Tuesday, June 2, 2020

तेरी चुप्पी- कविता

तेरी चुप्पी

भगवान तुझे मानने वाले दुनिया में हैं कितने सारे
क्यों आज देख उन्हे लगता है कि हालातों से हारे

कभी कोई चीज चाही तो तेरे दर पर चादर चढ़ाई
माँ के मन्दिर में रत जगा कभी संध्या, चौकी कराई

तु सबकी सुनता है जो सच्चे दिल से तुझे पुकारे
आज पूरी मानव जाति फंसी है, क्यों? जूँ भी न रेंगे थारे

क्यों पत्थर हो गये  'भूख लगी है अब मुझे, कह नहीं सकते
हम भी भूखे कई दिनों से, अब और तेरी चुप्पी सह नहीं सकते

तुम बंद हो गये अंदर,  कैसे रह लोगे भूखे और प्यासे भी
यदि और नचाना अभी बाकि हो तो  देखेंगे वे तमाशे भी



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