Wednesday, February 27, 2019

एक शुरुआत


एक शुरुआत

अपने लिए तो सभी जीते हैं औरों के लिए जीने वाले विरले ही होते हैं, समाज सेवी बन कर कुछ कर दिखाना बहुत बड़ी बात होती है। समाज में अनेक छोटे-बड़े समाज सेवी दिखाई दे जायेंगे, समाज में व्याप्त समस्याओं के निराकरण, निदान के लिये समाज सेवी अपनी निस्वार्थ सेवा देते रहे हैं उन्हे आध्यात्मिक चेतना से ही सही कर्म का ज्ञान मिलता है, समाज सेवा के नाम पर सरकार से जो अनुदान मिलता है उसका सद्उपयोग हो ये आवश्यक है।

वैसे आजकल कई एन.जी.ओ. अनाथ बच्चों के उत्थान के लिए कार्य कर रहें हैं, कोई बुजूर्गों की सेवा, कोई दिव्यागों की देखभाल, कोई अन्धे-बहरे-गूंगे आदि की सेवा में रत हैं। मुझे एक बार जोधपुर, राजस्थान में नारायण सेवा संस्थान जाने का मौका मिला, जहाँ पोलियो ग्रस्त मरीजों का निशुल्क इलाज होता है, उन्हे मुफ्त इलाज के अलावा कई प्रकार के स्वरोजगार के प्रशिक्षण दिये जाते हैं, जरुरतमदों को बैसाखियाँ, तिपहिया साईकिल बाँटी जाती हैं, साथ ही आपसी रजामदीं (पसंद) से विवाह भी संपन्न कराये जाते हैं। वहाँ पहुँच कर देखा और जाना कि सही में निस्वार्थ भावना से समाज की सेवा करने का सुख क्या होता है।

सदियों से हमारे सन्तों, महात्माओं, फकीरों, सुफी सन्तों ने समाज की सेवा कि, किसी न किसी ढ़ंग से हमें सही तरह से जीने की राह दिखाते रहें हैं, चाहे सन्त कबीर, रैदास, नानक हों चाहे फकीर बुल्ले शाह, हजरत निजामुद्दीन, या विनोबा भावे, महात्मा गाँधी आदि, अनगिनत महान  विभुतियों ने समाज की कुरितियों को दूर करने का बीड़ा उठाया।

आओ एक बेहतर शुरुआत करें कुछ छोटा ही सही, अच्छा करने की, मैं कोई ज्ञान नहीं बाँटना चाहता बस याद दिलाना चाहता हूँ, अगर रोजाना अग्रिम गर्मियों में एक जल का छोटा सा बर्तन अपने घर की छत अथवा आगँन में रखने की आदत डालें तो पक्षिय़ों, जानवरों  के प्रति आपकी एक छोटी ही सही परन्तु विशेष सेवा होगी।

Friday, February 22, 2019

वे दिन


22.02.2019

वे दिन

अपने बचपन के दिन याद करें तो लगता है कि कितने अच्छे थे वे दिन, ना नौकरी की चिन्ता ना रोटी की फिकर, कितने प्यारे दिन और रात होते थे, चाँदनी रात में सभी के साथ घर के बाहर आँगन में अपनी चारपाई डालकर सोते थे, कोई डर नहीं लगता था, एक गाँव की तरह ही रहते थे शहर में भी,  घर के बड़े सुबह सूरज निकलने से पहले जाग जाते थे लेकिन हम बच्चे जगाये से भी नहीं जागते थे और जब स्कूलों की फाइनल छुट्टी होती थी उन दिनो मौसम भी बड़ा सुहाना सा लगता था, तब सभी बच्चे आपस में ये तय कर लेते थे कि कल सुबह 5.30 बजे बड़े वाले पार्क में जायेंगे, अगले रोज सुबह के पाँच बजे, किसी के जगाये बिना अपने आप जाग जाते थे और सभी बच्चों के साथ बड़े पार्क में पहुँच जाते थे और तरह-तरह के खेल खेलते थे, कभी लंगड़ी टाँग खेलते कभी पकड़म-पकड़ाई तो कभी कुछ और खेलते, जब थक जाते तो एक दुसरे के साथ हँसते-हँसाते अपने घरों की और चल देते, रास्ते में आम के पेड़ों से कच्ची आमियों को पत्थर मारकर तोड़ते, उनके घरों से आवाज सुनाई देती, बच्चो चलो भागों यहां से, कच्ची आमियों को तोड़ने से तुम्हे क्या मिलेगा?

कभी किसी की साईकिल की चैन उतर जाती तो सारे उसे ठीक करने लगते, कभी फुटबाल को पैर से सरकाते सरकाते आगे बढ़ते तो कभी रास्ते में पानी की टूटी से पानी पीने लगते, आपस में कोई किसी का नाम बिगाड़ के प्यार से लड्डू पुकारता तो कोई किसी को टिन्कू या बिट्टू कहता। नवीन और उसकी बहन अंजलि कुछ ज्यादा ही एडवांस लगते थे, कभी- कभार ही हमारे साथ खलने आते, उनके पास एक फिएट कार थी, वे अकसर कहीं जाते रहते थे, दो दोस्त और भी थे जो शायद जुड़वाँ थे उनके नाम हनी-सनी थे, वे किसी प्राईवेट स्कूल में पढ़ते थे लेकिन हमारे साथ बहुत खेलते थे, उनके घर भी एक कार होती थी।

यदि गाँव वाले हमारे घर कोई अर्जेन्ट खबर देना चाहते, तो वे उनके ही घर फोन करते थे, उस जमाने मे आसपास किसी के पास फोन नहीं था, तब हनी भाग कर हमारे घर आता कि आपके किसी जानकार का फोन है, तब हमारे घर से मेरे पापा या भाई बहन दौड़ कर जाते और फोन पर बात करते, कभी जब उनके घर पर कोई आया होता, तो बात थोड़ा जल्दी खत्म करने की कोशिश होती, फिर दोबारा पास ही के एस.टी.डी. बूथ से पूरी बात करके आते। आमने-सामने या अड़ोसी-पड़ोसी के घर से कभी चीनी कभी चाय पत्ती लाते, कभी दूध आदि लाते, तो कभी वे हमारे घर ऐसे ही लेने आते।

कभी पास की सरकारी दुकान से मिट्टी का तेल (केरोसीन ऑयल) खरीद कर लाते, जिससे स्टॉव चलाया जाता, कई बार साईकिल पर चक्की से आटा लेकर आते, जब साईकिल नहीं होती तो अपने कन्धे पर रखकर लाते तो, कभी-कभी घर का राशन उधार ही लाते, तनख्वाह मिलने पर ही हिसाब चुकता होता। माँ, घर में गाजर, नींबू, लहसुन आदि का अचार डालतीं तो कभी आलू चिप्स या चावल के चिप्स बनाकर धूप में सुखातीं, तो कभी खाट से मशीन बाँधकर आटे की सेवियाँ निकालतीं।

घरों के आगे ही एक रैहड़ी वाला आता जो गोल-गप्पे, टिक्की, और दही-भल्ले, तवे को जोर-जोर से बजाकर बेचता था। कभी बुढ़ी के बाल वाला आता, तो कोई आईसक्रीम बेचता, तो कोई छोले-कुल्चे की आवाज देकर बच्चों को बुलाता। हम कभी जिद करके ये सब चीजें खाते तो कभी हमें अपने आप ही खाने को मिल जातीं। कभी सपेरे वाला आता तो कभी जादूगर अपना खेल दिखाता तो कभी नट के करतब देखते।

कुछ सालों बाद, थोड़े स्याने हुए, सर्टिफिकेट सत्यापित कराने के लिए किसी अंकल के घर जाते तो कुछ ना कुछ सवाल जरुर पूछे जाते मसलन, तुम्हारे ही हैं ना? किसी और के तो नही लाये हो? आगे क्या पढ़ रहे हो? इत्यादि। आज भी याद करें तो एक मीठे अहसास संग सुकून मिलता है। जाने कहाँ गये वे दिन?   

Thursday, February 21, 2019

श्रद्धान्जलि


21.02.2019

श्रद्धान्जलि

अपनी ही जमीन पर जवान अघोषित युद्ध में अपनी जान गवां रहें हैं, पुलवामा के अत्यन्त दुखद एवं भीषण आतंकी हमले ने कई सवाल खड़े कर दिये हैं। कब तक हमारी सेना के जवान यूँ ही शहीद होते रहेंगे? क्या देशवासियों की सब्र की सीमा का इम्तिहान लिया जा रहा है? अपने देश की सुरक्षा करते हुए जिन्होने अपनी जान न्योछावर कर दी, उनके लहू की एक एक बूंद हमें अपनी जिम्मेदारी याद दिलायेगी। हमारा नमन सभी जवानों को।

आओ सभी ये प्रण करें की हम दैनिक कार्य करते हुए अपने देश की आतंरिक सुरक्षा के प्रति अपनी जिम्मेदारी एवं सजगता बनाये रखेंगे।         

जय हिन्द

बेशक


21.02.2019
बेशक

हमारी कोशिश रहती है कि जो भी अच्छा है हमें मिले, सभी खुशियां हमारे जीवन में रहें, लेकिन हम बहुत छोटी छोटी खुशियों को नहीं देख पाते, हमें वही खुशी नजर आती हैं जो हमें भोतिक सुख प्रदान करती हैं बाकि तो सब बाते तुच्छ ही नजर आती हैं। माना हमें बचपन से यही सिखाया गया होता है कि खूब पढ़ लिखकर बहुत बड़े अफसर बनो, ताकि दुनिया की सारी खुशियों को तुम पा सको, बस फिर हम उसी राह पर चलते रहतें हैं और एक दिन उस मुकाम को हासिल भी कर लेते हैं जिसकी हमारे माता पिता के साथ हमने भी इच्छा की थी,

बुजुर्गों की सारी बातें सही थी या नहीं कह नही सकते लेकिन, ये बात मुझे अब समझ आने लगी हैं कि उच्च शिक्षा से उच्च पद तो मिल सकता है लेकिन उन सारी खुशियों का क्या, जिसे हम तलाश रहें हैं जो धन से हासिल ही नहीं हो सकती, कुछ ऐसे ही व्यक्तियों को हम व्यक्तिगत तौर पर जानते भी हैं, जिनके पास धन दौलत की कोई कमी नहीं है मगर, दुखी हैं उदास हैं, जीवन से हताश हैं असली सुख नहीं मिल रहा क्योंकि बच्चे साथ नहीं रहते, या अपने पास रखना नहीं चाहते, पत्नी चल बसी, अपना शरीर साथ नहीं देता, कई बिमारियों ने जकड़ लिया, बेटियों ने मुड़ कर नहीं देखा शायद इस डर से कि उन्हें ही ना देखभाल करनी पड़ जाए, जिन माँ बाप ने, जिन बच्चों के लिए सारा जीवन लगा दिया, दिन और रात नहीं देखा, उन्हें इस लायक बनाया कि अपने पैरों पर खड़े हों जाऐं।

आज वही बाप जीवन की उन खुशियों से मरहूम हैं जिनके होने मात्र से इन्सान प्याज या चटनी के साथ भी रुखी सुखी रोटी खा कर भी आनन्द से रह सकता है। मुझे नहीं लगता कि हम सभी उन खुशियों को कहीं से खरीद सकते हैं, जो केवल हमारे बच्चे ही हमें दे सकते हैं।

बेशक, हम इन बुजुर्गों के साथ खुशी के पल बांट कर इनकी खुशी दोगुनी कर सकते हैं इन्हें आपसे और कुछ नहीं चाहिये, बस, इनके पास बैठकर दो बोल प्यार के बोल कर आनन्द से रहें।

Wednesday, February 20, 2019

गया वक्त


20.02.2019

गया वक्त

अच्छा और बुरा वक्त सबके जीवन में आता है, कोई याद रखता है कोई भूल जाता है। बुरा समय वर्षों तक याद रहता है जबकी अच्छा समय हम जल्दी भुल जाते हैं। ये हम सभी के साथ होता है, कई सालों तक हमें वही बातें दुख और सुख का अहसास कराती हैं बाद में, 50-60 की उम्र के बाद फिर अपनों के साथ रहे मन-मुटाव धीरे धीरे हमे भूलने लगते हैं, हमें वो पुराने यार दोस्त, दूर- नजदीक के रिश्ते, जिनसे मन मुटाव था, यदा-कदा याद आने लगते हैं।

जब अपने बच्चे की शादी का निमन्त्रण देने का समय आता है, तो हम पुराने आपसी झगड़ों को भूल कर सोचते हैं कि, हैं तो अपने ही रिश्तेदार, शादी का कार्ड तो भेज ही दें, आयें ना आयें ये उनकी मर्जी है, अथवा ब्याह का निमन्त्रण देने के लिए सालों बाद कहीं से मोबाइल नम्बर ढूढ़ंते है या  कहीं से उनके घर का पता ढूँढकर, पहुँच जाते हैं घर पर, सबके चेहरे बदले नजर आते हैं,क्योंकि सालों बाद जो दिखे हैं, सभी हैरान होते हैं कि आज इतने सालों बाद हमारी याद कैसे आ गई, जलपान के उपरान्त कुछ देर के लिए बेहद हल्की कहा सुनी होती है। दोनों तरफ ही, कुछ झिझक रहती है कि इतने साल बाद बात हो रही है कहीं मुहं से कुछ गलत ना निकल जाये, अब क्या कहना, जो हुआ सो हुआ, अपनी और उनकी धर्मपत्नी के बीच दूसरे कमरे में अलग से हल्की सी नोक-झोंक या कहा सुनी होती है और फिर  शान्त माहौल हो जाता है।

कुछ उनकी सुनते हैं और कुछ अपनी सुनाते हैं, बातों ही बातों में अन्य जानकारों, रिश्तेदारों के हाल-चाल का पता चलता है, कोई कहीं है, कोई कहीं, किस के बच्चें क्या कर रहें हैं?, फलां ठीक हैं फलां बीमार और कोई चल बसा आदि, तमाम बातें होती हैं और इस तरह हम सभी के मन की खटास चली जाती है, इस तरह एक दूसरे से मिलते रहने से धीरे धीरे सभी बिसरी बातों को भुला देते हैं। हमें लगता है कि जैसे कोई बुरा सपना था जो बीत चूका है। कई बार लगता है कि काश ये निमन्त्रण पहले देने आ गया होता, तो कितने बरस यूँ ही खामोशी से नहीं बीतते।

खैर, ये तो सच है कि बीते हुये अच्छे बुरे समय से हमें आज जीवन जीने की एक नई उर्जा मिलती है जिसे याद करके आज भी कई शारीरिक एवं मानसिक तकलीफों को सहज ही सहन कर जाते हैं, वहीं हमें साहस व धैर्य की सीख मिलती रही है। अब हमारे बच्चों का समय आ गया है, हम थोड़े बूढ़े होने लगे हैं। इसलिए जो मिला और जो खो गया उसकी परवाह किये बिना जीवन का आनन्द लें।

Monday, February 4, 2019

क्षमा और क्षमादान


04.02.2019

क्षमा और क्षमादान

कहीं कोई गलती या चूक हुई नहीं कि एकदम मुहं से निकलता है (सॉरी) क्षमा कहने में क्षण नहीं लगता सभी को ये कहने का अभ्यास हो चुका है, वही गलती (मिस्टेक) दौबारा ना हो ये कोई नहीं सोचता, सभी एक ही रंग में रंगे हुए नजर आते हैं ये बड़ी सामान्य सी बात हो गई है शायद आपको भी ये कहने और सुनने का अनुभव हो। ये बात मुझे आपसे इसलिए साझा करनी है क्योंकी यह शब्द दिव्य और अदभुत है।

यदि आपसे कोई गाली-गलौच या लड़ाई-झगड़ा कर रहा है तो आप अपनी वाणी को जरा काबू में रखकर उसे एक दो बार ये शब्द कह दें आप देखोगे की सामने वाले के व्यवहार में एकदम बदलाव आ रहा होगा, जो तु-तड़ाक की भाषा बोल रहा होगा वो भी धारे-धीरे शालीन व्यवहार करने लगेगा, ये बात असल में हम सभी को मालूम है लेकिन आवेश में आकर हम इस चमत्कारी शब्द का प्रयोग करना ज्यादातर भूल जाते हैं। इस शब्द को मैने अपने खुद भी परखा एवं आजमाया है, जब कभी मैने किसी बात पर सामने वाले को गुस्सा किया या उसे बुरा-भला कहा, त्यों ही सामने से प्रति-उत्तर भी मुझे बुरा मिला लेकिन जब मैनें किसी को ये कह कर माफ किया कि भविष्य में ध्यान रहे गल़ती दौबारा ना हो, तो मामला शान्त होने लगता है। अक्सर ज्यादातर मामलों में छोटी सी बात होती है लेकिन हम एक दुसरे पर दोषारोपण करके तिल का ताड़ बना देते हैं।

महाभारत के अनुसार न श्रेय: सततं तेजो न नित्यं श्रेयसी क्षमा। कभी भी क्षमा न करना, और सदा क्षमा करते रहना दोनों ठीक नहीं हैं।  अधिकाशं लोग पांचाली  द्वारा अंधस्य अंधो वै पुत्र:” “अन्धे का पुत्र अंधा कहे वाक्य को महाभारत के युध्द का मुख्य कारण मानते हैं, हांलाकि महाभारत के सैंतालिसवें अध्याय में द्रौपदी को दुर्योधन का उपहास करते नही पाया, जब वह जल को थल समझ कर उसमें गिरा, तो सबसे पहले युधिष्ठर हसाँ था उसे देखकर अर्जुन और बाद में नकुल सहदेव के साथ सभा में उपस्थित लोग हसें थे।

यदि द्रौपदी अपने पाचों बच्चों के हत्यारे अश्वत्थामा को क्षमादान दे सकती है जिसने उसके पाचों पुत्रों को (जब वे सोये हुए थे) जान से मारा था। ये शब्द अश्वत्थामा के द्वारा दिये गये घाव से भी बड़े हो गये, इतनी बात से कितना बड़ा युध्द हो गया, क्यों नहीं दुर्योधन ने क्षमा भाव अपनाया। क्षमा शान्ति का उत्तम उपाय है। क्षमा गुणवतां बलम्। ऒम शान्ति