Thursday, July 16, 2020

फ़ासले

राजेश कुमार पूनिया की कलम से


*फ़ासले*


'जिंदगी' की भाग दौड़

और 'मन' की दौड़ 

 लगातार एक दूसरे

को टक्कर देते थे

मन की दौड़ तो 

बिस्तर पर 

जाने तक भी 

खत्म न होती थी 

जाने क्या क्या ख्वाब

देखता, पर आजकल 

मन ठहर सा गया है

अब कहीं  आने जाने

को नहीं कहता

ना बाजार, मेले, मॉल,

या सामाजिक व्यवहार

निभाने को

वहीं जिंदगी की भागदौड़

भी थम सी गयी

ऑफिस का काम भी 

वर्क फ्रॉम होम हो गया

व़क्त ने क्या खूब रंग दिखाये

जिंदगी की भागदौड़

और मन की दौड़

दोनों का फ़ासला

 कम न होने दिया

Tuesday, July 14, 2020

सो या लेट


आर.के.पूनिया की कलम से

सो या लेट

कुछ दिन यहां पर
आई, सो या लेट

गाने सुनना ये है
 नया रेडियो सेट

धीरे धीरे तुम यहां 
हो जाओगी सेट

15 दिन बस सहन 
करो यूँ आई डेट

करोगी योगाभ्यास 
तो ये लो मेट

अभी खुद ही अंदर से 
कर लो बंद गेट

गरम काढ़ा, पानी, 
साथ मे लेना डेट

चिंता नहीं चाहे
 जो हो डेट का रेट

भगवान करे फिर  
अपनी घर हो भेंट
***

मुहावरा



आर.के.पूनिया की कलम से

मुहावरा 
कहां आजकल कभी तुम अपने पड़ोसी 
को रात में जगाते हो
पड़ोसी कहे इतनी बड़ी बात हो गई हमें 
तुम कब बताते हो 
 
'पड़ोसी ही पड़ोसी के काम आता है'
 मुहावरा कहां पाते हो
कहां होली के रंग और दिवाली की मिठाई 
लेकर जाते हो

दिखे  पड़ोसी आते जाते तो दूर से गर्दन 
सी हिलाते हो
हो कोई पार्टी  का प्रोग्राम तो पड़ोसी को  
भूल जाते हो

अगले दिन नजरे बचाते  दूध की दुकान 
पर जब मिल जाते हो
भला बनने की कोशिश होती, जब खुद 
घर मिठाई दे जाते हो

   





Sunday, July 12, 2020

परिश्रम फल

आर.के.पूनिया की कलम से
परिश्रम फल


बारहवीं का परिणाम 10.07.20 को घोषित हो गया 
ऐसे लगा जैसे कोई आज आजाद, शोषित हो गया

थका हारा सा  मायूस बच्चा खूब  पोषित हो गया
भले ही हृदय में कोरोना बन शूल  रोपित हो गया

नित्या,  प्रतिशत 'अठानबे' लाई, अंक शोभित हो गया
शाबासी तुझे बार बार, देख लक्ष्य भी अचंभित हो गया

**

लक्ष्य

जब  पढ़ने की ठानी, सवाल  मुश्किल, आसान हो गया
खेला जिस मोबाईल से, आज पढ़ाई का सामान हो गया 

मैने कहा, पत्नी से  कैसे लायेगा अकं अच्छे, जो खाते ही सो गया
बेटा बोला, अबकी देखना, क्या लाता हूँ, भूल जाओ जो हो गया

है विश्वास मुझे उस पर भी, बीज उसके दिल में उग तो गया
क्या असंभव है दुनिया में, समय पर लक्ष्य, लक्ष्य चुन जो गया





Friday, July 10, 2020

जगदीप जी की यादें


बीते कुछ दिनों  के हालातों को देखकर  एक ही बात सभी करते हैं कि कुछ नहीं रखा ज्यादा जोड़ने में। अगले पल का पता नहीं, फिर क्यों अगली पीढ़ियों की चिंता करें?   यह कहना सही भी है, अब देखो ना पिछले कुछ दिनों में ही कई हस्तियाँ हमसे जुदा हो गईं, बड़े बड़े कलाकार, गीतकार, कोरियोग्राफर आदि, इस कोरोनाकाल में स्वर्ग सिधार चुके हैं। आज (08.07.2020) हमारे बीच से हास्य जगत में अपना लोहा मनवा चुके सबके चहेते रहे श्री जगदीप जी का इंतकाल हो गया। उन्हे ख़ाके सुपूर्द कर दिया गया। 

एक समय था जब मनोंरजन की दुनिया में दिव.जगदीप जी के मुकाबिल कम ही कलाकार थे। उनका कोई स़ानी नही था। उनका असली नाम सैयद इश्तियाक अहमद जाफरी था, लेकिन शायद कम ही को पता हो। अलबत्ता "सूरमा भोपाली"  को  सभी जानते होंगे। 

जब वे  फिल्म शोले में  डॉयलॉग कहते हैं "मिअरा नाम सूरमा भोपाली एईथे ही नई है।" "फिर मियां, मियने कहा कि  जाते किधर हो,, ... और कोई खिदमत हो मेरे लायक तो बताओ, अरे चलो यहां से, पच्चीस झूठ हम से बुलवाते हो......चलो यहां से अपना काम करो। और क्या दो रुपये में पूरा जंगल खरीदने निकले थे, जाने कहां कहां से चले आते हैं।"  इस तरह से उनको एक नया नाम और मिल गया, जो हम सब की जुबां पर हमेशा रहेगा। एक फिल्म और याद आ रही है "तीन बहुरानियां" जिसमें जगदीप साहब ने हमें खूब हंसाया था, याद आया ?  


हे ईश्वर, अल्लाह, जिन्होने हमें अपनी अदाकारी से खूब हंसाया और हमारी जीवन  झोली में अपार  खुशियां भरी, उन्हे आप सदा अपने चरणों में  रखना प्रभु । औम शांति 

 

Thursday, July 2, 2020

संवेदना


संवेदना


कटे पर नमक छिड़के तो बहुत पीड़ा होती है और कोई नमक छिड़क छिड़क के घाव कर दे, उसके बारे में क्या कहा जाए।  यूँ तो भाई बहन का रिश्ता अनमोल होता है, इस रिश्ते का किसी एक आध घटना से जोड़कर आंकलन करना बिलकुल भी ठीक नहीं होगा। यद्धपि ऐसा भी होता है, जब बहन अपने भाईयों का समाज में इस तरह से निरादर कर देती हैं, जिसे सपने में भी नहीं चाहेंगे।

सभी अपनी समझ व सामर्थ्य के अनुसार मात पिता की सेवा करते ही हैंकोई विरला एवं अभागा ही माँ बाप की सेवा नहीं करता होगा। बहन को ये वहम हो गया कि उसके भाईयों ने माँ बाप की ठीक से सेवा नहीं की। 

"वैसे तो दूसरे घर से आने वाली भीआप और हमसे  कहीं ज्यादा सेवा कर दिया करती हैंलेकिन दुनिया का दस्तूर है कि बहू की सेवा बहुत कम ही लोगों को नज़र आती है।"

कुछ दिनों के लिये माँ जी अपनी बेटी के घर मिलने गई थीं। एक दिन वहां  से फोन आया माँ जी को तकलीफ हो गई है, आकर ले जाओ।  उन्होने भी डॉक्टर को दिखा दिया था, लेकिन वह बिमारी समझ नहीं पाये।

हम उन्हे अपने घर ले आये, और बड़े अस्पताल में दिखाया। बहुत अफ़सोस हुआ कि माँ जी को कर्क रोग ने अपने चंगुल में बुरी तरह से ले लिया था। उन्हें पेट में असहाय दर्द होने लगा था, जैसे बिच्छू एक साथ डंक मार रहे हों, साथ ही उल्टियां भी होने लगी थी।कई चिकित्सालयों में ईलाज कराया अंत में डाक्टरों ने उन्हे पैलिएटिव कैयर देना शुरु कर दिया। उनकी असहनीय पीड़ा को मोरफिन इंजैक्शन देकर कम किया जाता था।

हमने कई जगह माथा टेका, मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे। यदि माँ जी को कुछ हो गया तो,  बुरे विचार सताने लगे।ऐसी अनहोनी, कभी न सोचा था कि इतने बुरे दिन आ जायेंगे।

आज तक हर वो चीज़ जो माँ जी ने कही, कोशिश रहती की पूरी कर सकें। भले ही दफ़्तर को देरी हो जाती। जो कामकाजी हैं वे जानती हैं कि जब घर में कोई नौकर चाकर न हो तो घर का कितना काम हो जाता है। 

बहुत ही अच्छे दिन कट रहे थे, मां जी की इच्छा हुई तो कभी सब्ज़ी काट दीकभी दूध उबाल दिया। कभी जब साग, कढ़ी खाने का मन होता तो कहतीं कि तू हट आज मैं बनाऊँगी ये सौदा। 

दीदी रहती तो दूर थी पर उनका आना जाना लगा रहता था। हम उनके आने पर खुश होते। तरह तरह के पकवान बनाते। जब सुबह के सारे काम निपटा के मैं ड्यूटी जाने लगती तो यह ज़रुर चाहती की वे और कुछ दिन यहीं रूकें,  इसलिये  दीदी मेरे पीछे से चले मत जाना, ये कहकर ही बाहर पांव रखती। कितने अच्छे दिन थे वे।

सुना है कि जब ग्रहों की चाल बदलती है तो अच्छा  या बुरा प्रभाव अवश्य ही पड़ता है। दीदी,  जो हर महीने आ जाया करती थीं, माँ जी के जाने के बाद, कई सालों से  मेरे घर न आई हैं। उनकी नज़र में माँ जी की हमने वह सेवा नहीं की जो होनी चाहिये थी, इसलिये ही वह बिमारी से चल बसीं।

ऐसा समय बहुत दुविधा में डाल देता है, जब अपनी ही बात सही लगती है और दूसरों की सब गलत। 

माँ जी के जीवनकाल में, जो सुख मिला, कैसे बतलाऊँ, कभी कहा सुनी भी हुई तो वहीं  प्यार भी अथाह मिला। सुबह की बेला व संध्या में हम जब सैर पर जाते तो लगता ही नहीं कि हम सास बहू हैं। लगता कि कोई हम उम्र ही हैं। उनको लता जी के सदाबहार गीतों के बोल गुनगुनाने में बहुत आनंद आता।

कई बार, जैसे बच्चे राह में चलते चलते फूल पत्तियों को तोड़ते और सुंघते हैंवैसे ही मां जी भी किसी फूल या पत्ती को हाथ में पकड़कर पूछती की बेटी ये क्यां की फूल पत्ती सै?

क्यों उन्हें मरवे के पत्ते और संतरे के छिलकों की खुशबू बहुत अच्छी लगती थी, मैं जान न पाई। मरवे की चटनी बनाना मैंने उन्ही से सीखा ।

मेरे दफ्तर से घर लौटने पर जब माँ जी अपनत्व से कहतीं, ऐ बेटी ला, तेल लगा दे मेरे बालों में। 'मेरी  थकान जाने कहां चली जाती और मेरा मन, मरवे व संतरे के छिलकों की खुशबू की तरह महक जाता।'

काश! आप होतीं, आपको कितना अच्छा लगता कि तुम्हारे पोता पोती अब जवान हो गये हैं।  

बहुदा, बहुएं सासु माँ को बहुत बुरा भला कहा करती हैं। सब को  'मेरी माँ जी जैसी सास ही मिली हो, ये मंगल कामना है।'