Sunday, June 28, 2020

गुगल हैल्प

घोंसला अपना हो

गुगल हैल्प


कई दिनों कव्वे कव्वी ने तिनके जमाये

हवा के एक झोंके से सारे बिखर गये

कव्वे के दिल पर गहरा आघात हुआ

पहली बार तो घोंसला बनाया था

मेहनत पर सारी पानी फिर गया

कव्वी से बोला, मैं थक गया अब

क्या करें तु बता..

गये साल जिस कबुतरी का घोंसला

तुमने छिना था वह फिर नये

घोंसला बनाये हुए है..

कव्वे ने कहा तो बात बन गई

बता कहां पर है...

कव्वी ना ना, मैं उसे न बेघर करुंगी

कैसे घोंसला बनांऊ ये पता करुंगी

अगले दिन..

मिसिज एंड मिस्टर कव्वा तिनके लाते

और मिसिज एंड मिस्टर कबुतर घोंसला बनाते

कबुतर कबुतरी ने घोंसला अपने से भी सुन्दर बनाया

जब शाम हुई तो उड़ कर अपने घोंसले में जाने लगे

वहां पहले ही से आवाजें आ रहीं थी

कव्वा अपनी धर्मपत्नी से “ घोंसला  बुहत अच्छा बनाया है

कव्वी अपना होता चाहे जैसा भी होता "

वह, इशारे  को  समझ गया

दुसरे दिन कव्वे को सुबह से शाम हो गई

कव्वी ने कहा, कुछ खा तो लेते, खाली पेट हो

कहीं चक्कर आ गया तो, कोई भी नहीं है अपना

धुन लग गई कि अपनी मेहनत से घोंसला बनाना है

जामुन की सूखी टहनी तोड़ कर इकठ्ठी कर ली

जब ये टहनी ठीक बैठे तभी दुसरी गिरने लगे

कई बार कोशिश की, थक गया, तो हार मान बैठा


उसकी पत्नी भी, समझ सारी बात गई

बोली सुनो, ये तुम्हारी गलती नहीं है

पहले कभी नहीं बनाया, तो मुश्किल तो होगी ना

गुगल से हैल्प ले लो, हाऊ टू कन्सट्रक्ट नेस्ट


तभी वही कबुतरी आई और बोली

गुगल हैल्प नहीं मेरी हैल्प चाहिये तुम्हे

हम सभी को एक दूसरे के लिये ही तो बनाया है

सब ने मिलकर दुसरे ही दिन घोंसला बना दिया,


अब दोनो सपरिवार अपने अपने घोंसलों में रहने लगे

चील चाचा की ट्रेनिंग चल रही है 

दोनो के बच्चे खुले आसमानी मैदान में 

गुलचियां मार कर उड़ना सीख रहे हैं।





Tuesday, June 9, 2020

बुरा वक्त ही तो है



*बुरा वक्त ही तो है*


"ये जीना भी कोई जीना है लल्लू"। कई साल पहले सुना था ये फिल्मी डायलॉग, फिल्म में श्री अमिताभ बच्चन जी ये अभिनय कर रहे थे तब लगता था कि सच में वह सही कह रहें हैं। जैसे जैसे हम थोड़े बड़े हुए हमें ये मालूम हुआ कि यह कहानी की मांग है इसलिये फिल्म में हीरो ये डायलॉग मार रहा है। धीरे धीरे फिल्मों को देखने का नजरिया भी बदल गया। 

कभी मां से बेटा बिछड़ा, कभी भाई भाई से मेले में जुदा हुआ या विलेन किसी हीरो को मारे पीटे, तो भी हमारी आंखों से आसूं न निकलते पहले की तरह। हमें ये समझ आ गई कि यह एक फिल्म है और सभी कलाकार अपने चरित्रों को निभा रहे हैं।    

असल में, रील और रियल लाईफ दोनों में हम होते कलाकार ही हैं। रील में किसी कहानी की पटकथा और डायरेक्टर की मंशा के अनुरुप हमें एक्ट करना है, और रियल लाईफ में सामने खड़ी मुश्किल घड़ी के अनुरुप। 

रील लाईफ में कहते थे 'ये जीना भी कोई जीना है लल्लू', वही इंसान रीयल लाईफ में कविता लिख रहे हैं कि, गुजर जायेगा गुजर जायेगा, बुरा वक्त ही तो है, गुजर जायेगा। फर्क यह है कि फिल्म में किसी के लिखे बोल थे, और आज अपने बोल हैं। 

आपकी कविता पढकर जनमानस में एक नई चेतना जागृत हुई होगी। एकदम सही कहते हैं, कि बुरा वक्त ही तो है गुजर जायेगा, हजारों हजार साल से इस धरती पर डायनासोर, बड़े बड़े पिंड, चक्रवात, महामारियां आई होंगी, सब वक्त के साथ चली गई। यहां कुछ भी ठहरता नहीं है। 

आओ विचारें, कैसे हम दो तरह से जीवन जी रहे हैं, एक काल्पनिक या फिल्मी और दूसरा यथार्थ। हमे जब यह बोध होगा कि हम सभी कलाकार हैं और इस अंबर के नीचे अपने अपने चरित्र निभा रहे हैं। यहां कुछ भी रियल नहीं है, हम सभी आत्मायें अपने अन्तिम गन्तव्य की और अग्रसर हैं, तब रील और रियल लाईफ में कोई भेद ही नहीं रहेगा।



Saturday, June 6, 2020

EMAIL TO AIR


Rajesh Punia coppercppr@gmail.com

Sat, 6 Jun, 
to airnsdtalks
महोदय, जी

यह प्रोग्राम सुनने वालों को अवश्य ही लाभ मिला होगा । डा. वेद चतुर्वेदी, स्वास्थ विशेषज्ञ  ने कई ऐसे 
पहलूओं को छूआ है जो हमें अभी तक मालूम न थे।  ये मेरा विश्वास और उम्मीद है कि भविष्य में और 
भी कोरोना से संबंधित जानकारी अपने श्रोताओं से साझा करते रहेंगे।

महोदय जी, मेरे दिमाग में  रह रहकर यह सवाल आता है कि जब  एलोपैथी में  कोरोना की दवा नहीं है तब 
भी क्यों  केवल इसी पैथी की और सबका झुकाव है? क्यों आयुर्वेद या अन्य पद्धितियों  पर भरोसा नहीं जताया 
सरकार ने? डा. वेद चतुर्वेदी, स्वास्थ विशेषज्ञ एवं आकाशवाणी सवांददाता श्री सिद्दार्थ सिंह जी कृपया 
अगले कार्यक्रम में यह विषय, जरुर छुने का प्रयास करें। 

श्रीमान जी, यदि आप चाहें तो मुमकिन है कि सारा जहां सुन ले इसे, स्वरचित कविता है...

 कोरोना मेेरी मान..

क्या सोचा था तुम बहुत खुश होगे यहां आकर
हां हम मेहमान ही नहीं अतिथि का भी स्वागत करते हैं

बिगड़ें अगर वो किसी वजह से तो हाथ जोड़  मनाते है
घर आये कि इज्जत खातिर तो हम पैरों भी पड़ जाते हैं

तुमने सोचा होगा ये बेवकूफ हैं, इनसे ही पेच्चे लड़ाते हैं
हमने ढ़ील देकर ऊपर बैठा लिया, अब सद्दी तक ले जाते हैं

कटेंगे कन्ने से कनकव्वे, पंख जो तेरे फड़फड़ाते हैं
तुम ने सोचा होगा यहाँ भाई-भाई आपस में लड़ रहे हैं

यहां मेरा सही काम बन जायेगा
खुद ही आपस में लड़ रहे हो तो मुझसे कौन लड़ेगा

इतिहास एक बार पढ़ लेता बावले
कि जब भी बाहरी विपदा आई है
हम एक साथ खड़े हो जाते हैं

अब तुम्हारी यात्रा का अन्तिम पड़ाव है।
यहां तो डाक्टर ही जुगाड़ ऐसा बेठा देते हैं

कि बिमारी हो कैसी भी जड़ से खा जाते हैं
कोरोना, मेरी मान, अभी भी  निकल ले पतली गली से..

जब यह इमेल आप शामिल करें तो, आप द्वारा पठित कविता सुनकर आंनद ले पाऊं।

 भवदीय, राजेश कुमार पूनिया, नई दिल्ली

तांडव


*तांडव*

हम सभी ऊपर वाले का शुक्रिया करना भूल चुके थे अब पल पल शुक्र करते है कि आज भी महामारी की चपेट में आने से बच गये आपका धन्यवाद प्रभु, आज का दिन भी ठीक से बीत गया। शाम के छ बज गये हैं और सभी कर्मचारीगण धीरे-धीरे घरों को कूच करने लगे हैं। मुझे आज सुबह के आठ बजे से कल सुबह के आठ बजे तक ड्यूटी निभानी है, यह इसलिये कि रोज-रोज के सफर और संक्रमण से बचा रहुँगा।

भगवन, अभी कुछ देर पहले एक दोस्त ने मुझे ऐसी बात कह दी कि मुझे उसका जवाब नहीं सूझा, जानते हो उसने क्या कहा, वह कहने लगा कि यदि आपकी सत्ता अगर है, तो फिर क्यों नहीं एक पल में सब कुछ सही कर देते, पहले की तरह? भगवन, प्रश्न में उसके दिल का दर्द भी दिखाई दे रहा था, और गुस्सा भी। 

वह यूँ तो आस्तिक है, लेकिन, अपनी खुली आँखों से जो देख रहा है, उसे अंदर से कचोट रहा है। उसने कहा कि मैं मंदिर में हर मंगलवार को प्रसाद चढ़ाने जाता था। जिन्हे भगवान के सबसे निकट माना जाता है, उन्हे मंगलकार्यों में अपने घर आने का निमंत्रण देता था, लेकिन आज, जब हम दुखी और हताश हैं तब उसने  मंदिर के कपाट ही बंद कर दिये। भगवन हमें तेरा सहारा था, लगता है लेकिन शायद नहीं था

ऊपर वाले तुम हम जैसे लाखों, करोड़ों के विश्वास हो और सदा रहोगे, फिर ये विलंब क्यों प्रभु? क्यों सबको अलग-अलग रहने पर मजबूर कर दिया? 

उस बालक की तो सोचो, कैसे वह माँ के स्नेह, प्यार दुलार से दूर रहेगा? दोनों हाथ जोड़कर विनती है ये तांडव अब बंद करें भगवन, बहुत हो गया।


Friday, June 5, 2020

शेर शायरी


राजेश कुमार पूनिया की कलम से

बहुत कायराना , तुमने कोरोना ये काम किया
जनमानस के जीवन में कैसा ये तूफान दिया
**
हम भारत वासी रस मलाई ,चमचम खाते
उनको न जाने क्यो सांप, चमगादड़ भाते
**
कारसीनोमा से मिलता-जुलता कोरोना नाम दिया
कहें जब बच्चे को, बस ना रोना, लगे चोट हिया
**
शायद बंद मंदिर मस्जिद से भी हमें ये बताता होगा
अब खुद के अंदर रहो, जगत  भरम से जगाता होगा
**
शायद ऊपर वाला  हमें ये समझाता होगा
खुद के अंदर रहो, जगत तुम्हे भरमाता होगा










Thursday, June 4, 2020

अंकल नमस्ते



 अंकल नमस्ते *

एक लड़का जो कभी भी नमस्ते या अभिवादन नहीं करता था।  वह लड़का आज तीसरी बार मिला है, हर बार अंकल नमस्ते कह रहा है। थोड़ी देर बाद मैं गैलरी में गया तो वह सामने ही खेल रहा था, फिर अंकल नमस्ते कहा,  बात समझ में नहीं आ रही कि आखिर वह एकदम इतना कैसे बदल गया। पिछले दो तीन दिन से देख रहा हूँ कि वह रोज ही नमस्ते कर रहा है।

मैं जब अपनी कार को साफ कर रहा था तो वह फिर मेरे पास आ गया, और नमस्ते अंकल, कहकर अपनी फुटबॉल से खेलने लगा। मेरे को ये बात अचंभित कर रही थी कि जो लड़का कल तक सामने पड़ने पर भी पास से ऐसे निकल जाता था कि जैसे कभी देखा ही न हो। जबकि वह दो घर छोड़कर रहता है।  

बच्चों का दिल मक्खन से भी मुलायम होता है यह बात मुझे अब सही जान पड़ती थी कि मां बाप यदि रोके तब ही अड़ोसी-पड़ोसी या फिर जानकार को बच्चे नमस्ते करना बंद कर देते हैं। मेरा तो उसके मां-बाप से कभी कोई झगड़ा भी नही हुआ, मुझे पहले क्यों नहीं करता था नमस्ते?

मैं  अभी अनुमान ही लगा रहा था कि वह दौबारा मेरे पास आया और कहने लगा, अंकल आप पहले रेस लगाते थे?  जरुर मेरे बेटे ने इसे बताया होगा, क्योंकी वह जानता है कि मैं स्टेट लैवल की दौड़ में हिस्सा ले चुका हूँ, इसके अलावा कई बार मेैराथन भी दौड़ा हूँ और श्रेष्ठ धावक का खिताब भी मिल चुका है।

यह उचित न समझा कि पूछुं, किसने बताया? सिर्फ गर्दन हिला कर हांमी भर ली। अंकल मुझे भी रेसर बनना है। आप मुझे गर्मियों की छुट्टी में रोज रेस करना सिखाओगै?  बेटे, पहले अपने घर में पूछ कर आओ कि कोई ऐतराज तो न होगा। अंकल आप चिंता न करें मेरे पापा मुझे मना नहीं करेंगे। 

ठीक है तो मैं तुम्हें कल सुबह 5 बजें इसी पार्क में मिलूंगा। जूते, टी-शर्ट, लौअर  पहन कर आना, अब जाओ।

एक सप्ताह  हो गया वह लड़का  दिखाई नहीं दे रहा था, सो पता करने गया उसके पिता  बोले घर में सभी पाँच बजे तक उठ जाते हैं, लेकिन रवि को उठाने के लिये भाष्कर महाराज भी खिड़की खटखटा कर आगे सरक लेते हैं। भाष्कर जी जानते हैं कि जब आज तक सही समय पर नहीं उठा तो आज क्या ख़ाक उठेगा, एक दो बार जगाया फिर रोज की तरह आगे निकल गये। 

वह शर्म के मारे आपके सामने नहीं आ रहा। उसके पिताजी बारबार उसे अंदर वाले कमरे से बाहर बुला रहे थे। कुछ देर में वह अंकल नमस्ते कह कर मेरे सामने बैठ गया। मैंने कहा बेटे क्या हुआ? तुम तो पहले ही दिन नहीं आये और आज इतने दिन बाद मैे ही पुछने आया हूँ, बताओ क्या हुआ?  

अंकल मैं सुबह जाग नहीं पाता जब आँख खुलती हैं तब 9 बजे होते हैं, मैं क्या करुँ आपके सामने आने में भी मुझे लज्जा आ रही थी, इसलिये मैंने बाहर खेलना भी छोड़ दिया। बस, इतनी सी बात के लिए तुमने बाहर खेलना ही छोड़ दिया। चलो कोई बात नहीं, बेटा ये बताओ, तुम रात का भोजन कितने बजे तक कर लेते हो? अंकल हम सभी 11 बजे भोजन करते हैं। उसके बाद एक घन्टा टीवी देखते हैं। 

मुझे  लैक्चर देना अच्छा नहीं लगता है लेकिन जब किसी को यह लैक्चर देने से नया जीवन मिल रहा हो तो क्यों न दूँ। 
  
बेटे, सुबह की हवा आजकल कितने लोग खाते हैं, सारा दिन मंहगी चीजें तो खाते हैं, लेकिन इस देह के लिये सबसे ज्यादा जरुरी चीज ताजा हवा होती है और जिसका कोई मोल भी नहीं उसे कोई नहीं खाता। कोई भोर में उठे तो खाये ना। 

बेटे, तुम ये दृढ़ निश्चय करो कि मुझे सबसे तेज धावक बनना है, जितना पक्का निश्चय करोगे उतने ही अच्छे धावक बनोगे। जैसा हम सोचते हैं वैसा ही हम बन भी जाते हैं, इसलिये हमेशा शुभ और बड़ा विचार करो। 

धावक या खिलाड़ी के जीवन में  नियम, संयम का बहुत महत्व होता है।  मनोबल के साथ साथ शारीरिक शक्ति भी चाहिये इसलिये सबसे पहली ताकत की चीज जो खानी है वह सुबह की हवा। इस को प्राण वायु भी कहते हैं। यह प्रात:काल ही भरपूर मिलती है, इसलिये इसे खाने के लिये तुम्हे ये बिस्तर 5 बजे तक छोड़ना ही होगा। छोड़ोगे न? 

इसके अलावा, अंकुरित अनाज जैसे काला चना, मूंग, कभी सोया, या दूध, जो तुम्हे मुफिद लगे, रोजाना दोड़ लगाने के बाद जरुर लेना।    

असल में कई चीजें एक दूसरे से इस तरह से उलझी हुई हैं कि समझ नहीं आता की कैसे सुलझाई जायें। हम समय पर सोने की आदत नहीं बदलेंगे तो कैसे ताजा हवा का पान कर सकते हैं? 

ये देर से सोने और देर से जागने का चक्र तोड़ना कोई आसान काम नहीं है। उसने मुझे इस तरह से देखा जैसे मैने उसके मन की बात कह दी हो। बेटे, लेकिन ये चक्र तोड़े बिना भोर की बेला का आंनद भी तो नहीं मिलता। 

जब सुर्योदय से पहले बिस्तर न छोड़ने की लाचारी हमें इतना अभागा बना दे, कि घर की कोई परवाह ही न रहे। घर के सारे नित्य कामों को करके सभी अपने कामों पर चले जायें और आप बिस्तर पर ही अंगड़ाईयां लेते रहें। यह वही समय है जब आत्मचिंतन द्वारा भूल सुधार करके अपनें  ध्येय और कर्तव्यों को हृदय में आत्मसात कर लें।

रातोंरात पढ़ने वाले जब सुबह देर तक सोते हैं, तब वे अपनी नींद पूरी करते हैं। आप अपनी प्राकृतिक नींद के समय को बदलकर पठन पाठन कर रहे होते हैं, वह समय निंद्रा का होता है, यह नींद न लेने से सारे दिन थकान बनी रहेगी। 

आप दिन में सबको कहेंगे कि शोर न करो, मुझे सोने दो, तब आवाजें आपकी नींद में खलल पैदा कर ही देंगी, जिससे यह होगा कि सिरोवेदना या शरीर में थकावट, भारीपन अथवा लगातार मानसिक तनाव रहने से कुछ समय बाद नींद न आना जैसी गंभीर समस्यायें होने लगेंगी। अच्छा, अब चलता हूँ, तो बेटे कल आओगे क्या? 

Tuesday, June 2, 2020

सभी व्यस्त हैं


*सभी व्यस्त हैं*

रोता रहता था कि ये जिंदगी भी कोई जिंदगी है। 6 बजे वाली रेल पकड़ने के लिये वह रोजाना चाहे गर्मी हो या सर्दी हो 4.30 बजे उठ खड़ा होता था। गाय भैसों को सानी व न्यार करने के बाद थोड़ी देर वर्जिस और फिर नहाना साथ ही अपने कपड़े धोना ये ऐसा नियम बंध चूका था कि चाहे कुछ भी हो जाये ये अटल सा ही था। कई बार लगता था कि इतनी सुबह का निकला हुआ रात को 10. सवा 10 तक घर पहुचता है तो घर को केवल छूने ही जाता है क्या?  11 बजे तक खाना फिर आधे घंटा मां बाप के साथ बैठना और पत्नी से दो घड़ी  बातें करना बच्चे तो पहले ही सो जाते, और 12 बजे तक ऐसी आखें लग जाती कि एक बार भी करवट नहीं लेता, क्योंकी दिन भर की इतनी ज्यादा थकान को चारपाई ही चाहिये, बस। 

अच्छी बात ये थी कि वह शनी एैतवार  घर से न निकलता था,  दो सरकारी छुट्टियां जो होती थी उसकी। आजकल उसे घर में भी चैन न मिलने पाता था। वह अपने लड़के के लिये लड़की देखने जाता और शाम को ही घर लौटता। लड़के लड़की के  गुणों को मिलाने से भी अधिक उसे बहुत खुबसूरत, विश्व सुंदरी सी लड़की की तलाश रहती। विश्वास था कि उसके लड़के के लिए कोई ऐसी लड़की जरुर मिलेगी। पिछले एक साल में वह 20-25 से भी ज्यादा लड़कियों को नापसंद कर चुका है। 

आजकल, उसे अपने उन्ही रिश्तेदारों के यहां फोन पर याद दिलाने की हुड़क उठी रहती है जो पहले भी कई बार रिश्ते ला चुके हैं। छुट्टी की शाम तो इनके एक हाथ में घरेलू फोन और दूसरे हाथ में चाय तो कभी कड़वी दवा रहती  है। छुट्टी के दिन कोई ही बचता होगा जो इनकी फन्टियों में न आये। क्योंकी यदि सामने से ये भी कहलवा दिया जाये कि कह दो, नहाने गयें है अभी अभी, तो ये 10-15 मिनट बाद दौबारा फोन लगा बैठते हैं और छुटते ही पूछते हैं कि ये कौन सा टाईम है नहाने का। सामने वाला भोचंक रह जाता है। किसी को कहेंगे कि अच्छा जब सैर से लौट आये तो बता देना, की कोई जरुरी बात करनी थी, उनसे। इतने दिनों से सभी के लिये मुसीबत का सामान बने हुए हैं।

एक छुट्टी की शाम को जब दो-तीन पैग अंदर गये तो जनाब ने लगाया फोन अजमानी जी को। वे पहले ही से सावधान थे,  उधर से उन्होंने तो फोन नहीं उठाया लेकिन अपनी धर्मपत्नी को ये कह दिया कि कह दो कहीं बाहर गये हैं किसी काम से। आयेंगे तो बता देंगे। भाभी जी क्यों झूठ बोल रही हो आपके मुहं पे बिलकुल नहीं फबता।

आपकी आवाज से लग रहा है कि आप हमें बना रहीं हैं, सही में लगता है दूसरे कमरे में सो रहें हैं।आप उन्हे जगाना नहीं चाहतीं। आप उन्हें दही के साथ जो परांठे खिलाती हैं ना ये उन्ही का असर है, कई बार बता चुके हैं मुझे, एक दिन हमें भी तो खिलाओ भाभी जी, देखे हमें कैसे नींद आने पाती है, चलो मैं बाद में फोन करुंगा।

जैसे सूरज चढ़ता है वैसे इन्हे चढ़ने लगी, और बड़बड़ाने लगे अपने आप से ही, सारे मशरुफ हैं किसी न किसी वजह से, एक मैं ही हूँ चाहे कभी जरुरत नहीं भी है मुझे, फिर भी  मैं ही फोन करता हूँ। 


इच्छाओं से मुक्ति मिलती नहीं, करके देखा सो बार।
वहम दिल का ये बना, ईश्वर  करो ये दूर  बुखार। 
                                                           राजेश कुमार पूनिया

कैसे वह उस रात सो पाया, बड़बड़ा कर अगले दिन उसकी पत्नी उसे बता रही थी। क्या मैनें कुछ ज्यादा पी ली थी? क्या मैं किसी को गाली भी दे रहा था? नहीं गाली तो नहीं पर देने में कसर ही क्या रह गई थी। क्यों अपने दिल को दुखाने के लिए उन लोगों से फोन लगाते हो जो तुमसे अब बात करना नहीं चाहते, शायद तुमने उनके द्वारा बताये कई रिश्ते ठुकरा दिये थे इस लिए वे अब तुमसे बात करना मुनासिब नहीं समझते होंगे। 

आप बहुत मिलनसार और बड़े दिल वाले हैं इसलिये सबसे अपने दिल की बात करते हैं किसी से कुछ भी नहीं छुपाते। जब आपसे वे बात न करने के  इस तरह बहाने बनाते हैं तब मुझे उन पर क्रोध आता है और आप पर दया। एक आदमी जब किसी को याद करके फोन मिलाये कि वह हमारा मित्र है या रिश्तेदार और दुसरी तरफ से कोई आप से बात ही न करना चाहे तो, कितना बुरा लगता है ये उन्हे क्या मालूम।

भगवान ने इसलिये ही तो ये वायरस नहीं छोड़ा है दुनिया में, कि कोई किसी से सीधे मुंह बात तो करना नहीं चाहता इसलिये मुंह पर पट्टा ही डलवा दिया सबके। 

स्वर्गीय योगेश गौर जी (गीतकार)

* राजेश कुमार पूनिया * 
स्वर्गीय योगेश गौर जी (गीतकार) को अपने भाव समर्पित करता हूँ।


असल में  जैसे किसी भजन अथवा गीत की धुन बनाने की धुन को ही सुरत लगना कहते हैं। जब तक  वह धुन किसी भजन या गीत की आत्मा में इस तरह से न घुल जाये कि सुनने वाले की रुह या आत्मा को तृप्ति  ही न मिले तो समझो कहीं उसकी धुन या सुरत में कमी है। इसलिये ही लोगों से सुना भी होगा कि किसी भजन या गीत के शब्द या धुन इतनी अच्छी तरह से हमारी आत्मा को छू गये,  ऐसे लगा कि मरुस्थल में प्यासे को शीतल जल मिल गया हो।

यही खूबी थी स्वर्गीय श्री योगेश जी की गीतकारी में, दिल को सुकून इस तरह से पहुंचता है जैसे कि बिमार को मर्ज की समय पर सही दवा मिल जाये। खुद ही देखो ना..

                कहीं दूर जब दिन ढ़ल जाये, चाँद की दुल्हन बदन चुराये चुपके से आये,
                मेरे ख्यालों के आंगन में कोई सपनों के दिप जलाये, दिप जलाये।

या             जिंदगी कैसी है पहेली हाय, कभी ये रुलाये कभी ये हंसाये।

या फिर     बड़ी सूनी सूनी है जिंदगी ये जिंदगी, मैं खुद से हूँ यहां अजनबी अजनबी ।

जैसे          आये तुम याद मुझे, गाने लगी हर धड़कन, खुशबू लिये महका चंदन ।

और          मैंने कहा फूलों से हँसो, तो वो खिल खिला के हंस दिए
                और ये कहा जीवन है, भाई मेरे भाई हँसने के लिए

संगीत की दुनिया के अनमोल गीतकार की स्मृति में उनके लिखे गीतों को सुनकर बड़े हुए और बेपनाह प्यार करने वालों की तरफ से भावपूर्ण श्रध्दाजंली देता हूँ। भगवान अपने चरणों में उन्हें स्थान देवे। शांति शांति शांति





तेरी चुप्पी- कविता

तेरी चुप्पी

भगवान तुझे मानने वाले दुनिया में हैं कितने सारे
क्यों आज देख उन्हे लगता है कि हालातों से हारे

कभी कोई चीज चाही तो तेरे दर पर चादर चढ़ाई
माँ के मन्दिर में रत जगा कभी संध्या, चौकी कराई

तु सबकी सुनता है जो सच्चे दिल से तुझे पुकारे
आज पूरी मानव जाति फंसी है, क्यों? जूँ भी न रेंगे थारे

क्यों पत्थर हो गये  'भूख लगी है अब मुझे, कह नहीं सकते
हम भी भूखे कई दिनों से, अब और तेरी चुप्पी सह नहीं सकते

तुम बंद हो गये अंदर,  कैसे रह लोगे भूखे और प्यासे भी
यदि और नचाना अभी बाकि हो तो  देखेंगे वे तमाशे भी



जब गरमी सताये- शेर शायरी

रा
जेश कुमार पूनिया- की कलम से


जब गरमी सताये, बंदा सांझ को नहाये
समझो, रसीले आम खाने के दिन आये


सुबह शाम दिल जब तराने गाये

लीची, अंगूर, खरबूज, जामुन भाये


हल्की ब्यार सोंधी हवा और कोयल गाये

समझो रसीले आम खाने के दिन आये


रख दो थाली आम की अब जो काट ही लाये

मजा है तो जब है कतले आम तू ही खिलाये


दुआ है मेरी, जन्मदिन  नित्या का इस बार ऐसा आये

चिंता न हो परीक्षाओं की,  मजे से ब्लैक फोरेस्ट खाये 


है इस साल मजा नित्या का जन्म दिन मनाने का

क्यों हो गया इतना बुरा हाल इसी साल जमाने का


साले, हमे भी ऐसे कमरे में ठहरा देते हैं,

कि भाई पोपुलर की याद दिला देते हैं।


साहब, साले साहब ऐसा लज़ीज खाना खिला देते  हैं

हज़म भी नहीं होने पाता है, दूध मीठा पिला देते हैं


कार की डिक्की में मज़ा सोने का दिला देते हैं

हवा डिक्की तक ठंठी मिले एसी बढ़ा देते हैं


साला जीजा, जीजा, साला नजर आता है

इस सीट से,  रिश्ता, बदला नजर आता है



तुने कितने कसीदे काढ़े, कितने रंग भरे  फिर दुनिया का ये  हाल है

क्यों एक रंग जो दूनिया में सबसे ज्यादा बह रहा वह केवल लाल है


सोना चांदी कोई न खाता, पेट भरे सबका वही चावल रोटी दाल है

क्या लाये थे क्या ले जाना,  समझने को कितना ये अच्छा साल है






कोरोना मेेरी मान.. कविता



 कोरोना मेेरी मान..

क्या सोचा था तुम बहुत खुश होगे यहां आकर
हां हम मेहमान ही नहीं अतिथि का भी स्वागत करते हैं

बिगड़ें अगर वो किसी वजह से तो हाथ जोड़  मनाते है
घर आये कि इज्जत खातिर तो हम पैरों भी पड़ जाते हैं

तुमने सोचा होगा ये बेवकूफ हैं, इनसे ही पेच्चे लड़ाते हैं
हमने ढ़ील देकर ऊपर बैठा लिया, अब सद्दी तक ले जाते हैं

कटेंगे कन्ने से कनकव्वे, पंख जो तेरे फड़फड़ाते हैं
तुम ने सोचा होगा यहाँ भाई-भाई आपस में लड़ रहे हैं

यहां मेरा सही काम बन जायेगा
खुद ही आपस में लड़ रहे हो तो मुझसे कौन लड़ेगा

इतिहास एक पढ़ लेता बावले
कि जब भी बाहरी विपदा आई है
हम एक साथ खड़े हो जाते हैं

अब तुम्हारी यात्रा का अन्तिम पड़ाव है।
यहां तो डाक्टर ही जुगाड़ ऐसा बेठा देते हैं

कि बिमारी हो कैसी भी जड़ से खा जाते हैं
कोरोना, मेरी मान, अभी भी  निकल ले पतली गली से..


Monday, June 1, 2020

आजकल


*आजकल*

ध्यान करो,  अपने जीवन काल में कितने रिश्ते नाते निभाये होंगे।  ध्यान करो कि जब आपने सबसे बड़ी बेटी की ब्याह सगाई शहर से अपने गांव जाकर की थी। जिसमें सारी बहनों, बहनोईयों समेत, आसपास के कई गांवों का भाईचारा निभाया था।  शहर से सो दौ सो मील दूर जाकर शादी से पहले सारी चीजों का गांव में बंदोबस्त किया था। कई दिन पहले ही पूरे घर आंगन को पत्नी ने गोबर से लीप पोत दिया था। और बाहरी दिवारों को आपके घरों में ही से किसी भाई भतीजें ने सफेदी में नीला, आसमानी, हरा ,गुलाबी रंग मिलाकर दिवारों को सजा दिया था। अपने घरों ही से चारपाईयों, गद्दों, पानी का ड्रम, पल्लड़, कनातों का इंतजाम किया था। सभी रिश्तेदारों व जानकारों और दोस्तों के घर घर जाकर सम्मान सहित ब्याह में सम्मिलित होने का निमन्त्रण दिया था। 

घर में कई दिन पहले ही से हंसी ठठ्ठों, ब्याह के गीत संगीत, नाच गाने, और अपनी बेटी को हैसियत से अधिक सुख साधन देने की इच्छायें एवं तैयारियां, तो दिन व रातों का पता ही नहीं चलता था कैसे बीत जाते थे।  एक दिन पहले घर से लेकर पूरी गली में चांदी सोने का सा वैभव देतीं झालरें और उन के बीच से रात में दिखाई देते अनगिनत तारे देखकर ऐसा लगता मानो एक बारात के साथ दूसरी बारात आसमान से उतर आई हो। लड्डु, रसगुले, बर्फी और जलेबियों की मिठास के साथ केवड़े की खुशबू अपना पता स्वंय देती प्रतीत होतीं थी कि मिष्ठान भंडार (कोठार) इधर है।    

याद आया क्या? जहां घर के जिम्मेदार सदस्यों के अलावा कोई जाता नहीं था, हांलाकि घर के बच्चों को मिठाई मिल ही जाती थी, लेकिन पहले कुल देवता और  इष्ट देवों को भोग लगाया जाता।  ये बाते ज्यादा से ज्यादा 25-30 साल पुरानी होंगी। उन दिनों को याद करें तो ऐसा लगता है जैसे कि कोई ढाई-तीन घन्टें की पारिवारिक मूवी देख कर थियेटर से बाहर आये हों। 

आज उसी तरह से उनमें से कितने रिश्ते निभा रहें हैं। ध्यान तो करो जरा। बहुत ही कम बचे होंगे। रिश्तेदार भी केवल हैसियत देखकर बुलाये जाते हैं या जिनसे कुछ काम निकल बनता हो। आजकल पड़ोसियों के घर लगी हुई लाईटिंग से पता चलता है कि इस घर में शादी है और  किसी बैंक्व्ट हॉल  में प्रोग्राम है। 

वे धन्य आत्मायें  होंगी जिनके पूर्व जन्मों के  पुण्य कर्मों का संचित फल अपने पड़ोसी और रिश्तेदारों से शुभ कार्यक्रमों के निमन्त्रण पाये।