Friday, February 22, 2019

वे दिन


22.02.2019

वे दिन

अपने बचपन के दिन याद करें तो लगता है कि कितने अच्छे थे वे दिन, ना नौकरी की चिन्ता ना रोटी की फिकर, कितने प्यारे दिन और रात होते थे, चाँदनी रात में सभी के साथ घर के बाहर आँगन में अपनी चारपाई डालकर सोते थे, कोई डर नहीं लगता था, एक गाँव की तरह ही रहते थे शहर में भी,  घर के बड़े सुबह सूरज निकलने से पहले जाग जाते थे लेकिन हम बच्चे जगाये से भी नहीं जागते थे और जब स्कूलों की फाइनल छुट्टी होती थी उन दिनो मौसम भी बड़ा सुहाना सा लगता था, तब सभी बच्चे आपस में ये तय कर लेते थे कि कल सुबह 5.30 बजे बड़े वाले पार्क में जायेंगे, अगले रोज सुबह के पाँच बजे, किसी के जगाये बिना अपने आप जाग जाते थे और सभी बच्चों के साथ बड़े पार्क में पहुँच जाते थे और तरह-तरह के खेल खेलते थे, कभी लंगड़ी टाँग खेलते कभी पकड़म-पकड़ाई तो कभी कुछ और खेलते, जब थक जाते तो एक दुसरे के साथ हँसते-हँसाते अपने घरों की और चल देते, रास्ते में आम के पेड़ों से कच्ची आमियों को पत्थर मारकर तोड़ते, उनके घरों से आवाज सुनाई देती, बच्चो चलो भागों यहां से, कच्ची आमियों को तोड़ने से तुम्हे क्या मिलेगा?

कभी किसी की साईकिल की चैन उतर जाती तो सारे उसे ठीक करने लगते, कभी फुटबाल को पैर से सरकाते सरकाते आगे बढ़ते तो कभी रास्ते में पानी की टूटी से पानी पीने लगते, आपस में कोई किसी का नाम बिगाड़ के प्यार से लड्डू पुकारता तो कोई किसी को टिन्कू या बिट्टू कहता। नवीन और उसकी बहन अंजलि कुछ ज्यादा ही एडवांस लगते थे, कभी- कभार ही हमारे साथ खलने आते, उनके पास एक फिएट कार थी, वे अकसर कहीं जाते रहते थे, दो दोस्त और भी थे जो शायद जुड़वाँ थे उनके नाम हनी-सनी थे, वे किसी प्राईवेट स्कूल में पढ़ते थे लेकिन हमारे साथ बहुत खेलते थे, उनके घर भी एक कार होती थी।

यदि गाँव वाले हमारे घर कोई अर्जेन्ट खबर देना चाहते, तो वे उनके ही घर फोन करते थे, उस जमाने मे आसपास किसी के पास फोन नहीं था, तब हनी भाग कर हमारे घर आता कि आपके किसी जानकार का फोन है, तब हमारे घर से मेरे पापा या भाई बहन दौड़ कर जाते और फोन पर बात करते, कभी जब उनके घर पर कोई आया होता, तो बात थोड़ा जल्दी खत्म करने की कोशिश होती, फिर दोबारा पास ही के एस.टी.डी. बूथ से पूरी बात करके आते। आमने-सामने या अड़ोसी-पड़ोसी के घर से कभी चीनी कभी चाय पत्ती लाते, कभी दूध आदि लाते, तो कभी वे हमारे घर ऐसे ही लेने आते।

कभी पास की सरकारी दुकान से मिट्टी का तेल (केरोसीन ऑयल) खरीद कर लाते, जिससे स्टॉव चलाया जाता, कई बार साईकिल पर चक्की से आटा लेकर आते, जब साईकिल नहीं होती तो अपने कन्धे पर रखकर लाते तो, कभी-कभी घर का राशन उधार ही लाते, तनख्वाह मिलने पर ही हिसाब चुकता होता। माँ, घर में गाजर, नींबू, लहसुन आदि का अचार डालतीं तो कभी आलू चिप्स या चावल के चिप्स बनाकर धूप में सुखातीं, तो कभी खाट से मशीन बाँधकर आटे की सेवियाँ निकालतीं।

घरों के आगे ही एक रैहड़ी वाला आता जो गोल-गप्पे, टिक्की, और दही-भल्ले, तवे को जोर-जोर से बजाकर बेचता था। कभी बुढ़ी के बाल वाला आता, तो कोई आईसक्रीम बेचता, तो कोई छोले-कुल्चे की आवाज देकर बच्चों को बुलाता। हम कभी जिद करके ये सब चीजें खाते तो कभी हमें अपने आप ही खाने को मिल जातीं। कभी सपेरे वाला आता तो कभी जादूगर अपना खेल दिखाता तो कभी नट के करतब देखते।

कुछ सालों बाद, थोड़े स्याने हुए, सर्टिफिकेट सत्यापित कराने के लिए किसी अंकल के घर जाते तो कुछ ना कुछ सवाल जरुर पूछे जाते मसलन, तुम्हारे ही हैं ना? किसी और के तो नही लाये हो? आगे क्या पढ़ रहे हो? इत्यादि। आज भी याद करें तो एक मीठे अहसास संग सुकून मिलता है। जाने कहाँ गये वे दिन?   

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