Monday, February 4, 2019

क्षमा और क्षमादान


04.02.2019

क्षमा और क्षमादान

कहीं कोई गलती या चूक हुई नहीं कि एकदम मुहं से निकलता है (सॉरी) क्षमा कहने में क्षण नहीं लगता सभी को ये कहने का अभ्यास हो चुका है, वही गलती (मिस्टेक) दौबारा ना हो ये कोई नहीं सोचता, सभी एक ही रंग में रंगे हुए नजर आते हैं ये बड़ी सामान्य सी बात हो गई है शायद आपको भी ये कहने और सुनने का अनुभव हो। ये बात मुझे आपसे इसलिए साझा करनी है क्योंकी यह शब्द दिव्य और अदभुत है।

यदि आपसे कोई गाली-गलौच या लड़ाई-झगड़ा कर रहा है तो आप अपनी वाणी को जरा काबू में रखकर उसे एक दो बार ये शब्द कह दें आप देखोगे की सामने वाले के व्यवहार में एकदम बदलाव आ रहा होगा, जो तु-तड़ाक की भाषा बोल रहा होगा वो भी धारे-धीरे शालीन व्यवहार करने लगेगा, ये बात असल में हम सभी को मालूम है लेकिन आवेश में आकर हम इस चमत्कारी शब्द का प्रयोग करना ज्यादातर भूल जाते हैं। इस शब्द को मैने अपने खुद भी परखा एवं आजमाया है, जब कभी मैने किसी बात पर सामने वाले को गुस्सा किया या उसे बुरा-भला कहा, त्यों ही सामने से प्रति-उत्तर भी मुझे बुरा मिला लेकिन जब मैनें किसी को ये कह कर माफ किया कि भविष्य में ध्यान रहे गल़ती दौबारा ना हो, तो मामला शान्त होने लगता है। अक्सर ज्यादातर मामलों में छोटी सी बात होती है लेकिन हम एक दुसरे पर दोषारोपण करके तिल का ताड़ बना देते हैं।

महाभारत के अनुसार न श्रेय: सततं तेजो न नित्यं श्रेयसी क्षमा। कभी भी क्षमा न करना, और सदा क्षमा करते रहना दोनों ठीक नहीं हैं।  अधिकाशं लोग पांचाली  द्वारा अंधस्य अंधो वै पुत्र:” “अन्धे का पुत्र अंधा कहे वाक्य को महाभारत के युध्द का मुख्य कारण मानते हैं, हांलाकि महाभारत के सैंतालिसवें अध्याय में द्रौपदी को दुर्योधन का उपहास करते नही पाया, जब वह जल को थल समझ कर उसमें गिरा, तो सबसे पहले युधिष्ठर हसाँ था उसे देखकर अर्जुन और बाद में नकुल सहदेव के साथ सभा में उपस्थित लोग हसें थे।

यदि द्रौपदी अपने पाचों बच्चों के हत्यारे अश्वत्थामा को क्षमादान दे सकती है जिसने उसके पाचों पुत्रों को (जब वे सोये हुए थे) जान से मारा था। ये शब्द अश्वत्थामा के द्वारा दिये गये घाव से भी बड़े हो गये, इतनी बात से कितना बड़ा युध्द हो गया, क्यों नहीं दुर्योधन ने क्षमा भाव अपनाया। क्षमा शान्ति का उत्तम उपाय है। क्षमा गुणवतां बलम्। ऒम शान्ति   

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