दूसरे के खून के प्यासे हैं। लोगों को गाली देते सुना है कि, कुत्ता कहीं का। कुत्ता तो बहुत अच्छा है।

ड्यूकी के गले में एक सतरंगी पट्टा डाल दिया था। वह शुरु के दिनों में पट्टे को काटने की बहुत कोशिश करता लेकिन हर बार विफलता ही मिलती। जब चार-पांच दिनों तक उसे रोज सुबह-शाम गले में पट्टा बांधकर साथ घुमाया, तो पट्टे की आदत हो गई। जब कभी किसी की तबीयत खराब होती तो वह भी उदास रहता और बिना कुछ खाये-पिये एक कोने में चुपचाप बैठा रहता। उसकी आंखें थोड़ी नम सी हो जाती। वह सब समझता था कि हम दुखी हैं उसकी ये बेचारगी ही थी कि कुछ कह नहीं पाता, लेकिन हम उसका दुख बखूबी समझते थे।

एक सुबह हर रोज की तरह मैनें उसे पट्टे के साथ ही घर के आगे ही एक पार्क में छोड़ दिया। कुछ देर बाद जब मैनें उसे गैलरी से आवाज दी तो वह कहीं नजर नहीं आया। मुझे लगा कि यहीं-कहीं घूम रहा होगा। जब कई आवाजों के बाद भी मुझे वह दिखाई नहीं दिया तो मेरे मन में ख्याल आया कि कहीं कोई ले तो नहीं गया उसे। मैंनें फोरन पार्क व आस-पास की जगह दौड़-दौड़ कर ढूढ़ना शुरु किया। मेरी सांसें फूलने लगी थी। ऐसा लग रहा था मानों किसी ने बहुत गहरा आघात दे दिया हो। पैरों की ताकत क्षीण हो गई थी। मैनें घर पर फोन किया तो पत्नी ने कहा कि उसे कौन ले जायेगा, देशी नस्ल का है, आराम से देखो वहीं कहीं घूम रहा होगा। मैं थोड़ा प्रेक्टिकल होकर बिना ज्यादा चिंता किये उसे दोबारा ढूढ़ने में जुट गया। मैनें अपने स्कूटर से कॉलोनी के कई चक्कर लगाये लेकिन वो प्यारा सा पिल्ला कहीं नजर नहीं आया। समझ में नहीं आ रहा था, कि इतनी सी देर में कैसे गायब हो गया? एक शक-सुबा होने लगा कि कहीं उसे किसी ने अच्छी नस्ल का समझ कर अपने घर में ना छिपा लिया हो। थक हारकर भी कहीं नहीं नजर आया, तो मेरे दिल में एक अजीब सी उदासी छाने लगी। वह थोड़ी ही देर पहले तो मेरे साथ खेल रहा था। हे भगवान, क्यों तू इतना कठोर हो गया? मेरी दिल की पुकार सुन प्रभु, वह झाड़ी से या किसी के घर से निकलते दिख जाये बस। मैं फिर कभी अकेला ना छोड़ुंगा उसे। मेरी नजर चारों और यूँ फिरती मानों कस्तूरी की खोज में मृग हो जैसे। कुछ न सूझता था कि जब स्कूल से बच्चे आयेंगे तो उन्हे कैसे समझाऊंगा। वे मुझे कभी माफ नहीं करेंगे। उनकी इतनी छोटी सी इच्छा को में संभाल नहीं पाया। मुझे अब एक ही बात समझ आ रही थी कि पास ही के थाने में जाकर रपट लिखा दूँ।

एक कागज पर ड्यूकी के हुलिये व उसकी नस्ल की जानकारी देते हुए उसकी गुमशुदगी की ख़बर एक पुलिस अधिकारी को देने चला गया। वहां बैठे अधिकारी ने शुरु में तो दिलचस्पी दिखाई लेकिन बाद में कोई खास तवज्जों नहीं दी, शायद, ड्यूकी की देशी नस्ल (ब्रिड) आड़े आ रही थी। उन्होनें पाठ पढ़ाना शुरु कर दिया कि ऐसे कुत्ते तो हजारों मिल जायेंगे। आप और लेकर पाल लो, क्यों अपना और हमारा समय नष्ट कर रहे हो। मैनें कहा कि आप नहीं जानते वो बहुत ही ज्यादा प्यारा था। मेरे बच्चों को ये जानकर बहुत गहरा दुख होगा, मैनें कहा, प्लीज कुछ तो करिये। उसने मेरी प्रार्थना पत्र की कॉपी पर एक गोल स्टांप मार कर मुझे देते हुए कहा, भाई-साब आप तो ऐसे कह रहे हो कि हमने ही आपका पिल्ला रख रखा हो, कि दे दिया लाकर एक सैकिंड मैं। एक बच्चे की फोटो दिखाकर बोले, अब ये बताओ कि ये बच्चा है पिछले 15 दिन से गायब है, पहले इसे ढुंढू या आपके पिल्ले को, आप बताओ? मैं कुछ कह पाता इससे पहले वो कहने लगे, हमारी बात तो समझना नहीं चाहते हो आप। दिल्ली बहुत बड़ा शहर है, अब कहां मिलेगा आपका ड्यूकी। एक लंबी और गहरी सांस भरकर मैं वहां से उतना ही निराश होकर निकला, जितना पिल्ले के खो जाने से हुआ था।

अब तक सुबह के दस बजने वाले थे, गोया, दफ्तर से भी फुरसत का जी चाह रहा था। किसी काम में मन नहीं लग रहा था। रह रहकर ये बात मन को कचोटती कि काश मैनें उसे अकेले नहीं छोड़ा होता। जब घर पहुंचा तो पत्नी कि आंखे उदास व रुआंसी लग रही थी। बस शाम तक उसी की बातें होती रहीं और चाय के सिवा कुछ भी गले से नहीं उतरा।

दौपहर में बच्चों ने डोर बैल बजाई, वे जोर जोर से बैल बजा रहे थे, क्योंकि ड्यूकी बैल की आवाज सुनकर दौड़कर गेट पर आता था। वह भी जानता था कि इस समय कौन आते हैं। जो उसके साथ घन्टों मोज –मस्ती करते हैं। मैनें ही दरवाजा खोला तो वे मुझे देखकर बोले पापा आज दफ्तर नहीं गये। क्या तबीयत ठीक नहीं है आपकी? मैं कुछ कहता इससे पहले, उन्होंने पुछा कि ड्यूकी कहां हैं आज गेट पर नहीं आया। दोनों ने एक स्वर में जोर से आवाज दी ड्यूकी, ड्यूकी। हमसे कुछ भी नहीं कहा जा रहा था बस चुप रहे। दोनो ने पुछा कि बात क्या है कहां है ड्यूकी? जब सारी बात बताई तो मेरे बेटे ने रोना शुरु कर दिया वह चुप ही नहीं हो रहा था। बेटी ने अपने दिल की पीड़ा छिपाते हुए अपने भाई को समझाना शुरु किया कि अभी रोना बंद कर, नहीं तो, कल के इम्तिहान की तैयारी नहीं कर पायेगा। बेटे के मन में कुछ और ही चल रहा था कुछ देर बाद बेटे ने कहा कि हमें वैसा ही पप्पी लाकर दो नहीं तो हम आप से बात नहीं करेंगें। कई बार समझाने पर भी वह अपनी जिद पर अड़ा हुआ था। हर बात पर एक ही रट रहती कि पहले हां कहो नहीं तो मैं नहीं खाता, मैं नहीं मानता। बेटे ने एक नया सरदर्द मुझे कई दिन तक दिये रक्खा। तकरीबन पांच दिन बाद मुझे ये ख्याल आया कि उसी जगह से दुसरा पिल्ला ले आता हूँ, कम से कम बेटे का मन रह जाएगा। मैं थोड़ी देर में उसी जगह पहुँच गया। मुझे ये देखकर बहुत हैरानी और खुशी हुई कि जिसे मैं हर जगह खोज रहा था वह तो अपनी मां का दूध पी रहा था। उसके गले मैं पट्टा अभी भी बधां हुआ था। क्या अदभुत नजारा था। क्योंकर मैंने उसे उसकी मां से अलग करने का विचार किया था? हाय, अपनी मां से ये विरह उसने किस तरह काटा होगा। गले का पट्टा, गले का फंदा नजर आ रहा होगा, यही सोचकर मैने उसे पट्टे रुपी फंदे से मुक्त कर दिया।

उसी शाम, मैंने पत्नी व बच्चों को कहा कि आओ देखते हैं कि कोई और पिल्ला मिल जाये तो ले आना वहीं से। वास्तव में, मेरे मन में पिल्ला लाना नहीं, बच्चों को समझाना भर था। जब हम वहां पहुंचे तो बच्चे व पत्नी देखकर हैरान हो गये कि ड्यूकी वहीं खेल रहा था। जैसे ही हम उसके पास जाने लगे, उसकी मां हमें घूरने लगी। मेरे बेटे को ये बात समझ आ रही थी कि वह अपने बच्चे को अलग नहीं होने देगी। मैंने कहा बेटा जैसे हम अपने बच्चों से प्यार करते हैं, ये भी अपने बच्चों से उतना ही प्यार करते होंगे। मेरे बच्चों ने कहा कि पापा आप सही कह रहे हो। हमें उन्हे एक-दूसरे से अलग नहीं करना चाहिये। हमें ये खुशी थी कि वह कहीं खोया नहीं था, बल्कि अपने परिवार के साथ ही था।  

Thursday, May 2, 2019

आदत से मजबूर हैं


राजेश कुमार पूनिया
आदत से मजबूर हैं। (स्वच्छता पर लघु नाटक)

जगबीर- (पान खाते हुए) भोला सुनो, ये कुड़ा करकट कब उठाओगे, और ये पतझड़ में गिरे पत्ते  क्या यहीं सूख जाएंगे। सफाई क्यों नहीं करते हो? महीने में आ जाते हो रुपये लेने।

भोलानंद- जी वो कल ही उठा दूगां। अब पतझरिया में हर और पत्ते ही पत्ते बिखर जाते हैं। कोई कितना साफ करे।

जगबीर- देखो याद करके उठा लेना, बता दिया तुमको।

भोलानंद- कल साफ मिलेगा जी।

जगबीर- (सड़क पर चलते-चलते, साथी के साथ बातचीत) हर और साफ सफाई रहे तो कितना अच्छा हो। कितनी गंदगी है यहां, ये कैसा शहर हुआ भला। देखो भाई, सफाई या स्वच्छता पर कहना मुश्किल हो सकता है, लेकिन करना तो बहुत आसान है।
सतीश - अपना मुंह तो एक मिनट के लिए भी खाली नहीं कर पाते। बस इतना ही कहुंगा पर उपदेश कुशल बहुतेरे

जगबीर- पर उपदेश कुशल बहुतेरे, मतलब?

सतीश- घर जाकर समझोगे।  आदत  बदलो अपनी। मुझे प्रतिवर्ष अपने विभाग में स्वच्छता पर निबंध या लेक्चर देने पर पुरस्कार मिलता रहा है, लेकिन सफाई करना इतर बात होती है। भाई जी, भारत को स्वच्छ बनाने के लिये केवल  गांधी जी का चश्मा ही काफी नही। हम सबको गांधीजी की विचारधारा को सम्पूर्णता से  समझना चाहिए।
आकाश- (बात बीच में ही काटते हुए) यही तो बिमारी है। कोई कुछ अच्छा करे वो भी नहीं सुहाता लोगों को। हम बात कर रहे थे सफाई की, और आप इसे ले आये अपनी घटिया  राजनीतिक बहस पर।
साथी- जिसका काम उसे ही साजे।

आकाश- क्या अनाप-शनाप कह रहे हो। इस युग में तो ऐसी बात न करो। दुनिया कहां की कहां पहुंच गई है, और आप हो कि उसी जगह खड़े हो। दूसरे countries को देखो वहां कोई इतनी सफाई नहीं करता जितनी हमारे देश में होती है।
विकास-    अच्छा..!

आकाश- हाँ, बिलकुल वे लोग हमसे कम साफ- सफाई करते हैं। कई-कई दिन तक खुद तो नहाते नहींवो क्या जाने सफाई का अर्थ। लेकिन फिर भी वहां हर तरफ साफ-सफाई कहीं  ज्यादा नजर आती है।
आकाश-   पता है ऐसा क्यों?

विकास-   नहीं पता ... तुम बताओगे? .....चलो बताओ।

आकाश-   सिर्फ वे लोग इतना ही करतें हैं कि वे कहीं भी कुछ भी नहीं फेंकते, बस, हो गई आधी सफाई तो यूँ हीं। वहां चलते फिरते गंद नहीं फैंकते। अपनी आंख बचा कर यहां वहां नहीं  फेंकते कुछ भी।
साथी- एकदम सही कह रहे हो भैया।

आकाश- पर इन जैसों का क्या करें, सारी दुनिया में शहर को लल्लुओं की राजधानी बना दिये  हैं।

सतीश- ये बहुत प्रेम से खैनी, गुटका, तम्बाकू व पानवा का सेवन करते हैं, जब मुंह में संभाले नहीं संभलता  उबेक देते हैं यहां वहां।

विजय- अब जिसे नहीं सुधरना उसे कौन सुधार सकता है।

आकाश- सौ बार ना सुधरे, खाये गुटका, पान तम्बाकू लेकिन अपने घर। ताकि जब गंदा हो तो केवल उसे ही चिंता हो। दिक्कत तो तब है जब वो हमारे शहर को गंदा करता है।
विजय- हाँ कहना तो वाजिब है आपका, जो ये सब नहीं खाता वो भी अपने जुतों, चप्पलों में ये गंद सनाये, घुमने को मजबुर है।

आकाश- एक IDEA है मेरे जहन में सुनो-समझो तो बतांऊ।

विकास- भाई अपना आजाद देश है सबको अपनी राय रखने का हक है, ये पड़ोसी मुल्क नहीं है।

आकाश- IDEA ये है, जो public place सार्वजनिक स्थान पर मुंह में पान, गुटका इत्यादी रखा मिले उसे प्यार से हम सभी थोड़ा टोक दिया करें। केवल इतना कह दें भाई ये जो पीक मारोगे ना, उससे अपना शहर गंदा होता है, कृपया एक जगह बैठकर किसी डब्बी में रख लो या नैपकिन  का प्रयोग कर  के उसो यूज मी में डालो। प्यार से ज्यादातर लोग मान ही जाते हैं ये मेरा  अनुभव कहता है।
रणबीर-  जिन्हे नहीं मानना वे किसी की नहीं मानते।

आकाश- जो फिर भी ना माने उसे कम से कम DTC Buses, DELHI  Metro में तो न चढ़ने दें। जब इन जैसे लोग अपना मुंह खोलते हैं सारी बस में बदबू (नाक पर हवा करते हुए) हो जाती है। सही मेंऐसे लोगों की वजह से ही आधे लोग ऑटो करना पसंद करते होंगे।

रणबीर- फ्री में नैपकिन बांट दोगे फिर भी वे थूकेंगे, सड़क पर ही, मैं जानता हूँ इनकी रग-रग को। ये कहतें हैं सफाई कर्मियों को सरकार तन्ख्वाह किस बात की देती है। ये ना मानै किसी की भी, भाई ये डंडे के यार हैं डंडे के।


(सभागार में उपस्थित आप सभी से ये विनती है कि घर अपना है तो शहर भी तो अपना ही है। बस इतना ही समझ लिजिए तो ये बुरी आदत एक दिन में छूट जायेगी)

कुछ अंतराल के बाद.....(लगभग 5 सैकेंड)


पर्दे के पीछे एक शोर होता है..रोने की सी आवाज आती हैं।


(क्या हुआ ये आवाजें कैसी आ रहीं हैं), अरे वो अपना भोलानंद ....क्या हुआ भोलानंद को।  

संजय- भोलानंद अब हमारे बीच नहीं रहा,

आकाश- नहीं रहा ?

संजय- हाँ, वो सेफ्टी टैंक की सफाई करने उसमें गया था। अन्दर गैस जहरीली थी। टैंक के अन्दर ही दम घुटने से मौत हो गई उसकी। जब सारे उपकरण नहीं मिलेंगे तो यही  होगा।