Monday, March 25, 2019

अमरनाथ यात्रा

अमरनाथ यात्रा

ये बात वर्ष 1998 की है। मैं अपने दो दोस्तों के साथ कई दिनों के लिए तीर्थ यात्रा पर निकला। बस टु–सीटर थी जो क्नॉट प्लैस, दिल्ली से रवाना हो रही थी। जब हम वहाँ पहुँचे तो सभी श्रद्धालु अपनी-अपनी सीट पर बैठ चुके थे, हमारे बैठने के थोड़ी देर बाद ही बस ड्राईवर ने गाड़ी चलानी शुरू कर दी। मेरे दोनो मित्र एक साथ बैठ गये। मेरे पास वाली सीट पर जो व्यक्ति बैठा था वह भोले नाथ बाबा का पुराना भक्त प्रतीत हो रहा था। वह अल्प विराम के बाद मधुर वाणी से भजन गुनगुना रहा था, तकरीबन 10.30 बजे तक हम दिल्ली से बाहर निकल गये। पूरी रात बस चलती रही तकरीबन सवेरे 5.00 बजे बस जालन्धर जाकर रुकी।

सभी श्रद्धालु गाड़ी से नीचे उतर गये थे। हम सभी ने मुँह-हाथ धोकर ब्रेकफास्ट किया। सभी ने कुछ देर विश्राम किया तत्पश्चात गाड़ी आगे बढ़ी। सड़क के दोनों तरफ घने पेड़ों के बीच से धूप अपनी उपस्थिति दर्ज करा रही थी। सूरज की पहली किरण मानों चेहरें का मुहँ धो रही हो। कभी न भूलने वाला शानदार नजारा था। खेतों में लहलहाती फसलों की खुशबू पूरी बस में फैल गई। हम अब पहाड़ों की गोद में जा रहे थे, जैसे-जैसे बस चढ़ाई कर रही थी  किसी को मजा आ रहा था तो किसी को उल्टी, अगली सीट पर जो माता जी बैठीं थी वह नीबूं का अचार व खट्टी-मीठी टोफियाँ अपने साथ लाई थी। जब किसी का जी मिचलाता तो वह तुरन्त अपना डब्बा खोलकर अचार व टोफियाँ देने लगतीं।

बस में जो गाने चल रहे थे वे अब लगता था मानों कोई सुन ही नहीं रहा, सब का ध्यान गहरी वैलियों को देखने में रमा हुआ था। दूर वादियों में किसी को कुछ दिखाई देता तो किसी को कुछ और। 12 घन्टों के दौरान बस ने कितने पहाड़ों की फेरियाँ लगाईं कौन गिन सकता था। हम 10000 फीट की उँचाई पर जा पहुँचे थे इसलिए कुछ के कान बंद हो गये थे। सभी को सांस लेने में थोड़ी बहुत तकलीफ हो रही थी। बुजुर्गों को साँस लेते वक्त दबाव महसूस हो रहा था।

जब हम पीर-पंजाल पहुँच गये तो वहाँ से 10-10 गाड़ियों के आगे-पीछे आर्मी का दस्ता साथ चलने लगा। वह इलाका शैतानी-नाला के नाम से मशहूर था और आतंकियों का गढ़ माना जाता था। क्योंकी वहाँ पहले भी कई आतंकी घटनाऐं हो चुकी थीं। कई घंटे सफर के बाद हम सभी सुरक्षित पहलगाम पहुँच गये। लोग अब पैदल यात्रा कर रहे थे और यहीँ से हमारी भी पैदल यात्रा आरम्भ होनी थी, लेकिन हमने देखा कि एक छोटी बस चन्दनवाड़ी तक जा रही है। हमने वहाँ तक उस बस से जाना उचित समझा क्योंकि 16 किलोमीटर का रास्ता था।

आगे की यात्रा हमें खुद ही तय करनी थी, हम धीरे धीरे आगे बढ़े, पहला पड़ाव था पिस्सूटोप नामक पहाड़ की खड़ी चढ़ाई को पार करने के बाद उसी रात को हमें शेषनाग झील तक पहुँचना था क्योंकि वह पूर्णिमां की रात थी। हमने सुना था कि इस रात यदि शेषनाग किसी को दर्शन देवें तो उसके ऊपर प्रभु की कृपा होती है। उसके सारे दुख-दर्द मिट जाते हैं। संसार के सारे सुख उसके दास बन जाते हैं।

एक से बढ़कर एक भोजन व प्रसाद के पंडाल सजे हुए थे, हर तरह के पकवान व मिठाईयाँ हमें अपनी और लुभा रहे थे। हमने भोजनोपरान्त विचार किया कि हम काफी थके हुए हैं थोड़ा आराम कर लेते हैं जब शेषनाग दर्शन देगें तो शोर भी होगा ही,  हम भाग कर देखने पहुँच जाएगें हमारा टैन्ट उस झील के समीप जो था। देर रात को एक शोर सुनाई दिया जिसे सुनते ही हम उस और भागे, बहुत भीड़ लगी हुई थी। जब हम पहुँचे तो वहाँ कुछ दिखाई नहीं दिया। कोई कहता था कि सितारों का पुँज जैसा उस छोर से उस छोर तक दिखाई दिया था। हम अभागों की किस्मत में दर्शन नहीं थे, सो नहीं हुए। किस्मत को ना कोसें तो अच्छा हो क्योंकि उस रात जैसी रात हमने दोबारा नहीं देखी क्या खूब चाँद था! लग रहा था जैसे पहाड़ों की चोटियों की चाँद के साथ कोई प्रेम लीला चल रही हो या जैसे ऊचीं-ऊचीं चोटियाँ धीरे से चांद को गले लगा रहीं हों। चारों तरफ अनगिनत तारें सजे हुए थे, ऐसा नजारा ना पहले देखा ना सुना था।

दूसरे दिन, महागुनटोप की चढ़ाई करते हुए हम पंचतरणी पहुँचे। महागुटोप की चढ़ाई पिस्सूटोप की चढ़ाई से ज्यादा मुश्किल लगी। हम सभी को सांस लेने में भी दिक्कत होने लगी थी, चारों तरफ केवल बर्फ से ढ़की पर्वत श्रंखलाएं नजर आ रही थी। पंचतरणी पाँच नदियों के संगम का नाम है। यहाँ 11500 फीट की ऊचाँई  पर ग्लेशियरों की आभा बहुत मनभावन लगी। तीसरे दिन अन्तिम पगडंडी हमें गुफा की और ले जा रही थी। लगता था कि अब पैर फिसला के तब। 1.5 किलोमीटर पहले ही से हमें गुफा की हल्की सी झलक दिखाई दे रही थी। हम सभी वादियों से, बम-बम भोले की प्रतिध्वनी की अनुभूति बारम्बार कर रहे थे। जब सभी बाबा की गुफा के नजदीक पहुँचे तो सभी ने पहले हाथ मुँह धोया, नये वस्त्र धारण किये तदउपरान्त अपनी-अपनी मान्यता के अनुसार पूजा-अर्चना करते हुए सभी ने बाबा अमरनाथ जी के दर्शन किये।

ये मलाल हम सभी को था कि हमारे पहुंचने से पहले ही शिवलिंग प्राकृतिक रुप से आधा हो गया था। किसी ने ठीक ही कहा है कि मन चाही होती नहीं हर चाही तत्काल

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