Friday, March 29, 2019

थोड़ा दृष्टिकोण बदलें


थोड़ा दृष्टिकोण बदलें

हम सभी अपना जीवन शान्ति से जीना चाहते हैं, कोई भी अशान्ति नहीं चाहता होगा। क्या हम सभी शान्ति से जी पा रहे हैं? अगर जवाब नहीं है, तो इस बात को नजरअंदाज करने की भूल कदापि ना करें। आप अपने मन को काबू में कैसे करें जैसे टीप्स नहीं देने जा रहा मैं।

आपसे एक विनती है कृपया कुछ देर के लिये अपनी आँखे खोलकर (आँखें बंद करने से ध्यान लगता तो सभी ध्यानी हो गये होते, रात-दोपहर आँखे कौन नहीं बदं करता) अपने बीते अच्छे और बुरे वक्त पर एक नजर डाल कर विचारें करें कि क्या कोई भी समय कभी समन्दर की शान्त लहरों की तरह ठहर पाया। जवाब मिल ही गया होगा।

ना अच्छा समय रुका ना ही बुरा। असल में हम सब कठपुतली हैं, हमारे हाथ में कुछ है ही नहीं। बस वजह, बेवजह की इच्छाएं पाल बैठें हैं। आओ सम-दृष्टा बनकर हम ये अनुभव प्राप्त करते हैं। इसे यूँ समझने की कोशिश करते हैं, उदाहरण के लिए मान लो कि जिस खेल को आप पसंद करते हैं उसकी दो टीम हैं, एक टीम में वह खिलाड़ी है जो आपके अपने हैं, आप चाहोगे कि वही टीम जीते जिसमें आपके परिचित खिलाड़ी हैं, ठीक बात है ना। दर्शक-दीर्घा से उसे आप देख रहें हैं। खेल शुरु हुआ, जिसे आप जिताना चाह रहे थे वो टीम जीत जाती है। आप खुश हो गये। यदि ठीक इसके उलट परिणाम होते तो आप दुखी हो जाते, ठीक है ना।

आप अपने से ये सवाल पूछिए कि क्या आप खेल का पूर्ण आनंद ले पाये? आपको सही उत्तर मिल जायेगा। जब खेल के परिणाम पर हमारा आनंद व शान्ति निर्भर हो तब असल जीवन में सुख व शान्ति कहाँ। सम-दृष्टा की भाँति यदि हम केवल खेल का आनंद लेते तो हमें सही में सच्चे सुख व शान्ति का अहसास होता। ये अनुभव की बात है।

आसपास नित नई घटनाएं घट रहीं है। कई बार कई घटनाएँ हमें झकझोर देने वाली होती हैं और कुछ अच्छी खबरें भी होती हैं। लेकिन हम उन्हें इस तरह से लेते हैं कि वे हमें सच में ज्यादा दुखी या सुखी नहीं करतीं। बस केवल जानकारी के लिए हम उन्हें पढ़ते हैं, ताकि हम आधुनिक ज्ञान से वंचित ना हो जाएं। 

सभी अपने हैं, सभी एक से ही हैं, कोई छोटा नहीं कोई बड़ा नहीं, कोई ऊँच नहीं कोई नीच नहीँ, यही शुभविचार, धारण कर लें। केवल अपना दृष्टिकोण थोड़ा बदल लें तो नित्यानदं की अनुभूति होने लगेगी। हजारों, लाखों लोगों के ऐसे ही अनगिनत अनुभव हैं, केवलमात्र मेरा ही नहीं है।

हर देश में तू, हर भेष में तू, तेरे नाम अनेक तू एक ही है। आओ इस जात-पात की दलदली मानसिकता से बाहर निकलें और सब एक होकर घर-परिवार, देश में शान्ति व आनंद से रहें।

Wednesday, March 27, 2019

चाय की चुस्की


चाय की चुस्की

आखिर क्या फायदा हुआ चाय पीने से? मैनें जब ये सवाल स्वंय से किया तो मुझे कोई जवाब नहीं मिला। कहाँ तो  घर में भैंसें हुआ करती थीं। दूध, दही, मक्खन, लस्सी खूब खाते-पीते थे। उस दही का स्वाद अलग ही होता था। नौणी घी(शुद्ध मक्खन) आहा! खाने में क्या मजा आता था। एकदम फीका होने के बावजूद कभी भी उसे खाने की चाह खत्म नहीं हुई। 

अब जिस भैंस को बिनोले, जौ, गेहूं, जेई, ज्वार, तेल आदि, सरसों, मूगफली वगैरह की खली, ग्वारमल, नमक शीरा इत्यादि के साथ हरा व सूखा चारा आवश्यक एवं संतुलित मात्रा में दिया जाता हो उसका दूध सर्वोत्तम तो होगा ही ।

याद नहीं आता कि पहली बार कब करमजली चाय का स्वाद जीभ को लगा होगा। ये चाय तो ऐसी गले पड़ी कि आज तक न छूट सकी। जाने कौन घड़ी में इसके जाल में जा फंसे थे। शाम की चाय पिताजी के दफ्तर से लौटने पर मैं ही बनाने लगा था, जब वे कहते बेटा चाय तो पिला तेरे हाथ की चाय बहुत अच्छी लगती है। यूँ बनाते-बनाते कब चाय बनाने में मुझे महारत हासिल हो गई मुझे ही पता नहीं चला। मेरे हाथ की चाय में क्या खास होता मुझे खुद कभी ना मालूम चल पाया। अच्छी-सी चाय के लिए मुझे कहा जाने लगा। मेरे हाथ की चाय पीने से सबकी तबीयत अच्छी हो जाती। मेरी खुशी दोगुनी हो जाती जब कोई मेहमान हमारे घर आता उन्हें अपने हाथ की चाय पिलाता। उन दिनों, जब खासकर रतन अंकल एवं रतनी आँटी घर आते तो मुझे कहते कि बेटे तू क्या डालता है चाय में, बहुत बढ़िया है।

हर बार चाय पेश करने से पहले खुद चख कर देखता था कि कोई कमी तो नहीं है, बस यूँ ही चखते-चखते आदत पड़ गई। इसे पीते कितने ही वर्ष हो गये। अब क्या किया जाय। अड़तालिस का हो गया हूँ, लेकिन ये कमबख्त चाय पीछा ही नहीं छोड़ती मेरा। अब तो काया का रंग भी चाय के रंग जैसा हो गया है। चाय की चुस्की ने मुझे अपना आदि बना दिया।

आजकल, मैं जब दफ्तर से घर आता हूँ तो अपने बेटा या बेटी से कहता हूँ कि बच्चे चाय तो पिला। तुम्हारे हाथ की चाय में अलग ही स्वाद आता है, तो वो कहते हैं कि पापा अभी लाये, तब लगता है कि शायद मुझे उतनी अच्छी चाय ना भी बनानी आती होगी उन दिनों। ये माँ-पिताजी का अपने बेटे के प्रति स्नेह ही था कि उन्हें मेरे हाथ की चाय का स्वाद, शायद दूध-दही से भी ज्यादा अच्छा लगता था।  

Monday, March 25, 2019

अमरनाथ यात्रा

अमरनाथ यात्रा

ये बात वर्ष 1998 की है। मैं अपने दो दोस्तों के साथ कई दिनों के लिए तीर्थ यात्रा पर निकला। बस टु–सीटर थी जो क्नॉट प्लैस, दिल्ली से रवाना हो रही थी। जब हम वहाँ पहुँचे तो सभी श्रद्धालु अपनी-अपनी सीट पर बैठ चुके थे, हमारे बैठने के थोड़ी देर बाद ही बस ड्राईवर ने गाड़ी चलानी शुरू कर दी। मेरे दोनो मित्र एक साथ बैठ गये। मेरे पास वाली सीट पर जो व्यक्ति बैठा था वह भोले नाथ बाबा का पुराना भक्त प्रतीत हो रहा था। वह अल्प विराम के बाद मधुर वाणी से भजन गुनगुना रहा था, तकरीबन 10.30 बजे तक हम दिल्ली से बाहर निकल गये। पूरी रात बस चलती रही तकरीबन सवेरे 5.00 बजे बस जालन्धर जाकर रुकी।

सभी श्रद्धालु गाड़ी से नीचे उतर गये थे। हम सभी ने मुँह-हाथ धोकर ब्रेकफास्ट किया। सभी ने कुछ देर विश्राम किया तत्पश्चात गाड़ी आगे बढ़ी। सड़क के दोनों तरफ घने पेड़ों के बीच से धूप अपनी उपस्थिति दर्ज करा रही थी। सूरज की पहली किरण मानों चेहरें का मुहँ धो रही हो। कभी न भूलने वाला शानदार नजारा था। खेतों में लहलहाती फसलों की खुशबू पूरी बस में फैल गई। हम अब पहाड़ों की गोद में जा रहे थे, जैसे-जैसे बस चढ़ाई कर रही थी  किसी को मजा आ रहा था तो किसी को उल्टी, अगली सीट पर जो माता जी बैठीं थी वह नीबूं का अचार व खट्टी-मीठी टोफियाँ अपने साथ लाई थी। जब किसी का जी मिचलाता तो वह तुरन्त अपना डब्बा खोलकर अचार व टोफियाँ देने लगतीं।

बस में जो गाने चल रहे थे वे अब लगता था मानों कोई सुन ही नहीं रहा, सब का ध्यान गहरी वैलियों को देखने में रमा हुआ था। दूर वादियों में किसी को कुछ दिखाई देता तो किसी को कुछ और। 12 घन्टों के दौरान बस ने कितने पहाड़ों की फेरियाँ लगाईं कौन गिन सकता था। हम 10000 फीट की उँचाई पर जा पहुँचे थे इसलिए कुछ के कान बंद हो गये थे। सभी को सांस लेने में थोड़ी बहुत तकलीफ हो रही थी। बुजुर्गों को साँस लेते वक्त दबाव महसूस हो रहा था।

जब हम पीर-पंजाल पहुँच गये तो वहाँ से 10-10 गाड़ियों के आगे-पीछे आर्मी का दस्ता साथ चलने लगा। वह इलाका शैतानी-नाला के नाम से मशहूर था और आतंकियों का गढ़ माना जाता था। क्योंकी वहाँ पहले भी कई आतंकी घटनाऐं हो चुकी थीं। कई घंटे सफर के बाद हम सभी सुरक्षित पहलगाम पहुँच गये। लोग अब पैदल यात्रा कर रहे थे और यहीँ से हमारी भी पैदल यात्रा आरम्भ होनी थी, लेकिन हमने देखा कि एक छोटी बस चन्दनवाड़ी तक जा रही है। हमने वहाँ तक उस बस से जाना उचित समझा क्योंकि 16 किलोमीटर का रास्ता था।

आगे की यात्रा हमें खुद ही तय करनी थी, हम धीरे धीरे आगे बढ़े, पहला पड़ाव था पिस्सूटोप नामक पहाड़ की खड़ी चढ़ाई को पार करने के बाद उसी रात को हमें शेषनाग झील तक पहुँचना था क्योंकि वह पूर्णिमां की रात थी। हमने सुना था कि इस रात यदि शेषनाग किसी को दर्शन देवें तो उसके ऊपर प्रभु की कृपा होती है। उसके सारे दुख-दर्द मिट जाते हैं। संसार के सारे सुख उसके दास बन जाते हैं।

एक से बढ़कर एक भोजन व प्रसाद के पंडाल सजे हुए थे, हर तरह के पकवान व मिठाईयाँ हमें अपनी और लुभा रहे थे। हमने भोजनोपरान्त विचार किया कि हम काफी थके हुए हैं थोड़ा आराम कर लेते हैं जब शेषनाग दर्शन देगें तो शोर भी होगा ही,  हम भाग कर देखने पहुँच जाएगें हमारा टैन्ट उस झील के समीप जो था। देर रात को एक शोर सुनाई दिया जिसे सुनते ही हम उस और भागे, बहुत भीड़ लगी हुई थी। जब हम पहुँचे तो वहाँ कुछ दिखाई नहीं दिया। कोई कहता था कि सितारों का पुँज जैसा उस छोर से उस छोर तक दिखाई दिया था। हम अभागों की किस्मत में दर्शन नहीं थे, सो नहीं हुए। किस्मत को ना कोसें तो अच्छा हो क्योंकि उस रात जैसी रात हमने दोबारा नहीं देखी क्या खूब चाँद था! लग रहा था जैसे पहाड़ों की चोटियों की चाँद के साथ कोई प्रेम लीला चल रही हो या जैसे ऊचीं-ऊचीं चोटियाँ धीरे से चांद को गले लगा रहीं हों। चारों तरफ अनगिनत तारें सजे हुए थे, ऐसा नजारा ना पहले देखा ना सुना था।

दूसरे दिन, महागुनटोप की चढ़ाई करते हुए हम पंचतरणी पहुँचे। महागुटोप की चढ़ाई पिस्सूटोप की चढ़ाई से ज्यादा मुश्किल लगी। हम सभी को सांस लेने में भी दिक्कत होने लगी थी, चारों तरफ केवल बर्फ से ढ़की पर्वत श्रंखलाएं नजर आ रही थी। पंचतरणी पाँच नदियों के संगम का नाम है। यहाँ 11500 फीट की ऊचाँई  पर ग्लेशियरों की आभा बहुत मनभावन लगी। तीसरे दिन अन्तिम पगडंडी हमें गुफा की और ले जा रही थी। लगता था कि अब पैर फिसला के तब। 1.5 किलोमीटर पहले ही से हमें गुफा की हल्की सी झलक दिखाई दे रही थी। हम सभी वादियों से, बम-बम भोले की प्रतिध्वनी की अनुभूति बारम्बार कर रहे थे। जब सभी बाबा की गुफा के नजदीक पहुँचे तो सभी ने पहले हाथ मुँह धोया, नये वस्त्र धारण किये तदउपरान्त अपनी-अपनी मान्यता के अनुसार पूजा-अर्चना करते हुए सभी ने बाबा अमरनाथ जी के दर्शन किये।

ये मलाल हम सभी को था कि हमारे पहुंचने से पहले ही शिवलिंग प्राकृतिक रुप से आधा हो गया था। किसी ने ठीक ही कहा है कि मन चाही होती नहीं हर चाही तत्काल

Wednesday, March 20, 2019

धूंधली यादें


धूंधली यादें

अब एक धूंधली-सी याद ही बची है, मैँ उम्र में बहुत छोटा था, घर में रात होते ही शादी के गीत शुरु हो जाते, कई रात-दिन नाच-गाने चले। कई बार बड़े बाजार जाना हुआ, मेरी पसंद के कपड़े मुझे दिलाये गये। जिस रोज बारात जानी थी सभी तैयार हो गये थे। वहीं पास ही में एक मन्दिर में सभी ने प्रार्थना कि और बारात चल दी। मुझे नये कपड़े पहनाकर सजी हुई घोड़ी पर दुल्हे के साथ बैठाया गया, प्रोग्राम स्थल के नजदीक पहुँच कर सभी एक बार फिर से तैयार हुए। बैंड-बाजा बजना शुरु हो गया। हमारे आगे बहुत सारे बच्चे, कुछ आदमी और लड़कियाँ नाच-नाच कर नये-नये नोट हमारे ऊपर से वार कर उड़ा रहे थे, जिन्हें बैंड वाले उठाकर अपनी जेब में रख लेते थे, कुछ छोटे लड़के भी जिसे उठाते फिर रहे थे।

बैंड वाले तु-तु तु-तु, तु-तु तु-तु बजा रहे थे, साथ में ढोलक की ढम-ढम की आवाज लगातार सुनाई दे रही थी, लगता था कोई चलता फिरता मेला हो। चारों तरफ सभी उत्साहित लग रहे थे, सभी नये परिधानों के साथ सजे-धजे हमारे आगे-आगे चल रहे थे। समीप ही खेत दिखाई दे रहा था, दूसरी तरफ कच्चे घरों की गली थी, घरों को गोबर से लिपा गया था, कहीं गाय बंधी थी, कहीं पर भैंस। कुछ देर बाद हमें किसी के घर के आगे ढेर सारी बिजली की लड़ियाँ दूर ही से दिखाई दे रहीं थी, मुझे अब लग रहा था कि हमें शायद वहीं जाना है।

काफी देर बाद हम उसी जगह पर पहुँच गये। मुझे उस घोड़ी से उतारकर किसी ने थोड़ी देर अपनी गोद में ले लिया, और सारे एक बड़े से गेट के सामने आ गये थे, जिसे रंगबिरंगे फूलों की मालाओं से सजाया हुआ था। तभी वहाँ शादी के गीत गाती हुई कुछ अधेड़ और कुछ जवान युवतियों ने आना शुरु कर दिया। एक सुन्दर-सी महिला ने अपने हाथ में आरती की थाली ले रखी थी, जिसे वह दूल्हे के आगे गोल-गोल घुमा रही थी, कुछ लड़कियाँ अन्दर आने का प्रवेश कर (टेक्स) माँग रही थीं, वहीं कई लोग जो धोती-कुरता, सिर पर खंडुआ बाधें हुए थे, एक-दूसरे को फूलों की माला डाल कर गले मिल रहे थे। सभी धीरे-धीरे उस गेट से अन्दर प्रवेश करने लगे। मैं दूल्हे की अगुँलि पकड़कर उनके साथ-साथ चल रहा था। उस जमाने में घर की औरतें बारात में नहीं जाया करती थीं, वे घर पर ही खोड़िया नामक खेल खेलती थीं।

आगे चलकर हम एक बड़े से प्रांगण में पहुँच गये। ऊँची सी जगह पर बड़ी-सी दो कुर्सियाँ दिखाई दे रही थीं। मैं जाकर उस पर खेलने लगा था, जैसे कि वह कुर्सियाँ मेरे खेलने के लिये ही लगाई गई हों तभी किसी ने मुझे ऐसा  करने से टोका दिया था।

मैनें वहाँ कई तरह के पकवान खाये आखिर में दूध-आईसक्रीम का स्वाद चखा। देर रात सभी एक जगह एकत्रित हो गये रात को घर कब आये, याद नहीं आता। सुबह जब नीदं खुली तो घर पर था। पूरा परिवार दुल्हा-दुल्हन के खेल की तैयारी कर रहा था, एक बरतन में हरी-दूब व कुछ दूध मिला पानी डाल दिया। इस दूधिया पानी में जीजा जी को एक अंगुठी ऊपर से छोड़नी होती थी, जो पहले उस अंगुठी को लेगा वह जीत जाएगा, इस तरह तीन बार ये खेल हुआ,  एक खेल बड़ा मजेदार था जिसमें दूल्हा-दुल्हन बारी-बारी से एक दूसरे की मुठ्ठी खोलने की जोर-आजमाईश करते हैं।
  
चाची जी ने मुझे बुला कर कहा कि ये तेरी भाभी जी हैं, यहाँ बैठ, तुझे तभी लड्डू मिलेगा जब तुम अपनी भाभी से ये कहोगे, आपको बेटा मुझे लड्डू मैनें जैसे ही ये वाक्य पूरा किया मेरी पीठ पर एक मुक्का पड़ा। ये रशम है ऐसा बताया गया। फिर भाई-भाभी को एक-एक सूंटक (पतली सी टहनी) दी गई और एक दिखावटी पिटाई का खेल खेल हुआ।
अब समय आया थापा लगवाने का जिसमें कई और बच्चों के साथ मुझे भी अपनी कला दिखाने का मौका मिला, मैंने बार्डर की क्यारियों में कई रगं भरे जहाँ उनकी हथेलियों को हल्दी व मैहंदी में रंगकर छापा था। तब तक कई मेहमान जाने की तैयारी करने लगे थे। अंत में मेरे मेरे चाचा, ताऊ, मामा, नाना तथा अन्य मेहमान भी जाने लगे थे। कई मेहमान नव-युगल को अपना प्यार व आशिर्वाद दे रहे थे, मेरी माँ व चाची सभी मेहमानों को जाते समय एक-एक मिठाई का डब्बा दे रहीं थीं। इस तरह मेरे चचेरे भाई की शादी सम्पन हुई थी।
आजकल के दौर में कहाँ वो अपनत्व, कहाँ वो प्यार।  

Monday, March 18, 2019

उसी आगंन में


उसी आगंन में

गौरय्या घर के आँगन में यहाँ वहाँ ऐसे फुदक रही थी मानों हमने उसे पाल लिया हो, ना किसी से भय ना संकोच यहाँ से वहाँ इठला इठला कर बैठती फिर फुर्र करके उड़ जाती। पैरों के आगे आगे चलती तो लगता कहीँ पैर तले दब ही ना जाए। मुंडेर पर मोर अपनी अलग ही छटा बिखेरता नजर आता, हल्की सर्द हवाऐं, गुनगुनी सी धूप, इत्र की मानिंद चारों तरफ फुलों-कलियों की महक सभी के मन के भीतर नई उमंग भर देती।

उसी आगंन में हमारे यार दोस्तों का जमघट लगता तो लगता कि हमारे से ज्यादा मजे में कौन रहता होगा। एक दिन बात छिड़ गई कि साधू बाबा तो वो बनते हैं जो लोग घर की जिम्मेदारी नहीं उठा पाते या जो परेशानियों से डर जातें है।
उस दिन मेरे घर मेहमान, जो धार्मिक प्रवृति के हैं, आये हुए थे उनका कहना था कि:

बिनु सतसंग विवेक न होई। राम कृपा बिनु सुलभ न सोई।
सत संगत मुद मंगल मूला। सोई फल सिधि सब साधन फूला।

संत की संगति बिन विवेक नहीं होता। प्रभु कृपा के बिना संत की संगति सहज नहीं है। संत की संगति आनन्द एवं कल्याण का मूल है। इसका मिलना ही फल है। शेष तो इसके फूलमात्र हैं। बात सोलह आने सही लगती है, शायद आप भी सहमत होगें! कोई यूँ ही भगमा-बाना (गेरुवे वस्त्र) नही पहनता अर्थात साधू-संत नहीं होता, कभी परिस्थितियों-वश तो कभी संस्कारों वश बनते हैं।

जैसा निश्चल प्रेम माँ का नवजात शिशु के लिए होता है जिसे उसने जन्म दिया हो, उसके लिए सारे कष्ट सह लेती है, लेकिन बालक को तनिक भी कष्ट नहीं होने देती, हो सकता है कि वो बालक भी उतना ही निश्चल प्रेम करता हो अपनी माँ से। ये निश्चल प्रेम है उसे शब्दों में परिभाषित कैसे किया जाए, ये अनुभव ही कर सकते हैं।

लैला-मजनू, हीर-रान्झा, सोहनी-महीवाल, रोमियों-जूलियट, कलियोपाट्रा-मार्क एन्टोनी, सलीम-अनारकली, शशीह-पुन्नू, जाने कितने ही नामों को हम इसलिए ही याद करतें हैं कि वे एक दूसरे को दिलो-जाँ से चाहते थे, उनकी रुह एक आईना थी जो अपने प्रेमी-प्रेमिका को दूर रहकर भी देख लेती थीं, वो जिस भी हाल में होते, वही हाल इधर भी होता। क्या अदभुत दिलों का प्यार था! जो समीप न होकर भी बेहद पास अनुभव होते थे, यही निश्चल प्रेम, जो हमें परमात्मा के दर्शन या अल्लाह, की इबादत कराता है। बाकी तो शायद वहम हो।

Tuesday, March 12, 2019

सभी अच्छे हैं



सभी अच्छे हैं

हर व्यक्ति विशेष है, यह बात और है कि हम उसे ही विशेष या अच्छा समझने लगते हैं, जिसे हम अपने अनुरुप पाते हैं। तो लिजिए, आज चन्द दोस्तों की बात की जाए।

एक महाशय, जो कोई भी विषय हो अपनी बात को नीचे ही नहीं गिरने देते, मैं व्यक्तिगत तौर पर जानता हूँ, वह हैं तो बड़े अड़ियल स्वभाव के, लेकिन दिल के एकदम साफ हैं, कोई छलावा नहीं, कोई बात हो तो तुरन्त हिसाब कर देते हैं, कोई बात दिल पे नहीं लेते, जो कहना होता है, सामने ही कह देते हैं। हम उनका मज़ाक भी बहुत उड़ाते हैं, उनकी सहनशक्ति की तारीफ करनी चाहिये कि वे सब सहन कर लेते हैं। वे तन्ख्वाह वाले दिन अपने बैंक से कोई भी पैसा नहीं निकालते उनका मानना है कि ऐसा करने से उनके खर्चे कम हो जाते हैं, ये उनकी खासियत है। उन्हें प्याज पसंद नहीं है, उसे छेड़ने के लिए लन्च करते समय उनके सामने कोई न कोई प्याज रख देता है, तो वह प्यार से वही प्याज हमारे सामने रखते हुए एक मीठी सी मुस्कान देते हैं, और सभी एक जोरदार ठहाका लगाते हैं।

एक और महाशय, दिल के नाजुक, लंबी-लंबी फेंक कर सभी को हँसाने वाले, उन्हे दुसरे की खिल्ली उड़ानी तो अच्छी लगती है, लेकिन इसके उलट, खुद के लिए एक भी मजाक सहन नहीं कर पाते और तुरन्त आपे से बाहर हो जाते हैं, गुस्सा जैसे बे-मौसम की बिजली कड़क जाए। किसी को अन्दाजा ही नहीं होता कि वह कब कपड़े फाड़ दें या बंदे की छाती पे जा बैठें।

वहीं एक जनाब चुपचाप रहने वाले भी हैं, जो दूसरों की कमियों को देखते रहते हैं और समय आने पर उन्हें भुनाने से बाज नहीं आते, वे रहस्यमयी जीवन जीते रहते हैं, उन्हें दूसरों की मदद से कोई लेना देना ही नहीं, जबकि उन्हें कभी सहायता चाहिये हो तो फोरन आ धमकते हैं।

एक बार किसी अन्य दोस्त ने हमसे कुछ रुपये की मदद माँगी थी, चूंकि मेरे पास भी उस वक्त उतने रुपये नहीं थे तो इन जनाब से कहा कि मुझे किसी दोस्त की सहायता करनी है, आवश्यक धनराशि यह कह कर माँगी कि कल आपको लौटा दूँगा, उन्होंने तुरन्त टका सा जवाब दे दिया कि मैं किसी और की सहायता के लिए तुम्हें रुपये नहीं दे सकता। मैं उन्हे देखता ही रह गया और फिल्मी गाने के बोल याद आ गये, बाप बड़ा ना भैय्या, सबसे बड़ा रुपइय्या। अलबत्ता, वही मदद मुझे एक नये परिचित साथी से मिल गई, पर एक बात जो सभी में कॉमन है कि सभी दिल के अच्छे हैं।

वो (भगवान) बड़ा मेहरबान है। सब एक से तो नहीं होते ना।

मधुर भजन


मधुर भजन

एक बार मुझे आस्था चैनल पर एक साधु महाराज जी का प्रवचन सुनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ, उस समय सुबह के 8.00 या 8.15 बजे होंगे, मैं उनके प्रवचन के बीच में भजन सुनकर आत्मविभोर हो गया, आत्मिक सुख देनेवाली आवाज के धनी बाबा का भजन ह्र्द्य की गहराई को छू रहा था, 10 मिनट भजन सुनने के बाद मुझे पुरे दिन एक अलग ही आनन्द की अनुभूति हुई, कई दिन तक मुझे भजन के शब्द थोड़े याद रहे, फिर केवल एक लाईन ही याद रही जो थी, ई ऐसे ही ना मानी हैं कई महीनों बाद मुझे ये भजन बहुत याद आ रहा था, लेकिन ना तो साधु बाबा का नाम याद था, ना ही ठीक से भजन के बोल।

हरि बिन संकट कौन निबारे, मुझे कुछ भी सूझ ही नहीं रहा था, मेरी उस भजन को सुनने के लिये व्याकुलता बढ़ती जा रही थी, कि कहीं से वहीं मनोहारी भजन दोबारा सुनने को मिल जाए, कई बार आस्था, संस्कार, आदि चैनलो को देखा, पर दौबारा उस भजन को ना सुन पाया। सोचा कि यू-ट्यूब से मिल जाऐगा, लेकिन वहाँ से भी निराशा ही हाथ लगी।

काफी अरसे बाद आज जब में ये बात भूल गया था, अचानक एक यू-ट्यूब का लिंक आ गया. जो उन्ही सन्त का था, मैं उनके चेहरे को पहचानता था, इसलिए उन्हे देखते ही भगवान का शुक्रिया किया, उनका नाम स्वामी श्री राजेश्वरानन्द जी था, चूंकि, बिना किसी विशेष प्रयास के ही ये लिंक मिल गया था, इसलिये मैं अपने आप को बहुत भाग्यशाली समझ रहा था, और सोच रहा था कि, बिन माँगे मोती मिले, माँगे मिले न भीख, हे ईश्वर तु महान है, अनेक धन्यवाद।
विधि का विधान कोई जान ना पायेगा, मैंने उनके कई भजन लगातार सुने,

सन्तों के संग जिनका प्रेम हो,
सन्तन के संग लाग रे तेरी बिगड़ी बनेगी,
संत-संगती की अदभूत महिमा,
यहाँ मिट जाते दाग रे तेरी बिगड़ी बनेगी।
अभी भजन सुन ही रहा था, कि एक और लिन्क ने मेरी खुशी छीन ली, जिसमें उनके ब्रह्मलीन की खबर छपी थी, वे ह्रद्याघात से 10 जनवरी 2019 को चल बसे थे। दिल बहुत आहत हुआ जाने ऐसा क्यों होता है जो मन को भाता है...।

Thursday, March 7, 2019

गतांक से आगे..

गतांक से आगे..

एक और दिलचस्प किस्सा याद आ रहा है, एक लड़का जो डीजल जैनरेटर का मैकनिक था, वह भी शराब के नशे में चूर रहता था, ना खाने की सुध रहती ना ओढ़ने पहनने की, किसी की शादी-ब्याह हो तो उसे कौन रोक सकता था, किसी के मरे पर भी उसे दारु से परहेज ना होता, पुरे गाँव भर में वही एक ऐसा शख्स नहीं था उस गाँव में लगभग हर गली में एक से बढ़कर एक शराबी बसते थे। जब कभी उनसे बात होती तो दूर से ही होती क्योंकी  शराब की गंध उसके मुहँ से आती जोकि बेहद नागवार गुजरती। उसके दो भाई ओर भी थे जो उससे छोटे थे, 8वीं 9वीं में पढ़ते थे, जब बड़ा भाई रात गये घर न लोटता तो उन्हें रात को गाँव की गलियों से, शराबियों के ठिकानों से, कभी नाली से उठा कर लाने की जिम्मेदारी दे रखी थी, नशे में धुत अपने बड़े भाई को ढूंढने के कारण वे कभी-कभी अपना होमवर्क भी पूरा नहीं कर पाते थे।
पानी केरा बुदबुदा, अस मानुस की जात,
एक दिना छिप जाएगा, ज्यों तारा परभात.

कबीर जी ने कहा है कि, जिस तरह पानी के बुलबुले, इसी तरह मनुष्य का शरीर क्षणभंगुर है। जिस तरह प्रभात होते ही तारे छिप जाते हैं, उसी प्रकार ये देह भी नष्ट हो जाएगी, उसे अपनी जीवन लीला समाप्त होती नजर आने लगी थी, कुछ दिनों से वह दुखी रहने लगा था, वह चाहकर भी शराब छोड़ नहीं पा रहा था, वह मन ही मन अपने आप को कोसने लगता, मजबूरीवश जैसे ही शाम होती उसके कदम ठेके की और तेज गति से बढ़ने लगते, यूँ ही उसकी जिन्दगी चल रही थी। 
  
एक दिन उसे स्वप्न में कुछ दिखाई दिया और मन में हरिद्वार जाने का विचार पक्का कर लिया, केवल मन ही किसी व्यक्ति का मित्र या शत्रु हो सकता है। उसके पास एक हजार रुपये शेष थे, उसे ज्ञात था कि वह सात सौ रुपये में वहाँ जाकर आ सकता है, उसने उसी शाम 200 रुपये कि शराब की बोतल खरीद कर पी ली, और अगले रोज जाने की तैयारी कर ली, अब केवल 800 रु. ही बचे थे, उसने सफर के लिए पच्चास रुपये का एक पव्वा खरीद लिया और चलने लगा, चलते चलते फिर उसी सपने का विचार मन में आया, वह भाग कर पव्वा वापस करने गया, और रुपये वापस ले लिये, ठेके वाला उसे कई सालों से जानता था, इसलिये उसने बिना आनाकानी के रुपये वापस लौटा दिये, और कहने लगा कि आज क्या हुआ, आज तक तो कभी तुम लोटाने नहीं आये, वह बिना कोई जवाब दिये वहाँ से चल दिया।

हर की पौड़ी पर जा कर ही दम लिया। वहाँ पहुँच कर उसने प्रार्थना की हे भोले नाथ, मैं ये सपथ लेता हूँ कि आज से कभी भी शराब को न छूऊँगा। जब वह वहाँ भ्रमण कर रहा था उसे एक लड़की से प्यार हो गया और कुछ दिन बाद उसे ब्याह कर अपने गाँव ले आया। उसने दौबारा से अपना काम करना शुरु कर दिया, गाँव मे डीजल जैनरेटर का बहुत काम मिलने लगा, आज उसके दो लड़के हैं जो पढ़ाई कर रहें हैं।

देखिये विधाता का करिश्मा एक शराबी को कैसे नेक राह दिखा दी, उसे बदल दिया, इस तरह वह गाँव वालों के लिये मिसाल बना गया, उसे देखकर दुसरे साथी भी शराब छोड़ने लगे। 

Wednesday, March 6, 2019

PASTOR हो गये

PASTOR हो गये

बात पुरानी है, एक लड़का जिसके जीवन में अनेक विघ्न बाधाएं आई , पहले तो 15-16 वर्ष की उम्र में उसके पिता जी का देहान्त हो गया फिर माँ की तबीयत खराब रहने लगी, देखरेख करने में वह इतना थक जाता था कि अपनी पढ़ाई लिखाई सही से नहीं कर पाता था, समय ने उसे इतना तोड़ दिया कि वह जीवन से हारने लगा,  उसे मर जाने के विचार घेरने लगे, जीवन घोर अंधकारमय दिखने लगा, चारों दिशायें उसके अन्दर एक भय उत्पन करने लगीं, लेकिन उसने कठिन मेहनत की और सरकारी नौकरी मिल गई, उसे एक नई राह दिखाई देने लगी थी, अब  सब तरफ एक नई उम्मीद जग रही थी। थोड़े दिनों में ही उसकी शादी हो गई, और उसके बाद वह सारे शौक पुरे करने लगा, कभी फिल्म तो कभी पत्नी के साथ यहाँ वहाँ पार्टी, पिकनिक में जाता।

कुछ समय बाद वह धीरे धीरे कभी शराब पीकर कभी सिगरैट पीता नजर आता, लेकिन कुछ सालों के बाद अपनी तन्ख्वाह का बड़ा हिस्सा वह  शराब और सिगरैट में खराब करने लगा, उसे कोई भी दिन हो शराब जरुर चाहिए होती, धीरे धीरे उसे शराब की लत इस कदर लग गई कि कभी अपने घर ही नही जाता और दफ्तर में ही सो जाता अब सभी उसके बारे में सहकर्मी आपस में बात करने लगे और चिन्ता करने लगे कि उसे कैसे सही राह पे लाया जाये, वह अब उधार भी मागंने से नहीं हिचकता था, जब किसी से उधार लिया तो वापस नहीं देता इस वजह से दफ्तर के यार-दोस्त भी अब दूरी बनाने लगे उससे, कभी बिना खाये ही सो जाता, सुबह कुल्ला भी शराब से शुरु हो चुका था, शरीर धीरे धीरे क्षीण होने लगा था, उठने बैठने में उसे दिक्कतें होने लगीं थी, लैट्रीन में उसने एक रस्सी बाधं रखी थी जिसकी सहायता से वह टोयलेट में बैठता था। 

एक बार मैने भी उसे समझाने की नाकाम कोशिश की थी, उसने मुझे हसँ के कहा था कि मेरे दोस्त ऐसी कोई बात नहीं चिन्ता ना कर। एक दिन उसने सरकारी नौकरी भी छोड़ दी थी या उसे बर्खास्त कर दिया था पता नहीं लेकिन नौकरी चली गई थी। बीस साल बाद एक मित्र ने बताया कि वे अभी जिन्दा हैं और Pastor  हो गये हैं,  ये सुनकर मुझे हैरानी भी हुई और उपरवाले पर भरोसा भी।