Monday, June 1, 2020

आजकल


*आजकल*

ध्यान करो,  अपने जीवन काल में कितने रिश्ते नाते निभाये होंगे।  ध्यान करो कि जब आपने सबसे बड़ी बेटी की ब्याह सगाई शहर से अपने गांव जाकर की थी। जिसमें सारी बहनों, बहनोईयों समेत, आसपास के कई गांवों का भाईचारा निभाया था।  शहर से सो दौ सो मील दूर जाकर शादी से पहले सारी चीजों का गांव में बंदोबस्त किया था। कई दिन पहले ही पूरे घर आंगन को पत्नी ने गोबर से लीप पोत दिया था। और बाहरी दिवारों को आपके घरों में ही से किसी भाई भतीजें ने सफेदी में नीला, आसमानी, हरा ,गुलाबी रंग मिलाकर दिवारों को सजा दिया था। अपने घरों ही से चारपाईयों, गद्दों, पानी का ड्रम, पल्लड़, कनातों का इंतजाम किया था। सभी रिश्तेदारों व जानकारों और दोस्तों के घर घर जाकर सम्मान सहित ब्याह में सम्मिलित होने का निमन्त्रण दिया था। 

घर में कई दिन पहले ही से हंसी ठठ्ठों, ब्याह के गीत संगीत, नाच गाने, और अपनी बेटी को हैसियत से अधिक सुख साधन देने की इच्छायें एवं तैयारियां, तो दिन व रातों का पता ही नहीं चलता था कैसे बीत जाते थे।  एक दिन पहले घर से लेकर पूरी गली में चांदी सोने का सा वैभव देतीं झालरें और उन के बीच से रात में दिखाई देते अनगिनत तारे देखकर ऐसा लगता मानो एक बारात के साथ दूसरी बारात आसमान से उतर आई हो। लड्डु, रसगुले, बर्फी और जलेबियों की मिठास के साथ केवड़े की खुशबू अपना पता स्वंय देती प्रतीत होतीं थी कि मिष्ठान भंडार (कोठार) इधर है।    

याद आया क्या? जहां घर के जिम्मेदार सदस्यों के अलावा कोई जाता नहीं था, हांलाकि घर के बच्चों को मिठाई मिल ही जाती थी, लेकिन पहले कुल देवता और  इष्ट देवों को भोग लगाया जाता।  ये बाते ज्यादा से ज्यादा 25-30 साल पुरानी होंगी। उन दिनों को याद करें तो ऐसा लगता है जैसे कि कोई ढाई-तीन घन्टें की पारिवारिक मूवी देख कर थियेटर से बाहर आये हों। 

आज उसी तरह से उनमें से कितने रिश्ते निभा रहें हैं। ध्यान तो करो जरा। बहुत ही कम बचे होंगे। रिश्तेदार भी केवल हैसियत देखकर बुलाये जाते हैं या जिनसे कुछ काम निकल बनता हो। आजकल पड़ोसियों के घर लगी हुई लाईटिंग से पता चलता है कि इस घर में शादी है और  किसी बैंक्व्ट हॉल  में प्रोग्राम है। 

वे धन्य आत्मायें  होंगी जिनके पूर्व जन्मों के  पुण्य कर्मों का संचित फल अपने पड़ोसी और रिश्तेदारों से शुभ कार्यक्रमों के निमन्त्रण पाये। 



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