Monday, April 29, 2019

लोटा(कलश)


लोटा(कलश)

आज घर से निकलते ही मंदिर जाने का मन हुआ और पंडित जी ने कल नये घर में हवन करने के लिए शुभ दिन बताया है। एक साल बाद वो दिन आ ही गया जब गृह-प्रवेश का दिन तय हो गया। घर खरीदे हुए तो एक साल हो गया है लेकिन जाने क्यों अभी तक हवन न हो सका था। सारी चीजें बहुत जल्दी करनी थी, जैसे सभी को निमन्त्रण देना, भोजन की व्यवस्था एवं पूजा सामग्री लाना। सबसे पहले सभी को कल के प्रोग्राम के लिए दूरभाष द्वारा सूचित किया। इस कार्यक्रम में परिवार एवं पड़ोसियों को ही निमन्त्रित किया था। पूजा सामग्री की सूची लेकर तुरन्त मैंने सारा पूजा का सामग्री खरीदी, मुझे ये सामान खरीदने में ज्यादा देर न लगी क्योंकी, एक दुकान जहां लिखा था यहां पूजा का सारा सामान मिलता है में पहुंच गया। साथ ही एक हवन कुंड भी ले लिया। दुकानदार ने मुझे बताया कि हवन-कुंड भी ले जाओ, दो सौ रुपये जमा करा कर, जब वापस करोगे तो जमा रुपये लौटा दिये जाएंगे। हमारा फर्ज है आपको बताना कि हवन-कुंड के बिना फर्श खराब हो जाएगा। दुसरा रास्ता है कि किसी परात में मिट्टी भर लेना, तो भी चलेगा। सही में ये बात मुझे ध्यान न थी कि हवन कुंड के बिना फर्श खराब भी हो सकता है।

पंडित जी ऑटो से आये थे। वे गली ढुंढ रहे थे। उनका मोबाईल फोन आया कि वे फलां जगह पर हैं। मैनें उन्हे वहीं मेरा इन्तजार करने के लिए कहा। कुछ देर बाद में उन्ही के साथ अपने नये घर पर आ गया। ऑटो वाले ने कहा कि 150 रुपये बने हैं। पंठित जी ने हमें भुगतान करने के लिए कहा। हमें थोड़ा अजीब तो लगा लेकिन अब किया क्या जाए। पन्डित जी ने शुरु में ही थोड़ा वक्त की पाबन्दी बता दी थी। अत: कार्यक्रम उसी के अनुसार तय किया गया था। सुबह के 9.30 बजे हवन शुरु हो गया। उन्होनें हमसे पूछा कि सब चीज ले लिये थे? मैने कहा जी पन्डित जी जैसा लिस्ट में लिखा था सभी सामान ले लिया है। उन्होने वास्तु शास्त्र के हिसाब से भगवान गणेश, लक्ष्मी, हनुमान आदि की प्रतिमाओं को एक लाईन में स्थापित कर दिया। पूजा प्रारम्भ हो गई। अब तक एक दो मेहमान भी आने शुरु हो गये थे।

पण्डित जी ने सबसे पहले हमें एक-एक फूल दिया और कहा कि सौ-सौ रुपये लगा कर सभी देवी-देवता को अर्पित करें। हमने कहे अनुसार ही अर्पित कर दिया। ऐसे ही एक परात में बने पांच देवी-देवताओं को भी हमने पांच स्थानों पर 100-100 के नोट चढ़ा दिये। कई बार पण्डित जी मंत्रोचारण के दौरान केवल ईशारे से ही रुपये चढ़ाने के लिए कहते। पण्डित जी बीच-बीच में शखंनाद द्वारा पूरे घर को पवित्र करते। जब करीब आधा घन्टा हो गया तो उन्होंने हवन कुंड में सारी लकड़ियाँ डाल कर और संवीदा डालकर अग्नि प्रज्वलित कर के कुछ देर मंत्रोचारण किये। सभी को थोड़ी-थोड़ी हवन सामग्री डालने को कहा। जब सामग्री थोड़ी सी बची तो पूर्णाहूति दे दी गई। सभी को खड़े होने को कहा। सभी औम जय जगदीश हरे...गाते हुए आरती करने लगे। दीपक थाली में रखा हुआ था। एक स्वास्तिक उस थाली में बना हुआ था। सभी को बारी-बारी से उसमें कुछ दक्षिणा रखनी होती है, और उसके बाद आरती करके आगे बढ़ानी होती है। जब लगभग सभी आरती की थाली को ले चुके थे, उन्होने आरती समाप्त कर दी। अंत में आम की पत्तियों की वंदरवाल बनाने की उन्हें याद दिलाई गई। 

हम सभी देख कर भोंचक्के हो गये कि ये केवल रुपये बटोरने के लिए ही कर रहे थे क्या? अपनी श्रद्दा अनुसार हमने वस्त्रादि से उनका मान किया, दक्षिणा में 1501 दिये। अब पंडित जी हमसे कहने लगे कि एक दोने में गाय के लिए भोजन निकाल दिजिये। सबसे पहले कन्या को भोजन कराइये। लेकिन खुद भी जल्दी में थे। उन्होने इतनी जल्दी –जल्दी में खाना खाया कि जैसे रेल छूट रही हो। पंडित जी आराम से भोजन करिये हमने उनसे जैसे ही कहा, एक कटोरी उठा कर बोले ये लाओ, अब वो लाओ, अब ये लाओ अब वो लाओ। हमारे इतने चक्कर लग गये कि हमें कहना ही पड़ा कि पंडित जी बुफे सिस्टम है आप खुद ही ले लिजिए ना। लेकिन वे बोले हम खाने के दौरान उठ-बैठ नहीं करते। आज से पहले, किसी को इतना सारा खाना इतनी जल्दी खाते न देखा था। यदि गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में होते तो पक्का रिकॉर्ड बना देते। जब खाना खा लिया तो कहने लगे ये थाली अब हमारी होती है। और साथ ही ये लोटा भी। हमने कुछ ना कहा, बस इतना ही कह पाये  जी ठीक है। चलते-चलते पंडित जी ने थोड़ा ईशारा किया कि मंदिर में बड़े पुजारी जी पुछें तो कहना 501 दक्षिणा दी है। हमें ये सुनकर थोड़ा अटपटा सा लगा, सो पूछ लिया क्यों झूठ बुलवाते हो हमसे। जो दिया है वहीं बताने में क्या हर्ज है पंडित जी। वे थोड़ा नीची नजर करके बोले आप नहीं जानते उनको बहुत धुर्त पंडित हैं। हम उनको आज से नहीं कई साल से झेल रहें हैं। उनके चेहरे के भाव ने मुझ पर गहरा असर कर दिया था, मुझे वे एक शोषित मनुष्य नजर आने लगे। इस वजह से मेरे मुहं से अनायास ही निकल गया कि, ठीक है, नहीं बताऊंगा कि आप ने क्या दक्षिणा ली।

जब जाने लगे तो कहा, अब हमारे जाने का किराया तो दीजिये, एक बड़ी सी डकार लेने के उपरान्त उन्होने कहा कि यहां से वहीं 150 रुपये बनेंगे। चलो अब इतने गये थोड़े और सही, यही सोचकर हमने उन्हे खुशी-खुशी अपने घर से विदा किया। हम सभी ने उनके जाने के बाद कई देर तक उन्हे याद करके हंसते रहे। हमारे भाई उनकी बचकाना हरकतें सहन नहीं कर पा रहे थे, उन्होंने अपना गुस्सा कई बार पीया। अगले दिन जब पत्नी को घर पर लोटा न मिला तो हमने बताया कि वो तो पंडित जी ले गये। पत्नी बोलीं, उसी लोटे(कलश) में पानी भरकर कल गृह-प्रवेश किया था, उसे कैसे ले गये पंडित जी? मैंने पहली बार किसी पंडित को लोटा(कलश) अपने साथ ले जाते देखा है। क्या वे नहीं जानते थे? कि लोटे को नहीं ले जाते और तब जब पता है कि उसी लोटे में जल भर कर गृह-प्रवेश किया था। मैंने भी उन्हे नहीं रोका ये सोचकर कि उन्हे ज्यादा ज्ञात है।

एक तो वैसे ही उन्होंने अपनी लालची हरकतों से सभी को नाखुश कर दिया था, अब हमें ये बात अत्यंत बुरी लग रही थी, थाली तो सही है जिसमें खाना खाया था। लोटे को भी अपने साथ ले गये। ज्यादा देर न करते हुए उन्हे तभी मोबाईल फोन लगाया। उधर से आवाज आई कि बोलिए बन्धु। हमने पुछा लोटा क्यों ले गये आप? उस पर आपका हक नहीं बनता, कब आऊं लेने? वे कुछ न बोल सके केवल इतना ही कहा कि कल शाम में आके ले जाना। मुझे यह दुख भी था कि पंडित जी को दे दिया तो दे दिया, अब वापस क्या मांगना। बस वजह यही थी कि लोटा झूठ बोलकर ले गये थे। दुसरा, हमारी आस्था थी कि वह लोटा जो गृह-प्रवेश के समय प्रयोग किया हो वह घर में रहना चाहिए।

जब नियत समय पर मन्दिर गया तो वे एक और बुजुर्ग पंडित जी के समीप ही बैठे हुए थे। मुझे देखते ही वे एकाएक खड़े हो गये और मुझे बोले कि मेरे पीछे-पीछे आओ। मैनें कहा कि आप यहीं ले आईये। मुझे वहीं खड़ा देखकर वे दौबारा बोले आ जाओ अन्दर ही आ जाओ। मैं समझ नहीं पा रहा था कि वे मुझे अन्दर क्यों बुला रहे हैं। चूकिं में थोड़ा क्रिकेट खेल का शौकीन हूँ, मैंने उन्हें कहा कि आप थोड़ा बात समझें मैच शुरु होने वाला है। दिल्ली का मैच है आज, मुझे मैच देखना है। वे जैसे ही अन्दर गये, बुजुर्ग पंडित जी ने मुझसे दबी आवाज में सवाल किया कि कल हवन करवाने की दक्षिणा क्या दी थी पंडित जी को? मैं अब तक सारा माजरा समझ गया था कि क्यों पंडित जी मुझे अन्दर आने के लिए चेष्टा कर रहे थे। वे नहीं चाहते होंगे कि मेरा सामना उन्ही बुजुर्ग पंडित से हो। वे बार- बार मुझे बताने के लिए मजबूर कर रहे थे। बुजुर्ग पंडित जी दौबारा बोले, ये बहुत चालाक है, इसे तुमने क्या दक्षिणा दी मुझे बता दो। मुझे ये बताने में थोड़ा संकोच हो रहा था क्योंकि उस पंठित जी ने इस पंडित जी को बहुत धुर्त कहा था। मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि असल में कौन कितने पानी में था। पहली बार मुझे ऐसे पंडित जी मिले थे जो यज्ञ हवन में बड़ी-बड़ी ज्ञान की बातें कर रहे थे लेकिन खुद थे पोंगा।

जब कभी मैं ऐसी विषम परिस्थित में फंसा हूँ वहां से केवल मेरे ईश्वर ने ही मुझे बचाया है। आज फिर मुझे एक विचार दिया। उसी समय पंठित जी लोटा लेकर आते दिखे। मैनें बुजुर्ग पंडित जी से पूछा, क्या आपको बाद में बता दूँ? देखो पंडित जी इधर ही आ रहे हैं। उन्होनें कहा एक से दौ के बीच में ये लन्च पर जाता है, तब आके बता देना। घर आकर सारी कहानी जब बच्चों को बताई तो वे कहने लगे क्या मन्दिर के पुजारी भी ऐसी सोच रखते हैं? मैंने उन्हें कहा कि बच्चों अभी तुम बहुत छोटे हो जब बड़े हो जाओगे तब समझोगे कि जिसे हम जहां ढूंढते हैं वह वहां हर बार नही मिलता।

Friday, April 5, 2019

नारी-शक्ति


नारी-शक्ति

अपने पति के गुजर जाने के बाद वह बेटे के लिए उसी दफ्तर में जिस में उसके पति नौकरी करते थे, आया करती। उसे अपने बेटे को अनुकंपा के आधार पर नौकरी के लिए दफ्तर में चक्कर काटते-काटते दो साल हो गये थे। वह कभी अकेले कभी अपने बेटे के साथ आया करती। सभी स्टाफ अधिकारी व कर्मचारी उनसे अति संवेदना व इज्जत के साथ व्यवहार करते थे। 

कोई अनहोनी कब हो जाएगी किसे पता। परिवार की सारी खुशियाँ उनकी आकस्मिक मौत की खबर ने छीन लीं। जीवन का उत्साह पलायन कर गया। उसके न होने से घर की सारी जिम्मदारी उसकी पत्नी के कंधों आ गई। वह सारे साज-श्रृंगार भूल गई, मांग में सुहाग का सिंदूर अब छूट गया। सुहागन ही करवाचौथ के चादं का इन्तजार करती है बीते साल मैनें कितना इन्तजार किया तब जाकर चांद निकला था। वे कुछ भी कर रहे होते वहीं से मुझे आवाज देते कि आज तो चांद ने बहुत इंतजार करवा दिया तेरा, कितनी भूख लग रही होगी तुम्हे। मैं कहती की खाये बिना मरी नहीं जा रही हूँ। इनकी एक नजर घर पर दूसरी आसमान पे होती अभी दिखाई दिया कि नहीं, बार-बार छत पे जाकर चांद देखा करते। जब चांद निकलता तो वे आवाज देकर कहते कि सुनो चांद निकल आया चलो छत पर जल्दी चलो। हाय, क्या अब कभी भी मुझे चांद का इतंजार नहीं करना। मैं अपने पति की दीर्घ आयु के लिए ही तो करवाचौथ का व्रत रखती थी। जब चांद को अर्ध्य देती तो ये ही कामना करती की सभी सुहागन रहकर परलोक सिधारें। मुझे क्या पता था कि वो मेरी विनती सुन ही नहीं रहा होगा।

शहर में अगर अपना कोई स्थाई घर है तो आपकी आधी समस्या हल हो गई समझो। सरकारी मकान है तो छोड़ना ही पड़ेगा। आजकल बस उसे यही चिन्ताएं खाये जा रही थीं कि बेटे की नौकरी लग जाए, बेटी की शादी हो जाए और सिर पे छत मिल जाए। पैंशन तो आधी तनख्वा से भी कम हो गई थी। कुछ व्यक्तियों से उन्होनें उधार भी लिया हुआ था जो हजारों में था। बस एक ही आस पर मुंह धोये हुए थी कि उसके बेटे की नौकरी लग जाये, या तो कहीं और नहीं तो अनुकपां के आधार पर उसी दफ्तर में जिसमें वे नौकरी करते थे।

एक दिन प्रशासन खण्ड के बड़े बाबू के सामने जब उसकी आंखो से आसूं समन्दर बन कर बह गये तब बड़े बाबू को कुछ भी नहीं सूझ रहा था कि उसे चुप कैसे कराये। वह हाथ जोड़कर अपने बेटे की नौकरी के लिए गुहार लगाती रही। हर बार की तरह उसे यही आश्वासन मिल जाता कि हमें आपकी चिन्ता है। अभी आप जाएं। हम आपको पत्र द्वारा सूचित कर देंगे। उसकी निराशा बढ़ती जा रही थी। कोई किसी की मदद कब तक कर सकता है। धीरे-धीरे सभी ने अपनी मजबूरियां गिनानी शुरु कर दीं। वक्त बेइन्तहा कठिन गुजरने लगा था। जब संसार ठुकराता है तब ईश्वर याद आता है। वह ज्यादा वक्त ईश्वर की भक्ति में तत्लीन रहने लगी।

कुछ ही दिनों में बेटी की शादी होनी थी लेकिन लड़के वालों ने जाने क्यों अचानक इस रिश्ते को अशुभ करार दे दिया। शादी की सब तैयारियां चौपट हो गई थीं। लड़का अच्छा है कहीं ये रिश्ता हाथ से न निकल जाये यही सोचकर उसकी मां ने रिश्ता पक्का किया था। लेकिन अब घर का सारा बजट गड़बड़ा गया था। अनावश्यक एवं अधिक खर्च पर अकुंश लगाना आवश्यक हो गया था। लेकिन उसकी बेटी अन्दर से दुखी न थी कि रिश्ता टूट गया। वह कहती जैसे हरि की इच्छा। वह अभी और पढ़ना चाहती थी इसलिए भगवान ने उसे एक मौका दे दिया था।

जब कोई राह न सूझे तब उपर वाला ही राह दिखाता है। उसकी बेटी पढ़ाई में काफी होशियार थी। भगवान की करनी देखिए कि उसे अमिताभ जी के कौन बनेगा करोड़पति में जाने का मौका मिल गया। किस्मत ने उसे हॉटसीट पर तो बैठा दिया था, अब उसके ज्ञान की असली परीक्षा होनी थी। अमिताभ जी, कठिन सवालों के सही उत्तर पाकर मंत्रमुग्ध हो रहे थे। के.बी.सी. से करोड़ रुपये जीत कर लाई तो घर के हालात एकदम सुधर गये। नई कार व अपना घर खरीद कर परिवार के साथ रहने लगे। उसने आगे की पढ़ाई शुरु कर दी। हाथ की लकीरों में अच्छा नसीब न लिखा हो तो कलम उठा लो। जिस घर में लड़की को पराया धन समझ कर पाला जाता रहा हो, वह आज उसी घर के लिए नई रोशनी बन कर उभर रही थी। उसने भारत की सबसे बड़ी प्रशासनिक सेवा के लिए संघ लोक सेवा आयोग की प्रारम्भिक परिक्षा की तैयारी शुरु कर दी। वह पास ही में एक कोचिंग सेन्टर में जाकर जरुरी टिप्स भी लेती रही। वह प्रथम प्रयास में विफल हो गई। यदि इन्सान हार ना माने तो जो चाहे वो कर सकता है।

अगली कोशिश में सफलता मिल ही गई वह अच्छे रैंक के साथ उत्तीर्ण हुई। घर पर मीडिया के पत्रकारों का सैलाब सा आ गया था। अनेकों मित्रों, जानकारों एवं रिश्तेदारों के बधाई सन्देश मिल रहे थे। घनिष्ट लोगों का घर पर जमावड़ा बढ़ने लगा। आज उसकी मां की आंखों में खुशी के आंसु बरबस ही छलक रहे थे। पहले वह अपने भाग्य को कोसती थी कि लड़की के ब्याह के लिय दहेज कहां से देंगे।

जग के पालनहारे का खेल देखिये, भाई को भी अनुकंपा के आधार पर रिक्त पड़े पद पर नौकरी मिल गई, इस तरह घर में फिर से खुशियों के जमाने लौट आये।

Wednesday, April 3, 2019

पतझड़


पतझड़

घर के सामने एक पीपल का पुराना पेड़ है, जिसकी सारी शाखाएं आजकल एकदम सूनी-सूनी लग रहीं हैं। पहले मुझे उस पेड़ के पार कुछ ना दिखता था। चूंकि, आजकल पतझड़ आ गया है, सब कुछ उसी तरह आर-पार दिखाई दे रहा है जैसे की मेरे बाबूजी की जीवन यात्रा। बाबूजी को शहर में सरकारी नौकरी मिल गई तो पूरे परिवार को भी साथ ले आये। हम सभी धीरे-धीरे नए शहर के माहौल में ढ़ल गये।

बाबूजी के जीवन से मुझे ये सीख मिली कि जरुरतमंद की सहायता कर देनी चाहिये। जितना हो सके हर किसी की मदद करो। मैंने उन्हें बचपन से ही लोगों के बीच घिरा पाया। आये दिन कोई न कोई हमारे घर पर जानकार एवं रिश्तेदार आये रहते। सभी को मेरे बाबू जी से सहायता की उम्मीद रहती। किसी को कुछ काम होता तो किसी को कुछ। कोई अस्पताल में अपना ईलाज कराने आता तो वो बे-हिचक हमारे घर आ जाता। हमारा घर अस्पताल से थोड़ी ही दूरी पर ही था। गाँव से कोई भी शहर आये और हमारे बाबू जी से बिना मिले-जुले चला जाए ऐसा बहुत कम ही होता था क्योंकि सभी उनका बहुत सम्मान करते थे।

एक बार की बात याद है कि कोई जानकार अपनी पत्नी के ईलाज के लिए हमारे घर तीन-चार महीने से भी ज्यादा रहे। उन्हें हर तीन-चार दिन बाद अस्पताल जाकर अपनी पत्नी का उपचार कराना होता था। वह शायद पेट के रोग से पीड़ित थी। इसलिए उनकी पत्नी के लिए बिना तेल-मिर्च का खाना अलग बनाना होता। बीमार के लिए लौकी, तोरी, टिन्डा, मसूर की दाल, दलिया, खिचड़ी, साबूदाना इत्यादि। मेरी माँ उन दिनों एक मिनट भी फुर्सत ना पाती सारा दिन कब निकल जाता खबर ना होती।

एक बार किसी दूर के रिश्तेदार की शहर में नौकरी लगी तो वह अपने परिवार के साथ हमारे घर पर रहने आ गये। जब तक उन्हे कहीं मकान नहीं मिला, बाबूजी उन्हे यही कहते रहे कि कोई चिन्ता नहीं करना ये भी तो आपका ही घर है। मेरे बाबू जी सदा ये मानते रहे कि घर आया मेहमान भगवान की तरह होता है। उसकी सेवा में कोई कोर-कसर उन्हें बर्दाश्त न होती थी। मैं तब सोचता था कि छोटी सी तनख्वाह में इतनों को जाने कैसे खिलाते होगें मेरे बाबू जी। आज समझ आया कि कोई दौलत से अमीर होता है तो कोई दिल से। इसलिए बाबू जी ने कभी रुपया पैसा जोड़ा नहीं।

मेरी माँ बिना किसी तकरार व ना-नूकुर के सारा काम करती रहती थी। उन दिनों ज्यादातर औरतों को घरों में ये अधिकार ना था कि सवाल करें। बाबू जी ने अपने बड़े बेटे की व बेटी की शादी कर दी। बेटे ने कुछ दिन में ही अलग रहने की रट बाँध ली। हालात ऐसे हो गये कि अलग करने के अलावा कोई चारा नहीं बचा। लिहाजा आम कहा-सुनी के बाद हमारे बड़े भाई ने अपना अलग चूल्हा कर लिया। 

वह विशेष आयोजनों पर ही हमारे घर आते अन्यथा कई-कई साल बीत जाते। दूसरी तरफ बड़ी बहन को ससुराल वाले अच्छे नहीं मिले। जब स्वभाव मेल न खाये तो ये स्वाभाविक ही है कि सभी एक दुसरे को कोसते ही हैं। कोई किसी के स्वभाव जैसा ही कैसे हो सकता है? हमें तालमेल बैठाना आना चाहिये जो कि आजकल के बच्चों में तो और भी कम हो गया है। ससुराल में झगड़े के बाद बड़ी बहन रात को अपने मायके वापस आ गई। बाबू जी के सपने चूर-चूर हो गये। सारी खुशियों को ग्रहण लग गया। बेटी जब बाप के घर इस तरह से लौट आये तो ये उस बाप का दिल ही जानता है कि उस पर क्या बीती होगी। ये हम उनके दिन-ब-दिन बढ़ते चिड़चड़े स्वभाव से समझ सकते थे। कुछ दिन बाद जीजा जी को भी आना पड़ा।

हांलाकि वह पांच बहनों के इकलोते भाई थे, लेकिन अपने घर को उजड़ते कौन देख सकता है। कौन कितनी गलती पर था ये तो पता नहीं लेकिन बहन के मुंह से ससुराल की और उनके मुहँ से बहन की एक भी तारीफ कभी नहीं सुनी। खैर, बहन और जीजा अब हमारे साथ ही रहने लगे। दो कमरों के घर में हम पहले ही से थोड़े तंग थे। बाबू जी ने हम बच्चों के रहने के लिए घर के पिछवाड़े में एक टीन की चादर की छत डलवा दी।

किसी को क्या पता कि वो समय कैसे-कैसे गुजरा। बाबू जी और मेरी माँ को समय की चक्की में और पिसना बाकी था। दूसरी बहन के रिश्ते की बात चल ही रही थी एक दिन बहन को देखने वाले आये। घर में कई मेहमान एकत्रित हुए थे। हमारे घनिष्ट रिश्तेदार जिनकी हमारे घर में काफी पूछ होती थी, उन्हें भी इस अवसर पर बुलाया गया था। रिश्ता पक्का हो गया। हमारे बाबूजी ने अपनी क्षमता से ज्यादा  खर्च कर उन्हें कूलर, मिक्सी, स्कूटर, सौफा सेट, रंगीन टी.वी., बैड जैसी तमाम वस्तुएं दीं। ताकि उन्हे नई जिन्दगी शुरु करने में कोई दिक्कत न हो।

एक समस्या तो पहले ही चल रही थी कि समय ने फिर बाबू जी को एक बड़ा झटका लगा दिया। बहन जहां ब्याही थी वह आदमी चरित्रहीन निकला। शुरु के दिनों में ही ये बात सामने आ गई थी। उसका कहना था कि हम तो यूं ही रहेंगे, तुझे रहना है तो रह, नहीं तो जा सकती है। 

बाबू जी ने कई वर्षों तक केस लड़ा, अंत में जज साहब ने तलाक का फैसला दे दिया। बाबूजी व माँ दोनों घन्टों बेटी की चिन्ता में अपना समय गवांते कि आगे की जिन्दगी कैसे कटेगी उसकी। कुछ न सूझता था दोनों को। मैं भी कॉलेज में आ गया था, दोस्तों का घर आना जाना शुरु हुआ, वे भी मेरे घर आ जाते थे। किसी ने एक लड़का बहन के लिए बतलाया लेकिन एक दिक्कत थी कि लड़का अभी ना तो रोजगार करता था, ना उसकी तबीयत ज्यादा ठीक रहती थी। प्रभु की कृपा से वह स्वस्थ तो हो ही गया और नौकरी भी लग गई। यह सब किसके नसीब से हुआ? मेरी माँ और बाबूजी का ईश्वर में अटूट आस्था का फल ही था।

दोनो परिवारों की सहमति से विवाह सम्पन्न हुआ। हमारे बाबूजी ने सपने में भी नहीं सोचा था कि इस तरह की बात हो जायेगी। सास ससुर अच्छे थे, बहन की पूरी इज्जत करते थे। बड़ी बहन ने भी अब किराये पर मकान ले लिया। बाबूजी अब खुश थे जैसे गंगा नहा लिये हों। सारी दुख-तकलीफें एक बुरा सपना बन कर रह गई थी।

समय ने बाबूजी की फिर परीक्षा ली, अब एक नई समस्या दस्तक दे रही थी। मुझ से बड़े भाई को जाने किस बात का गहरा सदमा लगा था। उसकी हालत दिन-ब-दिन बिगड़ती जा रही थी। वह यहां-वहां भटकने लगा। उसके व्यवहार में आश्चर्यजनक रुप से बदलाव आ गये। बेहद आक्रामक होने लगे। कभी रोते तो कभी एकदम गुमसुम हो जाते। घर में मायूसी का सा आलम रहने लगा। सबसे बड़े भाई को तो जैसे हमसे कुछ लेना-देना ही नहीं होता था। लम्बे समय तक हम सभी काफी परेशान रहे। वक्त की मरहम से धीरे-धीरे भाई ठीक हो गया। समय बड़े-बड़े घावों को भी भर देता है।
   
दिन बदलने लगे, हम दोनों भाईयों की शादी के लिए बाबूजी ने सुयोग्य लड़कियों की तलाश शुरु कर दी। मेरे बड़े भाई ने जाने कितनी ही लड़कियों को नापसंद किया। अंतत: एक दिन नून-तेल का भाव पता चल ही गया। साल भर मे मेरी शादी भी हो गई। मेरी शादी में कई दोस्त अपने बच्चों के साथ आये। अब विलम्ब से शादी करने का थोड़ा खामियाजा तो होता  ही है। मेरे बच्चे अभी उच्चतर माध्यमिक कक्षाओं में अध्यनरत हैं, जबकि मेरे कई मित्र अपने बच्चों की सारी जिम्मेदारियाँ पूरी कर चुके हैं।

वक्त के थपेड़ों ने बाबूजी को थोड़ा मायूस जरुर कर दिया था लेकिन वे हारे नहीं। मेरी माँ तो अब रही नहीं जिनसे बाबू जी अपने दिल की बातें करते थे। अब कोई साथी भी नहीं रहे जिनके संग वक्त बीत जाये। वे अब बहुत बूढ़े हो गये हैं। नजर और याददाश्त भी बेहद ही कम है। आज उसी पीपल की छांव तले छड़ी के सहारे सुबह-शाम जब टहलते हैं तो लगता है जीवन में अब पतझड़ ही शेष रह गया है।