पतझड़
घर के सामने एक पीपल का पुराना पेड़ है, जिसकी
सारी शाखाएं आजकल एकदम सूनी-सूनी लग रहीं हैं। पहले मुझे उस पेड़ के पार कुछ ना
दिखता था। चूंकि, आजकल पतझड़ आ गया है, सब कुछ उसी तरह आर-पार दिखाई दे रहा है
जैसे की मेरे बाबूजी की जीवन यात्रा। बाबूजी को शहर में सरकारी नौकरी मिल गई तो
पूरे परिवार को भी साथ ले आये। हम सभी धीरे-धीरे नए शहर के माहौल में ढ़ल गये।
बाबूजी के जीवन से मुझे ये सीख मिली कि जरुरतमंद की
सहायता कर देनी चाहिये। जितना हो सके हर किसी की मदद करो। मैंने उन्हें बचपन से ही
लोगों के बीच घिरा पाया। आये दिन कोई न कोई हमारे घर पर जानकार एवं रिश्तेदार आये
रहते। सभी को मेरे बाबू जी से सहायता की उम्मीद रहती। किसी को कुछ काम होता तो किसी
को कुछ। कोई अस्पताल में अपना ईलाज कराने आता तो वो बे-हिचक हमारे घर आ जाता।
हमारा घर अस्पताल से थोड़ी ही दूरी पर ही था। गाँव से कोई भी शहर आये और हमारे
बाबू जी से बिना मिले-जुले चला जाए ऐसा बहुत कम ही होता था क्योंकि सभी उनका बहुत सम्मान
करते थे।
एक बार की बात याद है कि कोई जानकार अपनी पत्नी
के ईलाज के लिए हमारे घर तीन-चार महीने से भी ज्यादा रहे। उन्हें हर तीन-चार दिन बाद अस्पताल जाकर अपनी पत्नी का
उपचार कराना होता था। वह शायद पेट के रोग से पीड़ित थी। इसलिए उनकी पत्नी के
लिए बिना तेल-मिर्च का खाना अलग बनाना होता। बीमार के लिए लौकी, तोरी, टिन्डा, मसूर
की दाल, दलिया, खिचड़ी, साबूदाना इत्यादि। मेरी माँ उन दिनों एक मिनट भी फुर्सत ना
पाती सारा दिन कब निकल जाता खबर ना होती।
एक बार किसी दूर के रिश्तेदार की शहर में नौकरी
लगी तो वह अपने परिवार के साथ हमारे घर पर रहने आ गये। जब तक उन्हे कहीं मकान नहीं
मिला, बाबूजी उन्हे यही कहते रहे कि कोई चिन्ता नहीं करना ये भी तो आपका ही घर है।
मेरे बाबू जी सदा ये मानते रहे कि घर आया मेहमान भगवान की तरह होता है। उसकी सेवा
में कोई कोर-कसर उन्हें बर्दाश्त न होती थी। मैं तब सोचता था कि छोटी सी तनख्वाह में इतनों को जाने कैसे खिलाते होगें मेरे बाबू जी। आज समझ आया कि कोई दौलत से अमीर होता है तो कोई दिल से। इसलिए बाबू जी ने कभी रुपया पैसा जोड़ा नहीं।
मेरी माँ बिना किसी तकरार व ना-नूकुर के सारा काम
करती रहती थी। उन दिनों ज्यादातर औरतों को घरों में ये अधिकार ना था कि सवाल करें। बाबू जी ने अपने बड़े बेटे की व
बेटी की शादी कर दी। बेटे ने कुछ दिन में ही अलग रहने की रट बाँध ली। हालात ऐसे हो
गये कि अलग करने के अलावा कोई चारा नहीं बचा। लिहाजा आम कहा-सुनी के बाद हमारे
बड़े भाई ने अपना अलग चूल्हा कर लिया।
वह विशेष आयोजनों पर ही हमारे घर आते अन्यथा कई-कई साल बीत जाते। दूसरी तरफ बड़ी बहन को ससुराल वाले अच्छे नहीं मिले। जब स्वभाव मेल न खाये तो ये स्वाभाविक ही है कि सभी एक दुसरे को कोसते ही हैं। कोई किसी के स्वभाव जैसा ही कैसे हो सकता है? हमें तालमेल बैठाना आना चाहिये जो कि आजकल के बच्चों में तो और भी कम हो गया है। ससुराल में झगड़े के बाद बड़ी बहन रात को अपने मायके वापस आ गई। बाबू जी के सपने चूर-चूर हो गये। सारी खुशियों को ग्रहण लग गया। बेटी जब बाप के घर इस तरह से लौट आये तो ये उस बाप का दिल ही जानता है कि उस पर क्या बीती होगी। ये हम उनके दिन-ब-दिन बढ़ते चिड़चड़े स्वभाव से समझ सकते थे। कुछ दिन बाद जीजा जी को भी आना पड़ा।
हांलाकि वह पांच बहनों के इकलोते भाई थे, लेकिन अपने घर को उजड़ते कौन देख सकता है। कौन कितनी गलती पर था ये तो पता नहीं लेकिन बहन के मुंह से ससुराल की और उनके मुहँ से बहन की एक भी तारीफ कभी नहीं सुनी। खैर, बहन और जीजा अब हमारे साथ ही रहने लगे। दो कमरों के घर में हम पहले ही से थोड़े तंग थे। बाबू जी ने हम बच्चों के रहने के लिए घर के पिछवाड़े में एक टीन की चादर की छत डलवा दी।
वह विशेष आयोजनों पर ही हमारे घर आते अन्यथा कई-कई साल बीत जाते। दूसरी तरफ बड़ी बहन को ससुराल वाले अच्छे नहीं मिले। जब स्वभाव मेल न खाये तो ये स्वाभाविक ही है कि सभी एक दुसरे को कोसते ही हैं। कोई किसी के स्वभाव जैसा ही कैसे हो सकता है? हमें तालमेल बैठाना आना चाहिये जो कि आजकल के बच्चों में तो और भी कम हो गया है। ससुराल में झगड़े के बाद बड़ी बहन रात को अपने मायके वापस आ गई। बाबू जी के सपने चूर-चूर हो गये। सारी खुशियों को ग्रहण लग गया। बेटी जब बाप के घर इस तरह से लौट आये तो ये उस बाप का दिल ही जानता है कि उस पर क्या बीती होगी। ये हम उनके दिन-ब-दिन बढ़ते चिड़चड़े स्वभाव से समझ सकते थे। कुछ दिन बाद जीजा जी को भी आना पड़ा।
हांलाकि वह पांच बहनों के इकलोते भाई थे, लेकिन अपने घर को उजड़ते कौन देख सकता है। कौन कितनी गलती पर था ये तो पता नहीं लेकिन बहन के मुंह से ससुराल की और उनके मुहँ से बहन की एक भी तारीफ कभी नहीं सुनी। खैर, बहन और जीजा अब हमारे साथ ही रहने लगे। दो कमरों के घर में हम पहले ही से थोड़े तंग थे। बाबू जी ने हम बच्चों के रहने के लिए घर के पिछवाड़े में एक टीन की चादर की छत डलवा दी।
किसी को क्या पता कि वो समय कैसे-कैसे गुजरा।
बाबू जी और मेरी माँ को समय की चक्की में और पिसना बाकी था। दूसरी बहन के रिश्ते
की बात चल ही रही थी एक दिन बहन को देखने वाले आये। घर में कई मेहमान एकत्रित हुए
थे। हमारे घनिष्ट रिश्तेदार जिनकी हमारे घर में काफी पूछ होती थी, उन्हें भी इस
अवसर पर बुलाया गया था। रिश्ता पक्का हो गया। हमारे बाबूजी ने अपनी क्षमता से ज्यादा
खर्च कर उन्हें कूलर, मिक्सी, स्कूटर, सौफा
सेट, रंगीन टी.वी., बैड जैसी तमाम वस्तुएं दीं। ताकि उन्हे नई जिन्दगी शुरु करने
में कोई दिक्कत न हो।
एक समस्या तो पहले ही चल रही थी कि समय ने फिर
बाबू जी को एक बड़ा झटका लगा दिया। बहन जहां ब्याही थी वह आदमी चरित्रहीन निकला। शुरु
के दिनों में ही ये बात सामने आ गई थी। उसका कहना था कि हम तो यूं ही रहेंगे, तुझे
रहना है तो रह, नहीं तो जा सकती है।
बाबू जी ने कई वर्षों तक केस लड़ा, अंत में जज साहब ने तलाक का फैसला दे दिया। बाबूजी व माँ दोनों घन्टों बेटी की चिन्ता में अपना समय गवांते कि आगे की जिन्दगी कैसे कटेगी उसकी। कुछ न सूझता था दोनों को। मैं भी कॉलेज में आ गया था, दोस्तों का घर आना जाना शुरु हुआ, वे भी मेरे घर आ जाते थे। किसी ने एक लड़का बहन के लिए बतलाया लेकिन एक दिक्कत थी कि लड़का अभी ना तो रोजगार करता था, ना उसकी तबीयत ज्यादा ठीक रहती थी। प्रभु की कृपा से वह स्वस्थ तो हो ही गया और नौकरी भी लग गई। यह सब किसके नसीब से हुआ? मेरी माँ और बाबूजी का ईश्वर में अटूट आस्था का फल ही था।
बाबू जी ने कई वर्षों तक केस लड़ा, अंत में जज साहब ने तलाक का फैसला दे दिया। बाबूजी व माँ दोनों घन्टों बेटी की चिन्ता में अपना समय गवांते कि आगे की जिन्दगी कैसे कटेगी उसकी। कुछ न सूझता था दोनों को। मैं भी कॉलेज में आ गया था, दोस्तों का घर आना जाना शुरु हुआ, वे भी मेरे घर आ जाते थे। किसी ने एक लड़का बहन के लिए बतलाया लेकिन एक दिक्कत थी कि लड़का अभी ना तो रोजगार करता था, ना उसकी तबीयत ज्यादा ठीक रहती थी। प्रभु की कृपा से वह स्वस्थ तो हो ही गया और नौकरी भी लग गई। यह सब किसके नसीब से हुआ? मेरी माँ और बाबूजी का ईश्वर में अटूट आस्था का फल ही था।
दोनो परिवारों की सहमति से विवाह
सम्पन्न हुआ। हमारे बाबूजी ने सपने में भी नहीं सोचा था कि इस तरह की बात हो
जायेगी। सास ससुर अच्छे थे, बहन की पूरी इज्जत करते थे। बड़ी बहन ने भी अब किराये
पर मकान ले लिया। बाबूजी अब खुश थे जैसे गंगा नहा लिये हों। सारी दुख-तकलीफें एक बुरा
सपना बन कर रह गई थी।
समय ने बाबूजी की फिर परीक्षा ली, अब एक नई
समस्या दस्तक दे रही थी। मुझ से बड़े भाई को जाने किस बात का गहरा सदमा लगा था। उसकी
हालत दिन-ब-दिन बिगड़ती जा रही थी। वह यहां-वहां भटकने लगा। उसके व्यवहार में
आश्चर्यजनक रुप से बदलाव आ गये। बेहद आक्रामक होने लगे। कभी रोते तो कभी एकदम
गुमसुम हो जाते। घर में मायूसी का सा आलम रहने लगा। सबसे बड़े भाई को तो जैसे हमसे
कुछ लेना-देना ही नहीं होता था। लम्बे समय तक हम सभी काफी परेशान रहे। वक्त की मरहम से धीरे-धीरे
भाई ठीक हो गया। समय बड़े-बड़े घावों को भी भर देता है।
दिन बदलने लगे, हम दोनों भाईयों की शादी के लिए बाबूजी
ने सुयोग्य लड़कियों की तलाश शुरु कर दी। मेरे बड़े भाई ने जाने कितनी ही लड़कियों
को नापसंद किया। अंतत: एक दिन नून-तेल का भाव पता चल ही गया। साल भर मे मेरी शादी
भी हो गई। मेरी शादी में कई दोस्त अपने बच्चों के साथ आये। अब विलम्ब से शादी करने का
थोड़ा खामियाजा तो होता ही है। मेरे बच्चे अभी उच्चतर माध्यमिक कक्षाओं में अध्यनरत
हैं, जबकि मेरे कई मित्र अपने बच्चों की सारी जिम्मेदारियाँ पूरी कर चुके हैं।
वक्त के थपेड़ों ने बाबूजी को थोड़ा मायूस जरुर
कर दिया था लेकिन वे हारे नहीं। मेरी माँ तो अब रही नहीं जिनसे बाबू जी अपने दिल की बातें करते थे। अब कोई
साथी भी नहीं रहे जिनके संग वक्त बीत जाये। वे अब बहुत बूढ़े हो गये हैं। नजर और याददाश्त
भी बेहद ही कम है। आज उसी पीपल की छांव तले छड़ी के सहारे सुबह-शाम जब टहलते हैं तो लगता है जीवन
में अब पतझड़ ही शेष रह गया है।
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