Saturday, June 6, 2020

तांडव


*तांडव*

हम सभी ऊपर वाले का शुक्रिया करना भूल चुके थे अब पल पल शुक्र करते है कि आज भी महामारी की चपेट में आने से बच गये आपका धन्यवाद प्रभु, आज का दिन भी ठीक से बीत गया। शाम के छ बज गये हैं और सभी कर्मचारीगण धीरे-धीरे घरों को कूच करने लगे हैं। मुझे आज सुबह के आठ बजे से कल सुबह के आठ बजे तक ड्यूटी निभानी है, यह इसलिये कि रोज-रोज के सफर और संक्रमण से बचा रहुँगा।

भगवन, अभी कुछ देर पहले एक दोस्त ने मुझे ऐसी बात कह दी कि मुझे उसका जवाब नहीं सूझा, जानते हो उसने क्या कहा, वह कहने लगा कि यदि आपकी सत्ता अगर है, तो फिर क्यों नहीं एक पल में सब कुछ सही कर देते, पहले की तरह? भगवन, प्रश्न में उसके दिल का दर्द भी दिखाई दे रहा था, और गुस्सा भी। 

वह यूँ तो आस्तिक है, लेकिन, अपनी खुली आँखों से जो देख रहा है, उसे अंदर से कचोट रहा है। उसने कहा कि मैं मंदिर में हर मंगलवार को प्रसाद चढ़ाने जाता था। जिन्हे भगवान के सबसे निकट माना जाता है, उन्हे मंगलकार्यों में अपने घर आने का निमंत्रण देता था, लेकिन आज, जब हम दुखी और हताश हैं तब उसने  मंदिर के कपाट ही बंद कर दिये। भगवन हमें तेरा सहारा था, लगता है लेकिन शायद नहीं था

ऊपर वाले तुम हम जैसे लाखों, करोड़ों के विश्वास हो और सदा रहोगे, फिर ये विलंब क्यों प्रभु? क्यों सबको अलग-अलग रहने पर मजबूर कर दिया? 

उस बालक की तो सोचो, कैसे वह माँ के स्नेह, प्यार दुलार से दूर रहेगा? दोनों हाथ जोड़कर विनती है ये तांडव अब बंद करें भगवन, बहुत हो गया।


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