Thursday, February 21, 2019

बेशक


21.02.2019
बेशक

हमारी कोशिश रहती है कि जो भी अच्छा है हमें मिले, सभी खुशियां हमारे जीवन में रहें, लेकिन हम बहुत छोटी छोटी खुशियों को नहीं देख पाते, हमें वही खुशी नजर आती हैं जो हमें भोतिक सुख प्रदान करती हैं बाकि तो सब बाते तुच्छ ही नजर आती हैं। माना हमें बचपन से यही सिखाया गया होता है कि खूब पढ़ लिखकर बहुत बड़े अफसर बनो, ताकि दुनिया की सारी खुशियों को तुम पा सको, बस फिर हम उसी राह पर चलते रहतें हैं और एक दिन उस मुकाम को हासिल भी कर लेते हैं जिसकी हमारे माता पिता के साथ हमने भी इच्छा की थी,

बुजुर्गों की सारी बातें सही थी या नहीं कह नही सकते लेकिन, ये बात मुझे अब समझ आने लगी हैं कि उच्च शिक्षा से उच्च पद तो मिल सकता है लेकिन उन सारी खुशियों का क्या, जिसे हम तलाश रहें हैं जो धन से हासिल ही नहीं हो सकती, कुछ ऐसे ही व्यक्तियों को हम व्यक्तिगत तौर पर जानते भी हैं, जिनके पास धन दौलत की कोई कमी नहीं है मगर, दुखी हैं उदास हैं, जीवन से हताश हैं असली सुख नहीं मिल रहा क्योंकि बच्चे साथ नहीं रहते, या अपने पास रखना नहीं चाहते, पत्नी चल बसी, अपना शरीर साथ नहीं देता, कई बिमारियों ने जकड़ लिया, बेटियों ने मुड़ कर नहीं देखा शायद इस डर से कि उन्हें ही ना देखभाल करनी पड़ जाए, जिन माँ बाप ने, जिन बच्चों के लिए सारा जीवन लगा दिया, दिन और रात नहीं देखा, उन्हें इस लायक बनाया कि अपने पैरों पर खड़े हों जाऐं।

आज वही बाप जीवन की उन खुशियों से मरहूम हैं जिनके होने मात्र से इन्सान प्याज या चटनी के साथ भी रुखी सुखी रोटी खा कर भी आनन्द से रह सकता है। मुझे नहीं लगता कि हम सभी उन खुशियों को कहीं से खरीद सकते हैं, जो केवल हमारे बच्चे ही हमें दे सकते हैं।

बेशक, हम इन बुजुर्गों के साथ खुशी के पल बांट कर इनकी खुशी दोगुनी कर सकते हैं इन्हें आपसे और कुछ नहीं चाहिये, बस, इनके पास बैठकर दो बोल प्यार के बोल कर आनन्द से रहें।

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