Wednesday, May 20, 2020

एक बात

*एक बात*

एक बात जो हम सभी को अंदर से झकझोर रही है वह यह है कि और कितने दिनों तक ऐसे ही  डर डर  के जियेंगे हम लोग? यह डर बोर्ड की परीक्षा  में बैठे हुए उन छात्रों के डर से हजार गुणा अधिक है जिनके मन में  नकल करते हुए पकड़े न जायें यही  भय रहता है। जैसे  ही कोई पर्यवेक्षक ऐसे विद्यार्थी के आसपास आता है वह घबराने लगता है। पसीने से हाथ पसीज जाते हैं, कि कहीं पकड़े गये तो क्या होगा? 

वह परीक्षा केवल तीन घन्टे की होती है, फिर भी जब परीक्षा केन्द्र से बाहर निकलते हैं तो कई घटों तक वह मानसिक दबाव हमें सहज नहीं होने देता। हालांकि, यह भय केवल उन छात्रों को ही रहता है जो नकल मारते हैं, कुछ बच्चे सबसे अधिक अंक लाने के दबाव में जरुर रहते होंगे। वह दबाव आनंद और विश्वास जगाता है।

लेकिन यहां तो तीन महीने होने को आये,  कोई पल नहीं जाता जब यह डर न सता रहा हो। सभी को दबाव है कि  कहीं उन्हें यह रोग हो गया तो ईलाज भी नहीं मिलेगा और इस स्थिति में तो चीटींग करके भी पास नहीं हो सकते, बताना भी आवश्यक है।  कैसे इंसान इस दबाव को झेले समझ नहीं पा रहा। 

वाह रे ऊपर वाले,  दुनिया में यूँ ही हाय तौबा मची हुई थी, अब कैसे सब जरुरतें सीमित हो गईंं हैं। 

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