Sunday, March 10, 2024

वह खामोश हो गई

 कलकल खलखल बहती नदी सहम सी गई जब हम उसके तट पहुंचे

हम सभी थे अति उत्साहित देखने सुनने वादियों की बिखरी छटा

वह खामोश हो गई, मौन हो गई, शौर जब हमारा असहनीय बढ़ा

हम मस्ती में चूर थे, चूरचूर नान की तरह, बूफे खाना और फोटो खिँचाना ही बस काम था

वह इधर हथेली से सहलाता नदी की लहकती कमर, साथ ही एक भाई कंकड़ ही उछालता था

सायं सायं सी ध्वनी झरनों की, अनवरत मध्धम मध्धम, होकर कानों में आने लगी

योग करते, कोई विवाह पूर्व फोटो शूट, चाय पीते लोग, टोलियाँ नई नई आने लगी




 


दलित लहसुन प्याज हुँ

 

मैं किसी के घर नहीं जाती आजकल, पूछो, क्यों  क्या बात हुई ।

सुनो, दलित लहसुन प्याज हुँ में, जब तब धर्म-कर्म की बात हुई

भले मैं सत्ता का पत्ता काट सकती हुँ पर मेरी कोई औकात नहीं

पर है विश्वास उन्हे, खाकर मुझे, मिलती ईश्वर की सौगात नहीं।

मेरे द्द्दा कहते रहे, छोड़ जिद्द, की वहीं जाना, जरुरी नहीं।

गरीब पे रहम, निकाल वहम, ये संगमी नहाना, जरुरी नहीं

बस दिन कुछ और ठहरो, मैं दिन रात, तड़के में आने लगुंगी,

खायेंगे चाव से, भोजन परोसने से पहले मैं इनकी सलाद बनुंगी

नये त्योहार तक आखों से सबके प्याजी आसूँ नहीं थमेंगे

छल्लों में हरीहरी चटनी और रातों में जश्न के जाम जमेंगे

विचार ये अति भारी है।

 

 

राजेश कुमार पूनिया,

विचार ये अति भारी है।

कौन अशक्त कौन सशक्त, विचार ये अति भारी है।

हर नारी गंगा जमुना सरस्वती ही होती है।

सब दायित्व निभा, अपना सर्वस्व खोती है।

 

कौन अशक्त कौन सशक्त, विचार ये अति भारी है।

नारी चलती फिरती घड़ी चौबीसा होती है।

जब देखूँ काम करें, न जाने कब सोती है।

 

कौन अशक्त कौन सशक्त, विचार ये अति भारी है।

नारी भूखे रहकर, चाँद की बाट जोती है।

परोस भोजन सबको, झूठे बरतन धोती है।

 

कौन अशक्त कौन सशक्त, विचार ये अति भारी है।

किस समझ बूझ से, एक एक पैसा जोड़ा ।

बुरे वक्त में काम आये, जब रहा धन थोड़ा ।

 

कौन अशक्त कौन सशक्त, विचार ये अति भारी है।

नारी सुशील, सुमन सी कोमल होती हैं

जब घटे सम्मान, तब गिरते उसके मोती हैं

 

कौन अशक्त कौन सशक्त, विचार ये अति भारी है।

नारी का सम्मान जरुरी, ये प्यार की पाती हैं।

क्यों देते हैं धोखा इनको, ये प्रेम गीत गाती हैं।

 

कौन अशक्त कौन सशक्त, विचार ये अति भारी है।

नारी ही नारी को, क्यों अशक्त बताती है।

है वह बाड़ कंटिली जो स्वयं खेत खाती है।

 

कौन अशक्त कौन सशक्त, विचार ये अति भारी है।

नोवें माह नव जीवन देती और स्वयं भी पाती है।  

हमें पिता का गौरव भी, नारी, मां बन कर लाती है

 

कौन अशक्त कौन सशक्त, विचार ये अति भारी है।

बच्चियां जब ब्याही जाती, तब पति ही भगवान और मालिक था

साफ हुआ सब संविधान से जो नारकीय जीवन का कालिख था

 

कौन अशक्त कौन सशक्त, विचार ये अति भारी है।

कैथरिन मायो, लेखिका ने, मदर इंडिया पुस्तक में  जो लिखा था

शब्द नहीं, था हर्द्य विदारक,  वो नारी दुर्दशा, रस मीठा भी  फीका था

 

कौन अशक्त कौन सशक्त, विचार ये अति भारी है।

भारत रत्न ने जब तक, दिया देश को, अपना संविधान नहीं था

नारी का था बढ़ता शोषण और कोई अधिकार नहीं था

 

कौन अशक्त कौन सशक्त, विचार ये अति भारी है।

हर क्षेत्र में कंधे से कंधा मिलाकर, देश सेवा में तत्पर रहती है।

चूल्हा चौका, झाड़ू पौछा,  नित्य निरन्तर, ना और से कहती है।

 

आज, कविता मंचन की संयोजिका व संचालिका स्वंय एक नारी है

कौन अशक्त, कृपया बतलाऐं  राजेश सबका पहले ही आभारी है

 

 

 

 

 

 

 

 

 

Monday, February 19, 2024

बचपन के रंग -स्वरचित कविता - द्वारा: राजेश कुमार पूनिया, नई दिल्ली


बचपन के रंग                                                     

जब जो चाहे वो करते थे, मां से प्यार और बाप से डरते थे।

दिन तो वही अच्छे थे हुआ हम करते जब बच्चे थे।

दिन तो वही अच्छे थे..

शिखर दोपहरी, सिर पर छाता, न कभी गरमी में मरते थे।

मां चलती संग, पकड़े अगुंली, हाथ थोड़े धूप से जलते थे।

दिन तो वही अच्छे थे..

जब जो चाहे वो करते थे, मां से प्यार और बाप से डरते थे।

गोदी से उठा कन्धे पर, जब पापा फिरकी घुमाया करते थे।

चक्कर आते तो, में गिर ना जाऊं यही सोच डरते थे

दिन तो वही अच्छे थे..

जब जो चाहे वो करते थे, मां से प्यार और बाप से डरते थे।

पहने लिबास सिले जो मां ने, हाथ न उनके थकते थे।

एक कमाता और सब खाते, सबके यूं ही बच्चे पलते थे।

दिन तो वही अच्छे थे..

जब जो चाहे वो करते थे, मां से प्यार और बाप से डरते थे।

अब न मिलेगी गैंद तुम्हारी, जब अंकल यह कहते थे।

साथी बच्चे हमसे गैंद मंगाते, हम ही अकेले फंसते थे।

दिन तो वही अच्छे थे..

जब जो चाहे वो करते थे, मां से प्यार और बाप से डरते थे।

हवा में उड़ती पतंग हमारी बच्चे सारे देखने जुटते थे।

सो जाते शाम ही को थक कर, सपनों में फिर खुद उड़ते थे।

दिन तो वही अच्छे थे..

राजेश कुमार पूनिया पुत्र स्वर्गीय श्री पी एस पूनिया , माँ स्वर्गीय श्रीमती भगवानी देवी