नई सुबह
कहते थे डिंपी जिसे इतनी बड़ी कब हो गई
वही बचपन की डिंपी अब रुपम जज हो गई
सालो तक मेहनत की तब नीदं उसकी खो गई
देखते ही देखते सोलह से छब्बीस कब हो गई
कहते थे डिंपी जिसे इतनी बड़ी कब हो गई
वही बचपन की डिंपी अब रुपम जज हो गई
कभी भाई बहन की गोदी मे सो गई
वही आज डिंपी से जज रुपम हो गई
कहते थे डिंपी जिसे इतनी बड़ी कब हो गई
वही बचपन की डिंपी अब रुपम जज हो गई
रुपम अनुपम काम कर गई
मात पितू की रुपम शान बन गई
कहते थे डिंपी जिसे इतनी बड़ी कब हो गई
वही बचपन की डिंपी अब रुपम जज हो गई
'अन्याय से मुक्ति' नारा, अब गरीब की सुबह हो गई
'शिक्षित बनो और संघर्ष करो', यह रेस शुरु हो गई
कहते थे डिंपी जिसे इतनी बड़ी कब हो गई
वही बचपन की डिंपी अब रुपम जज हो गई
राजेश कुमार पूनिया -दीप