राजेश कुमार पूनिया की कलम से
'जिंदगी' की भाग दौड़
और 'मन' की दौड़
लगातार एक दूसरे
को टक्कर देते थे
मन की दौड़ तो
बिस्तर पर
जाने तक भी
खत्म न होती थी
जाने क्या क्या ख्वाब
देखता, पर आजकल
मन ठहर सा गया है
अब कहीं आने जाने
को नहीं कहता
ना बाजार, मेले, मॉल,
या सामाजिक व्यवहार
निभाने को
वहीं जिंदगी की भागदौड़
भी थम सी गयी
ऑफिस का काम भी
वर्क फ्रॉम होम हो गया
व़क्त ने क्या खूब रंग दिखाये
जिंदगी की भागदौड़
और मन की दौड़
दोनों का फ़ासला
कम न होने दिया

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