चाय की चुस्की
आखिर क्या फायदा हुआ चाय पीने से? मैनें जब ये सवाल स्वंय
से किया तो मुझे कोई जवाब नहीं मिला। कहाँ तो
घर में भैंसें हुआ करती थीं। दूध, दही, मक्खन, लस्सी खूब खाते-पीते थे। उस दही का
स्वाद अलग ही होता था। नौणी घी(शुद्ध मक्खन) आहा! खाने में क्या मजा आता था। एकदम फीका
होने के बावजूद कभी भी उसे खाने की चाह खत्म नहीं हुई।
याद नहीं आता कि पहली बार कब करमजली चाय का
स्वाद जीभ को लगा होगा। ये चाय तो ऐसी गले पड़ी कि आज तक न छूट सकी। जाने कौन घड़ी
में इसके जाल में जा फंसे थे। शाम की चाय पिताजी के दफ्तर से लौटने पर मैं ही
बनाने लगा था, जब वे कहते बेटा चाय तो पिला तेरे हाथ की चाय बहुत अच्छी लगती है। यूँ
बनाते-बनाते कब चाय बनाने में मुझे महारत हासिल हो गई मुझे ही पता नहीं चला। मेरे
हाथ की चाय में क्या खास होता मुझे खुद कभी ना मालूम चल पाया। अच्छी-सी चाय के लिए
मुझे कहा जाने लगा। मेरे हाथ की चाय पीने से सबकी तबीयत अच्छी हो जाती। मेरी खुशी
दोगुनी हो जाती जब कोई मेहमान हमारे घर आता उन्हें अपने हाथ की चाय पिलाता। उन दिनों,
जब खासकर रतन अंकल एवं रतनी आँटी घर आते तो मुझे कहते कि बेटे तू क्या डालता है चाय
में, बहुत बढ़िया है।
हर बार चाय पेश करने से पहले खुद चख कर
देखता था कि कोई कमी तो नहीं है, बस यूँ ही चखते-चखते आदत पड़ गई। इसे पीते कितने
ही वर्ष हो गये। अब क्या किया जाय। अड़तालिस का हो गया हूँ, लेकिन ये कमबख्त चाय
पीछा ही नहीं छोड़ती मेरा। अब तो काया का रंग भी चाय के रंग जैसा हो गया है। चाय
की चुस्की ने मुझे अपना आदि बना दिया।
आजकल, मैं जब दफ्तर से घर आता हूँ तो अपने
बेटा या बेटी से कहता हूँ कि बच्चे चाय तो पिला। तुम्हारे हाथ की चाय में अलग ही
स्वाद आता है, तो वो कहते हैं कि पापा अभी लाये, तब लगता है कि शायद मुझे उतनी
अच्छी चाय ना भी बनानी आती होगी उन दिनों। ये माँ-पिताजी का अपने बेटे के प्रति स्नेह
ही था कि उन्हें मेरे हाथ की चाय का स्वाद, शायद दूध-दही से भी ज्यादा अच्छा लगता था।
Puniyaji
ReplyDeleteSecond good effort. You have put in good incredients in the blog