धूंधली यादें
अब एक धूंधली-सी याद ही बची है, मैँ उम्र में बहुत छोटा
था, घर में
रात होते ही शादी के गीत शुरु हो जाते, कई रात-दिन नाच-गाने चले। कई बार बड़े
बाजार जाना हुआ, मेरी पसंद के कपड़े मुझे दिलाये गये। जिस रोज बारात जानी थी सभी
तैयार हो गये थे। वहीं पास ही में एक मन्दिर में सभी ने प्रार्थना कि और बारात चल
दी। मुझे नये कपड़े पहनाकर सजी हुई घोड़ी पर दुल्हे के साथ बैठाया गया, प्रोग्राम
स्थल के नजदीक पहुँच कर सभी एक बार फिर से तैयार हुए। बैंड-बाजा बजना शुरु हो गया।
हमारे आगे बहुत सारे बच्चे, कुछ आदमी और लड़कियाँ नाच-नाच कर नये-नये नोट हमारे ऊपर
से वार कर उड़ा रहे थे, जिन्हें बैंड वाले उठाकर अपनी जेब में रख लेते थे, कुछ
छोटे लड़के भी जिसे उठाते फिर रहे थे।
बैंड वाले तु-तु तु-तु, तु-तु तु-तु बजा रहे थे,
साथ में ढोलक की ढम-ढम की आवाज लगातार सुनाई दे रही थी, लगता था कोई चलता फिरता
मेला हो। चारों तरफ सभी उत्साहित लग रहे थे, सभी नये परिधानों के साथ सजे-धजे
हमारे आगे-आगे चल रहे थे। समीप ही खेत दिखाई दे रहा था, दूसरी तरफ कच्चे घरों की गली
थी, घरों को गोबर से लिपा गया था, कहीं गाय बंधी थी, कहीं पर भैंस। कुछ देर बाद हमें
किसी के घर के आगे ढेर सारी बिजली की लड़ियाँ दूर ही से दिखाई दे रहीं थी, मुझे अब
लग रहा था कि हमें शायद वहीं जाना है।
काफी देर बाद हम उसी जगह पर पहुँच गये। मुझे उस
घोड़ी से उतारकर किसी ने थोड़ी देर अपनी गोद में ले लिया, और सारे एक बड़े से गेट
के सामने आ गये थे, जिसे रंगबिरंगे फूलों की मालाओं से सजाया हुआ था। तभी वहाँ
शादी के गीत गाती हुई कुछ अधेड़ और कुछ जवान युवतियों ने आना शुरु कर दिया। एक सुन्दर-सी
महिला ने अपने हाथ में आरती की थाली ले रखी थी, जिसे वह दूल्हे के आगे गोल-गोल
घुमा रही थी, कुछ लड़कियाँ अन्दर आने का प्रवेश कर (टेक्स) माँग रही थीं, वहीं कई
लोग जो धोती-कुरता, सिर पर खंडुआ बाधें हुए थे, एक-दूसरे को फूलों की माला डाल कर गले
मिल रहे थे। सभी धीरे-धीरे उस गेट से अन्दर प्रवेश करने लगे। मैं दूल्हे की अगुँलि
पकड़कर उनके साथ-साथ चल रहा था। उस जमाने में घर की औरतें बारात में नहीं जाया करती थीं, वे घर पर ही खोड़िया नामक खेल खेलती थीं।
आगे चलकर हम एक बड़े से प्रांगण में पहुँच गये। ऊँची
सी जगह पर बड़ी-सी दो कुर्सियाँ दिखाई दे रही थीं। मैं जाकर उस पर खेलने लगा था,
जैसे कि वह कुर्सियाँ मेरे खेलने के लिये ही लगाई गई हों तभी किसी ने मुझे ऐसा करने से टोका दिया था।
मैनें वहाँ कई तरह के पकवान खाये आखिर में दूध-आईसक्रीम
का स्वाद चखा। देर रात सभी एक जगह एकत्रित हो गये रात को घर कब आये, याद नहीं आता।
सुबह जब नीदं खुली तो घर पर था। पूरा परिवार दुल्हा-दुल्हन के खेल की तैयारी कर
रहा था, एक बरतन में हरी-दूब व कुछ दूध मिला पानी डाल दिया। इस दूधिया पानी में
जीजा जी को एक अंगुठी ऊपर से छोड़नी होती थी, जो पहले उस अंगुठी को लेगा वह जीत
जाएगा, इस तरह तीन बार ये खेल हुआ, एक खेल
बड़ा मजेदार था जिसमें दूल्हा-दुल्हन बारी-बारी से एक दूसरे की मुठ्ठी खोलने की जोर-आजमाईश
करते हैं।
चाची जी ने मुझे बुला कर कहा कि ये तेरी भाभी जी हैं,
यहाँ बैठ, तुझे तभी लड्डू मिलेगा जब तुम अपनी भाभी से ये कहोगे, “आपको बेटा मुझे
लड्डू” मैनें जैसे ही ये वाक्य पूरा किया मेरी पीठ पर एक मुक्का पड़ा। ये रशम
है ऐसा बताया गया। फिर भाई-भाभी को एक-एक सूंटक (पतली सी टहनी) दी गई और एक दिखावटी
पिटाई का खेल खेल हुआ।
अब समय आया थापा लगवाने का जिसमें कई और बच्चों
के साथ मुझे भी अपनी कला दिखाने का मौका मिला, मैंने बार्डर की क्यारियों में कई
रगं भरे जहाँ उनकी हथेलियों को हल्दी व मैहंदी में रंगकर छापा था। तब तक कई मेहमान
जाने की तैयारी करने लगे थे। अंत में मेरे मेरे चाचा, ताऊ, मामा, नाना तथा अन्य
मेहमान भी जाने लगे थे। कई मेहमान नव-युगल को अपना प्यार व आशिर्वाद दे रहे थे, मेरी
माँ व चाची सभी मेहमानों को जाते समय एक-एक मिठाई का डब्बा दे रहीं थीं। इस तरह मेरे
चचेरे भाई की शादी सम्पन हुई थी।
आजकल के दौर में कहाँ वो अपनत्व, कहाँ वो प्यार।
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