*बाबा के शब्द*
वह दुखी रहता था कि कोई पुत्र संतान न थी । कई साल तक उपाय व दवाई की। कितने नीम हकीमों को दिखाया। थक-हार कर बाबा, ओलियाओं के चक्कर काटे पर न कोई दवा हुई और न कोई दुआ कबूल हुई। दबी आवाज में लोग यही कहते सुनते कि कोई क्या करे नसीब में पुत्र सुख ही न हो तो? वह तीन बेटियों का बाप था।
वह मन ही मन निराश रहने लगा, लेकिन सालों बाद भी बेटे की चाह रत्ती भर भी कम न हुई। उसका पूर्ण विश्वास था कि भगवान इतना कठोर नहीं हो सकता, ऐसा कहकर वह अपनी पत्नी को भी दिलासा देता रहता।
विचारों को पोषण न मिलने से पुत्र चाह की जड़ें सूखने लगी। वक्त ने ख्यालातों को बदला, वह भी बदलने लगा। तीनों बेटियों, रामा,श्यामा और कान्ता से पूरे घर में रौनक रहने लगी। अबोध बालिकायें कब सुबोध हो गईं पता ही नहीं चलने पाया।
एक दिन सुबह के समय, गली के उस छोर पर जहां अक्सर मज़मा लगता था, आज भी कोई भीड़ जुटाये बैठा है। आज कोई काम तो है नहीं, दफ्तर भी नहीं जाना, चलो देखतें है क्या माज़रा है। वह अपनी धर्मपत्नी शकुन्तला को कह कर उस जगह चला गया। वहां देखता क्या है कि एक बुढ़ा सा साधू बाबा केवल माथा देखकर भविष्य बता रहा है। कई बार इस तरह के ढ़ोंगी बाबाओं के बारे में सुन चुका था । उसे यक़ीन था कि वे लोग जिनका वह भविष्य बता रहा है उस बाबा के ही आदमी होंगे।
लिहाजा, अपने शक और सुबा को खा़रिज करने के लिए उसने भी अपना सवाल पूछा। बाबा मुझे बताईये कि मेरी शादी कब तक होगी? बाबा ने उसके माथे पर एकटक देखने के बाद, धरती पर तीन लाईनें खींच दीं। बाबा जो काम ईशारों से हो जाये वहां बोलना उचित न समझते थे। समझ में नहीं आया कि वह कहना क्या चाहते हैं? ईशारे द्वारा उसे तीन बेटियों का बाप बताया। वह चकित हो गया, यह तो अविश्वस्नीय है। बाबा आप तो अंतरयामी हो। अगले सवाल को पूछने में कैसी देरी, तपाक से पूछ लिया, बाबा, बेटा है क्या मेरे नसीब में? बाबा, कोई तो हो जो मेरे मुख में गंगाजल डाले, मेरे वंश को चलाने वाला। मोनी बाबा ने तीन लाईन और बना दी और चोटियाें को बनाने जैसा ईशारा किया यानी तीन लड़कियां और होंगी कह दिया। ऐसा उत्तर सुनकर उसके माथे की शिकन साफ नजर आने लगीं, कोई उपाय बाबा, बहुत धीरज से सवाल किया। बाबा ने कुछ उपाय करने के लिए बहुत मामुली सी चीजें मंगवाई जो जरा सी देर में ला दी गईं। बाबा, ने कहा बच्चा जा ये घर में किसी जगह पर संभाल कर रख दे, जब लड़का हो तो गरीबों में वस्त्र व भोजन बांट देना।
बाबा, तुम कहां रहते हो? अपना पता बता दो, में बेटा गोद में लेकर आऊंगा तेरे दर पे। बच्चा, कोई बात नहीं जा अब घर जा और याद रखना गरीबों को मत भूल जाना।
कितने ही दिनों तक ईश्वर ने उसे तड़पाया था लेकिन आज अचानक ये कैसी पीड़ा हरी, हरी ने, वह सोच -सोच कर निर्मल ह्र्दय हुआ जाता था। जैसे पुष्प-महक सभी को अपनी और आकर्षित करती है, उसी प्रकार सुख-साधन की सभी वस्तुएं उसे अपनी और खिंचने लगीं। जिस वंश की बेल सूखने लगी थी वह फिर से खिलने लगी। समय बीता, बल्कि कहें दौड़ा तो गलत न होगा, जब मन में खुशी रहती है तो समय दौड़ लगाता है या उड़ता जाता है। वह दिन आया जब वह घर में नये आंगन्तुक की किलकारियां सुन रहा था। देखते ही देखते वह साल भर का हो गया। कोई समय ऐसा भी आता है जब सुध नही रहती कि कोई बात भूल गई। बाबा, की उस बात को वह भुला बैठा।
कभी-कभी हमें अपने कर्म याद दिलाने के लिए विधाता छोटे-मोटे खेल तमाशे दिखा देता है। 40 साल से ज्यादा हो गये वह आदमी उसी प्रकार दुखी है जैसे वह बेटा पाने की चाह में दुखी रहता था। बस कारण बदल गये हैं।आज वह उस बेटे की शादी की चिंता में दिन रात घुल रहा है। क्यों बेटे ने शादी नहीं करने की ठान ली? क्यों बेल सूखने लगी है?
वह बाबा तो दोबारा कभी न दिखा लेकिन बाबा के शब्द जो वह भूल गया था 'गरीबों को वस्त्र और भोजन करा देना 'अब रह रहकर उसे रातों में जगाते हैं।
ऊँ शांति
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