Wednesday, May 20, 2020

माँ सी


*माँ सी*

देखो आजकल दुनिया में चारों और घोर अंधेरा नज़र आ रहा है। जब माँ अपने बच्चे को आँचल में  सुलाती है तो कमरे में चाहे कितनी ही रौशनी रहे लेकिन बच्चे की आँखो को अपने आँचल से इस प्रकार ढ़क लेती है कि वह आराम से सो सके। उसे तेज रौशनी की चोेंध न लगे। 

प्रकृति माँ ने हमें वही प्यार हम सब को देना चाहा है। हम जग की चकाचौंध में सुकून की नीदं लेना ही भूल गये थे। अब समय आया है कि धरती रुपी माँ की गोद में रहकर कुछ समय बिछौना अंबर को बनायें । भाग दौड़ बहुत कर ली अब तनिक एकान्त विश्राम किया जाये। 

प्रकृति बार-बार यह समझाती आई है कि वह अपने बच्चों के लिए सदा भला ही करती आई है जैसे की सबकी मां करती हैं। 

प्रकृति रुपी माँ  हम सब को चेता रही है कि अब उससे और ज्यादा सहन नहीं होगा, आप अब संभल जाओ। वह हमसे थोड़ा नाराज हो गई है, वह  दुखी है इसलिए ही अपनी गोद में हमें स्थान नहीं दे रही है । 

प्रकृति माँ ने अपनी गौद से उतार दिया है। वह चाहती है कि  हम धीरे धीरे अपने आप ठीक  रहना सीखे, सही तरीके से इस जीवन रुपी पथ पर चलना सीख जायें।

जब हम गिर कर रोने लगते हैं तो माँ उसी समय दोबारा उठा कर गौद में ले लेती है। जैसे घर में माँ है, वैसे ही सर्वत्र माँ सी प्रकृति है। जितना प्यार हमें अपनी माँ से मिलता है, उतना ही माँ सी प्रकृति से भी मिलता है। बस हमारा नजरिया माँ सी प्रकृति के लिए थोड़ा बदल गया था। हमने उसे माँ सी समझना छोड़ दिया था।  आओ जितना प्रेम हम अपनी माँ से करते हैं उतना ही प्यार  माँ सी धरती,  प्रकृति से भी करना प्रारंभ करें।

  कोई रुप नहीं, तु कण-कण में समाया है, तेरी क्या अद्भूत माया है। 





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