थोड़ा दृष्टिकोण बदलें
हम सभी अपना जीवन शान्ति से जीना चाहते हैं, कोई
भी अशान्ति नहीं चाहता होगा। क्या हम सभी शान्ति से जी पा रहे हैं? अगर जवाब ‘नहीं’ है, तो इस बात को
नजरअंदाज करने की भूल कदापि ना करें। आप अपने मन को काबू में कैसे करें जैसे टीप्स
नहीं देने जा रहा मैं।
आपसे एक विनती है कृपया कुछ देर के लिये अपनी
आँखे खोलकर (आँखें बंद करने से ध्यान लगता तो सभी ध्यानी हो गये होते, रात-दोपहर
आँखे कौन नहीं बदं करता) अपने बीते अच्छे और बुरे वक्त पर एक नजर डाल कर विचारें
करें कि क्या कोई भी समय कभी समन्दर की शान्त लहरों की तरह ठहर पाया। जवाब मिल ही
गया होगा।
ना अच्छा समय रुका ना ही बुरा। असल में हम सब कठपुतली
हैं, हमारे हाथ में कुछ है ही नहीं। बस वजह, बेवजह की इच्छाएं पाल बैठें हैं। आओ सम-दृष्टा
बनकर हम ये अनुभव प्राप्त करते हैं। इसे यूँ समझने की कोशिश करते हैं, उदाहरण के
लिए मान लो कि जिस खेल को आप पसंद करते हैं उसकी दो टीम हैं, एक टीम में वह
खिलाड़ी है जो आपके अपने हैं, आप चाहोगे कि वही टीम जीते जिसमें आपके परिचित
खिलाड़ी हैं, ठीक बात है ना। दर्शक-दीर्घा से उसे आप देख रहें हैं। खेल शुरु हुआ, जिसे
आप जिताना चाह रहे थे वो टीम जीत जाती है। आप खुश हो गये। यदि ठीक इसके उलट परिणाम
होते तो आप दुखी हो जाते, ठीक है ना।
आप अपने से ये सवाल पूछिए कि क्या आप खेल का पूर्ण
आनंद ले पाये? आपको सही उत्तर मिल जायेगा। जब खेल के परिणाम पर हमारा आनंद व शान्ति
निर्भर हो तब असल जीवन में सुख व शान्ति कहाँ। सम-दृष्टा की भाँति यदि हम केवल खेल
का आनंद लेते तो हमें सही में सच्चे सुख व शान्ति का अहसास होता। ये अनुभव की बात
है।
आसपास नित नई घटनाएं घट रहीं है। कई बार कई
घटनाएँ हमें झकझोर देने वाली होती हैं और कुछ अच्छी खबरें भी होती हैं। लेकिन हम
उन्हें इस तरह से लेते हैं कि वे हमें सच में ज्यादा दुखी या सुखी नहीं करतीं। बस केवल
जानकारी के लिए हम उन्हें पढ़ते हैं, ताकि हम आधुनिक ज्ञान से वंचित ना हो जाएं।
हर देश में तू, हर भेष में तू, तेरे नाम अनेक तू
एक ही है। आओ इस जात-पात की दलदली मानसिकता से बाहर निकलें और सब एक होकर घर-परिवार,
देश में शान्ति व आनंद से रहें।
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