Sunday, May 31, 2020

सोचता हूँ- कविता


*सोचता हूँ *


कैसे जातियों के जंजाल में पड़कर, ये मानव घन चक्कर हो गया
एक चोला एक जाति  था, इतना अंधा , गधा घोड़ा खच्चर हो गया

हैं छेद यहां बहूतेरे दिलों में, रफू करने वाला रफू चक्कर हो गया
ढूंढा यहां वहां उसे ताउम्र,  यूँ ही दूनिया का एक चक्कर हो गया

प्यार दिल ही में करते रहे हरपल, दिल न जाने कब कबूतर हो गया
थी सतरह बरस में गुटर गुं, वो बांका जवां अब उम्र सत्तर हो गया

अब टांगें बांकी, है मेहमधु रानी, रक्तचाप सौ जमा सत्तर हो गया
घर रानी बिन जीवन फीका, दिन ब दिन हाल बद से बत्तर हो गया

सोचा न था पाठ हमें कभी ऐसा पढ़ायेगा कैसे पुत्र कलत्तर हो गया
घर घर का यही हाल है, पैदा हों फिर काटें जैसे डेंगू मच्छर हो गया

क्लच का है मोटर में जो काम, वैसे बुजुर्ग घर का  क्लचर हो गया 
चुप अच्छा, रहो एक कोने में, बीच में बोले तो लैक्चर हो गया

बेशक



ा बेशक ा


हमारी कोशिश रहती है कि जो भी अच्छा है हमें मिले, सभी खुशियां हमारे जीवन में रहें, लेकिन हम बहुत छोटी छोटी खुशियों को नहीं देख पाते, हमें वही खुशी नजर आती हैं जो हमें भोतिक सुख प्रदान करती हैं बाकि तो सब बाते तुच्छ ही नजर आती हैं। माना हमें बचपन से यही सिखाया गया होता है कि खूब पढ़ लिखकर बहुत बड़े अफसर बनो, ताकि दुनिया की सारी खुशियों को तुम पा सको, बस फिर हम उसी राह पर चलते रहतें हैं और एक दिन उस मुकाम को हासिल भी कर लेते हैं जिसकी हमारे माता पिता के साथ हमने भी इच्छा की थी,

बुजुर्गों की सारी बातें सही हैं या नहीं कह नही सकते लेकिन, ये बात मुझे अब समझ आने लगी हैं कि उच्च शिक्षा से उच्च पद तो मिल सकता है लेकिन उन सारी खुशियों का क्या, जिसे हम तलाश रहें हैं जो धन से हासिल ही नहीं हो सकती, कुछ ऐसे ही व्यक्तियों को हम व्यक्तिगत तौर पर जानते भी हैं, जिनके पास धन दौलत की कोई कमी नहीं है मगर, दुखी हैं उदास हैं, जीवन से हताश हैं। 

सुख नहीं मिल रहा क्योंकि बेटे साथ नहीं रहते, या अपने पास रखना नहीं चाहते। पत्नी चल बसी और अपना शरीर साथ नहीं देता। कई बिमारियों ने जकड़ लिया। बेटियों ने मुड़ कर नहीं देखा शायद इस डर से कि उन्हें ही ना देखभाल करनी पड़ जाए। जिन्होने, बच्चों के लिए सारा जीवन खपा दिया, दिन और रात नहीं देखा। उन्हें इस लायक बनाया कि अपने पैरों पर खड़े हों जाऐं।

आज वही मां बाप सांसारिक जीवन की उन खुशियों से मरहूम हैं जिनके होने मात्र से इन्सान प्याज, चटनी के साथ रोटी खा कर भी रह ले। लगता नहीं कि हम इन खुशियों को कहीं से खरीद सकते हैं।
बेशक, हम इन बुजुर्गों के साथ बैठ कर इन्हे खुशी के पल दे सकते हैं। आपसे और क्या चाहिये, बस, इनके पास बैठकर दो बोल प्यार के बोलें और आनन्द से रहें।


Friday, May 29, 2020

संसार


संसार

जीते जी जिसे अपने पास नहीं रखना चाहा, यहां से ले जाओ, इन्हें संभालना बस की बात नहीं। थोड़ा स्वभाव चिड़चिड़ा हो ही जाता है बुढ़ापे में। एक कहे हमारा कोई लेना देना नहीं, तुम्ही देखो, और भी जाने क्या क्या सुनना पड़ा था। उन्होनें अपने सारे फर्ज अच्छे से निभाये। जाने, परवरि़श में क्या चूक हुई।

क्या अजब बात है, उनकी प्राण विहीन फोटो पर पुष्पार्पण और अश्रू बह रहे हैं। इस दोमुहे संसार को देखकर आँसू आँखों में ही गुम हैं। यह प्रेम, प्रीत, कोई समझाये। 
तेरी माया तू ही जाने।
**
प्राणघातक गंभीर रोग से पीड़ित को कोई कुटिल हंसी में कहे कि सब कर्मों के फल हैं यहीं भोग कर जाना पड़ेगा। वह बीमार का हाल जानने आया है।  ऐसे भी क्या मनमुटाव, जो असाघ्य रोगी के मुंह पर ही कटु शब्दों के रुप में ज़हर घोलें?  
जब बीमार की जीवन लीला समाप्त हो गई तब वही, दि्वंगत आत्मा की शांति के लिये कबीर वाणी सुनाते हैं कि- 
                 एैसी बानी बोलिये, मन का आपा खोय।
                औरन को शीतल करै, आपौ शीतल होय। 
तेरी माया तू ही जाने।
*****
बूढ़ा होना ही सौ बीमारी के बराबर होता है, ऊपर से थोड़ा वहमी हो तो और भी मुश्किल। बूढ़ों को उसके बच्चों को दिये संस्कार ही रोटी खिलाते हैं। वह, अगल पड़े अपने मां बाप से मिलने जाता, महीने बीस दिन में।

वे इसी लायक हैं, कहकर पत्नी ताने मारती। शायद इसी दुख में वह पीने भी लगा था। इस तरह कई साल गुजर गये। वह कहती कि तु मरे तो मुझे चैन मिले। और एक दिन वह चल ही बसा, सबकी जरुरतेंं पूरी करते करते। 
परिवार से प्यार बहुत था। बेटा, बेटियों को नैनों में बिठाकर रखता था। गजब है, मुखाग्नि देने वाला उसका बेटा कहता है कि पढ़ा लिखा दिया तो क्या नया काम कर दिया? ये तो सभी करते हैं, अपने बच्चों के लिये। और ऐसा क्या कर दिया?  तेरी माया तू ही जाने। 
              क्या सोव गफ़लत के अंदर, जाग जाग उठ जाग रे
              और बात  तेरे काम न आवेै, रमतां के संग लाग रे
                                                 'भक्त कबीर'
********
दोस्त से बड़ी कोई हस्ती नहीं होती। इसीलिये दो + हस्ती को मिलाकर ही दोस्ती बना होगा। ऐसा दौर भी आया होगा जब, ये दोस्ती हम नहीं छोड़ेंगे, तोड़ेंगे दम मगर तेरा साथ न छोड़ेंगे, जैसे अनगिनत गाने साथ गाये होंगे। आज कहां हैं हम और कहां हैं वो।  
तेरी माया तू ही जाने।
**
वृद्धावस्था भी मति पर कैसे डाका डालती है कि आदमी अपनी प्राण प्रिय पत्नी, बेटे एवं बेटियों तक का नाम भूल जाता है। गजब की बात है कि मां बाप और भाई बहनों के नाम याद हैं।
नहीं पहचानते, कि मेरा नाम क्या है, और मैं उनका बेटा हूँ, लेकिन जब पूछो कि आपके भाई बहनों के नाम क्या हैं?, गावं का नाम क्या है?  तो सभी नाम व बातें बखुबी याद हैं।  
तेरी माया तू ही जाने। 
**


Monday, May 25, 2020

छोड़ झमेला

*छोड़ झमेला*

कौन अच्छा है कौन बुरा है। यह धारणा  बनाने से पहले आओ कुछ विचार करें। एक यंत्र जो ध्वनि ग्रहण करता है, जिसे हम रेडियो कहते हैं। उसमें यांंत्रिक प्रणाली होती है, जो किलोह्ट्ज की भाषा में होती है। उसका सरल अर्थ होता है कि एक किलोह्टज अर्थात एक हजार चक्र प्रति सेैकिंड। 

रेडियो फ्रिक्वेंसी के अलग अलग आयाम होते हैं जिन्हें  लघू तरंग, एएम, एफएम के मोड्यलेशन कहते हैं। जब हमें किसी आवृति (Frequency) पर कार्यक्रम को सुनना अच्छा नहीं लगता तब हम दुसरी फ्रिक्वेंसी तलाशने लगते हैं। हम जब चाहे रेडियो की फ्रिक्वेंसी बदल सकते हैं। 

हम सांसों को रोक कर देखें, यहां यह बात समझने वाली है कि हमने रोकने का भरसक प्रयास किया लेकिन कुछ समय बाद ही सांस रोक नहीं सके। क्या उसी प्रकार अपनी सांस जब तक हम चाहें बाहर रोक सकते हैं? यहां हमारी एक नहीं चली।  हमारे सो जाने के बाद कोई तो है जो हमारी धड़कन को चला रहा होता है। अपने आप ही सांस आती जाती है। हम तो सोये होते हैं। 

परमात्मा की फ्रिक्वेंसी इसी शरीर रुपी रेडियो यंत्र में ही है। हमें वह फ्रिक्वेंसी नहीं मिली तो फिर चाहे सारा जगत अच्छा हो, हमें सब मे बुराई ही दिखाई देगी और आत्मानंद की  प्यास बनी रहेगी। 

छोड़ झमेला झुठे जग का, कह गये दास कबीर,
 पार लगायेगे एक पल में तुलसी के रघुबीर.


Wednesday, May 20, 2020

एक बात

*एक बात*

एक बात जो हम सभी को अंदर से झकझोर रही है वह यह है कि और कितने दिनों तक ऐसे ही  डर डर  के जियेंगे हम लोग? यह डर बोर्ड की परीक्षा  में बैठे हुए उन छात्रों के डर से हजार गुणा अधिक है जिनके मन में  नकल करते हुए पकड़े न जायें यही  भय रहता है। जैसे  ही कोई पर्यवेक्षक ऐसे विद्यार्थी के आसपास आता है वह घबराने लगता है। पसीने से हाथ पसीज जाते हैं, कि कहीं पकड़े गये तो क्या होगा? 

वह परीक्षा केवल तीन घन्टे की होती है, फिर भी जब परीक्षा केन्द्र से बाहर निकलते हैं तो कई घटों तक वह मानसिक दबाव हमें सहज नहीं होने देता। हालांकि, यह भय केवल उन छात्रों को ही रहता है जो नकल मारते हैं, कुछ बच्चे सबसे अधिक अंक लाने के दबाव में जरुर रहते होंगे। वह दबाव आनंद और विश्वास जगाता है।

लेकिन यहां तो तीन महीने होने को आये,  कोई पल नहीं जाता जब यह डर न सता रहा हो। सभी को दबाव है कि  कहीं उन्हें यह रोग हो गया तो ईलाज भी नहीं मिलेगा और इस स्थिति में तो चीटींग करके भी पास नहीं हो सकते, बताना भी आवश्यक है।  कैसे इंसान इस दबाव को झेले समझ नहीं पा रहा। 

वाह रे ऊपर वाले,  दुनिया में यूँ ही हाय तौबा मची हुई थी, अब कैसे सब जरुरतें सीमित हो गईंं हैं। 

माँ सी


*माँ सी*

देखो आजकल दुनिया में चारों और घोर अंधेरा नज़र आ रहा है। जब माँ अपने बच्चे को आँचल में  सुलाती है तो कमरे में चाहे कितनी ही रौशनी रहे लेकिन बच्चे की आँखो को अपने आँचल से इस प्रकार ढ़क लेती है कि वह आराम से सो सके। उसे तेज रौशनी की चोेंध न लगे। 

प्रकृति माँ ने हमें वही प्यार हम सब को देना चाहा है। हम जग की चकाचौंध में सुकून की नीदं लेना ही भूल गये थे। अब समय आया है कि धरती रुपी माँ की गोद में रहकर कुछ समय बिछौना अंबर को बनायें । भाग दौड़ बहुत कर ली अब तनिक एकान्त विश्राम किया जाये। 

प्रकृति बार-बार यह समझाती आई है कि वह अपने बच्चों के लिए सदा भला ही करती आई है जैसे की सबकी मां करती हैं। 

प्रकृति रुपी माँ  हम सब को चेता रही है कि अब उससे और ज्यादा सहन नहीं होगा, आप अब संभल जाओ। वह हमसे थोड़ा नाराज हो गई है, वह  दुखी है इसलिए ही अपनी गोद में हमें स्थान नहीं दे रही है । 

प्रकृति माँ ने अपनी गौद से उतार दिया है। वह चाहती है कि  हम धीरे धीरे अपने आप ठीक  रहना सीखे, सही तरीके से इस जीवन रुपी पथ पर चलना सीख जायें।

जब हम गिर कर रोने लगते हैं तो माँ उसी समय दोबारा उठा कर गौद में ले लेती है। जैसे घर में माँ है, वैसे ही सर्वत्र माँ सी प्रकृति है। जितना प्यार हमें अपनी माँ से मिलता है, उतना ही माँ सी प्रकृति से भी मिलता है। बस हमारा नजरिया माँ सी प्रकृति के लिए थोड़ा बदल गया था। हमने उसे माँ सी समझना छोड़ दिया था।  आओ जितना प्रेम हम अपनी माँ से करते हैं उतना ही प्यार  माँ सी धरती,  प्रकृति से भी करना प्रारंभ करें।

  कोई रुप नहीं, तु कण-कण में समाया है, तेरी क्या अद्भूत माया है। 





Tuesday, May 19, 2020

बाबा के शब्द

*बाबा के शब्द*

दुखी रहता था कि कोई पुत्र संतान न थी । कई साल तक उपाय व दवाई की। कितने नीम हकीमों को दिखाया। थक-हार कर  बाबा, ओलियाओं के चक्कर काटे पर न कोई दवा हुई और न कोई दुआ कबूल हुई। दबी आवाज में लोग यही कहते  सुनते कि कोई क्या करे  नसीब में  पुत्र सुख ही न हो तो? वह तीन बेटियों का बाप था।

वह मन ही मन  निराश रहने लगा, लेकिन सालों बाद भी बेटे की चाह रत्ती भर भी कम न हुई। उसका पूर्ण विश्वास था कि भगवान इतना कठोर नहीं हो सकता, ऐसा कहकर वह अपनी पत्नी को भी  दिलासा देता रहता। 

विचारों को पोषण न मिलने से  पुत्र चाह की जड़ें सूखने लगी। वक्त ने ख्यालातों को बदला, वह भी बदलने लगा। तीनों बेटियों, रामा,श्यामा और कान्ता से पूरे घर में रौनक रहने लगी। अबोध बालिकायें  कब सुबोध हो गईं पता ही नहीं चलने पाया। 

एक दिन सुबह के समय, गली के उस छोर पर जहां अक्सर मज़मा लगता था, आज भी कोई भीड़ जुटाये बैठा है। आज कोई काम तो है नहीं, दफ्तर भी नहीं जाना, चलो देखतें है क्या माज़रा है। वह अपनी धर्मपत्नी शकुन्तला को कह कर उस जगह चला गया। वहां देखता क्या है कि एक बुढ़ा सा साधू बाबा केवल माथा देखकर भविष्य बता रहा है। कई बार इस तरह के ढ़ोंगी बाबाओं के बारे में सुन चुका था । उसे यक़ीन था कि वे लोग जिनका वह भविष्य बता रहा है उस बाबा के ही आदमी होंगे। 

लिहाजा, अपने शक और सुबा को खा़रिज करने के लिए उसने भी अपना सवाल पूछा। बाबा मुझे बताईये कि मेरी शादी कब तक होगी? बाबा ने उसके माथे पर एकटक  देखने के बाद,  धरती पर तीन लाईनें खींच दीं। बाबा जो काम ईशारों से हो जाये वहां बोलना उचित न समझते थे। समझ में नहीं आया कि वह  कहना क्या चाहते हैं? ईशारे द्वारा उसे तीन बेटियों का बाप बताया। वह चकित हो गया, यह तो अविश्वस्नीय है। बाबा आप तो अंतरयामी हो। अगले सवाल को पूछने में कैसी देरी, तपाक से पूछ लिया, बाबा, बेटा है क्या मेरे नसीब में? बाबा, कोई तो हो जो मेरे मुख में गंगाजल डाले, मेरे वंश को चलाने वाला। मोनी बाबा ने तीन लाईन और बना दी और चोटियाें को बनाने जैसा ईशारा किया यानी तीन लड़कियां और होंगी कह दिया। ऐसा उत्तर सुनकर उसके माथे की शिकन साफ नजर आने लगीं,  कोई उपाय बाबा, बहुत धीरज से सवाल किया। बाबा ने कुछ उपाय करने के लिए बहुत मामुली सी चीजें मंगवाई जो जरा सी देर में ला दी गईं। बाबा, ने कहा बच्चा जा ये घर में किसी जगह पर संभाल कर रख दे, जब लड़का हो तो गरीबों में वस्त्र व भोजन बांट देना।

बाबा, तुम कहां रहते हो? अपना पता बता दो, में  बेटा गोद में लेकर आऊंगा तेरे दर पे। बच्चा, कोई बात नहीं जा अब घर जा और याद रखना गरीबों को मत भूल जाना। 

कितने ही दिनों तक ईश्वर ने उसे तड़पाया था लेकिन आज अचानक ये कैसी पीड़ा हरी, हरी ने, वह सोच -सोच कर निर्मल ह्र्दय हुआ जाता था। जैसे पुष्प-महक सभी को अपनी और आकर्षित करती है, उसी प्रकार सुख-साधन की सभी वस्तुएं उसे अपनी और खिंचने लगीं। जिस वंश की बेल सूखने लगी थी वह फिर से खिलने लगी। समय बीता, बल्कि कहें दौड़ा तो गलत न होगा, जब मन में खुशी रहती है तो समय दौड़ लगाता है या उड़ता जाता है। वह दिन आया जब वह घर में नये आंगन्तुक की किलकारियां सुन रहा था।  देखते ही देखते वह साल भर का हो गया। कोई समय ऐसा भी आता है जब सुध नही रहती कि कोई बात भूल गई। बाबा, की उस बात को वह भुला बैठा। 

कभी-कभी  हमें अपने कर्म याद दिलाने के लिए विधाता छोटे-मोटे खेल तमाशे दिखा देता है। 40 साल से ज्यादा हो गये वह आदमी उसी प्रकार दुखी है जैसे वह बेटा पाने की चाह में दुखी रहता था। बस कारण बदल गये हैं।आज वह उस बेटे की शादी की चिंता में दिन रात घुल रहा है।  क्यों बेटे ने शादी नहीं करने की ठान ली?  क्यों बेल  सूखने लगी है?  

वह बाबा तो दोबारा कभी न दिखा लेकिन बाबा के शब्द  जो वह भूल गया था  'गरीबों को वस्त्र और भोजन करा देना 'अब रह रहकर उसे रातों में जगाते हैं।

ऊँ शांति

Saturday, May 16, 2020

सामाजिक दूरी



सामाजिक  दूरी



इस मतलबी दुनिया में अधिकांश लोग केवल अपने मतलब के लिये किसी से रिश्ता रखते हैं या बनाते हैं। यूँ ही कोई किसी से बात भी नहीं करता। किसी के पास न तो समय है दूसरों के लिए और न जरुरत ही समझते हैं। अब कल ही की बात है,  बचपन से बहुत प्यार करने वाले एक बेहद नजदिकी ने एक बार मुझे देखा, वैसे ही  मैनें पलकें झुका कर उन्हें प्रणाम  किया इतनी देर में उनके कदम मेरे आगे से बढ़ चुके थे। काफी हैरानी हुई और दुख भी कि मुझे बचपन से लेकर जवान होने तक उन्ही से ढ़ेर सारा प्यार मिला था। क्या कोई इस तरह की उम्मीद की कल्पना भी कर सकता है भला?


कोरोना महामारी काल में एक स्लोगन है, जो दवा की मानिंद है और वह है 'शोश्यल डिसटैंसिगं'। वैसे 'आपस में दो गज की दूरी बहुत जरुरी', यह कथन कहीं ज्यादा सारगर्भित  है। 

पहले ही शोश्यल डिसटैंसिगं है, पहले की तरह आजकल कब कोई किसी के पास जाता है या आता है। कहां वह उठ बैठ है। असल में समाज में डिसटैंस इतना बढ़ गया है की  समाज का स्वास्थ्य बिगडने लगा है। रिश्ते खोखले प्रतीत होने लगे हैं। कोई किसी के दुख में साथ नहीं देता। दुख में सभी अकेले हैं। उसी के हालात पर मरने छोड़ दिया जाता है।  

सभी अपने से मतलब रखते हैं, रही सही भद इस मोबाईल ने पीट दी, दूर से ही किसी से भी बात कर लेते हैं। आज से 15-20 साल पहले तक दुख- सुख की बात  हमारे बुजुर्ग लोग आमने सामने बैठ कर  किया करते थे।

जब उनकी बातें सुनते तो लगता था कि घर में स्वर्ग उतर आया हो। कोई किसी कहावत का सहारा लेकर कुछ कहता, तो दूसरा  किंग्द्वन्ती  के द्वारा अपनी बात रखता। कोई हाल ही में घटी फलां की प्रिय अथवा अप्रिय घटना को सुनाने लगता।

वाक्ई, हमारे दिमागों में जो नफरत, बैर की फफूंद लगी  है, वह तो इस महामारी से भी ज्यादा खतरनाक नजर आती है। जो समय के साथ-साथ और बढ़ती है। महामारी तो कुछ समय की ही है, शायद स्वतः खत्म भी हो जाये।

इतना बैर तो दशानन रावण को भी न होगा जितना आजकल छोटी-सी बात पर हो जाता है। यदि हम किसी बात को आज सुलझा लें तो अच्छा है, अन्यथा दीर्घकाल में वह गलतफ़हमी, विकट रुप ले सकती है। इसलिये बुद्धिमान व्यक्ति बिना समय गंवाये बातचीत का रास्ता ही उत्तम समझते हैं। 

कुछ लोग क्यों इतने  नाशुक्रे हो गये हैं? कि वे स्वंय को ही सबसे बड़ा समझने लगते हैं। वे नहीं जानते कि जर्रे जर्रे में वही है जिसे हम सुप्रीम पॉवर कहते हैं चाहे  कोई किसी नाम से भी पुकारे। आजकल उसी पॉवर की  चोट समस्त मानव जाती पर पड़ रही है, क्या चोट मारने वाला दिखाई दे रहा है? नहीं ना!  

जिसके आगे दूनिया की सारी शक्तियां कुंद पड़ गईं और आधुनिक चिकित्सा विज्ञान मौन। विषाणु (वायरस) कैसे  निर्मित हुआ इसका भेद नही है।

विषाणु का भेद लगे न लगे लेकिन  आओ जगत प्रेमियो उसकी बंदगी करें उसका भेद पायें, जो पांच तत्व से बनाकर इस जगत में लाया है और एक दिन इसमें ही मिला भी देगा।         ऊं शान्ति