उसी आगंन में
गौरय्या घर के आँगन में यहाँ वहाँ ऐसे
फुदक रही थी मानों हमने उसे पाल लिया हो, ना किसी से भय ना संकोच यहाँ से वहाँ
इठला इठला कर बैठती फिर फुर्र करके उड़ जाती। पैरों के आगे आगे चलती तो लगता कहीँ
पैर तले दब ही ना जाए। मुंडेर पर मोर अपनी अलग ही छटा बिखेरता नजर आता, हल्की सर्द
हवाऐं, गुनगुनी सी धूप, इत्र की मानिंद चारों तरफ फुलों-कलियों की महक सभी के मन
के भीतर नई उमंग भर देती।
उसी आगंन में हमारे यार दोस्तों का जमघट लगता तो
लगता कि हमारे से ज्यादा मजे में कौन रहता होगा। एक दिन बात छिड़ गई कि साधू बाबा
तो वो बनते हैं जो लोग घर की जिम्मेदारी नहीं उठा पाते या जो परेशानियों से डर
जातें है।
उस दिन मेरे घर मेहमान, जो धार्मिक प्रवृति के हैं,
आये हुए थे उनका कहना था कि:
बिनु सतसंग विवेक न होई। राम कृपा बिनु सुलभ न सोई।
सत संगत मुद मंगल मूला। सोई फल सिधि सब साधन फूला।
जैसा निश्चल प्रेम माँ का नवजात शिशु के लिए होता
है जिसे उसने जन्म दिया हो, उसके लिए सारे कष्ट सह लेती है, लेकिन बालक को तनिक भी
कष्ट नहीं होने देती, हो सकता है कि वो बालक भी उतना ही निश्चल प्रेम करता हो अपनी माँ से।
ये निश्चल प्रेम है उसे शब्दों में परिभाषित कैसे किया जाए, ये अनुभव ही कर सकते
हैं।
लैला-मजनू, हीर-रान्झा, सोहनी-महीवाल,
रोमियों-जूलियट, कलियोपाट्रा-मार्क एन्टोनी, सलीम-अनारकली, शशीह-पुन्नू, जाने
कितने ही नामों को हम इसलिए ही याद करतें हैं कि वे एक दूसरे को दिलो-जाँ से चाहते
थे, उनकी रुह एक आईना थी जो अपने प्रेमी-प्रेमिका को दूर रहकर भी देख लेती थीं, वो
जिस भी हाल में होते, वही हाल इधर भी होता। क्या अदभुत दिलों का प्यार था! जो समीप न होकर भी बेहद
पास अनुभव होते थे, यही निश्चल प्रेम, जो हमें परमात्मा के दर्शन या अल्लाह, की
इबादत कराता है। बाकी तो शायद वहम हो।
Wonderfully clear thought Puniya ji
ReplyDeleteThanks a lot for reading sir
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