Tuesday, June 2, 2020

स्वर्गीय योगेश गौर जी (गीतकार)

* राजेश कुमार पूनिया * 
स्वर्गीय योगेश गौर जी (गीतकार) को अपने भाव समर्पित करता हूँ।


असल में  जैसे किसी भजन अथवा गीत की धुन बनाने की धुन को ही सुरत लगना कहते हैं। जब तक  वह धुन किसी भजन या गीत की आत्मा में इस तरह से न घुल जाये कि सुनने वाले की रुह या आत्मा को तृप्ति  ही न मिले तो समझो कहीं उसकी धुन या सुरत में कमी है। इसलिये ही लोगों से सुना भी होगा कि किसी भजन या गीत के शब्द या धुन इतनी अच्छी तरह से हमारी आत्मा को छू गये,  ऐसे लगा कि मरुस्थल में प्यासे को शीतल जल मिल गया हो।

यही खूबी थी स्वर्गीय श्री योगेश जी की गीतकारी में, दिल को सुकून इस तरह से पहुंचता है जैसे कि बिमार को मर्ज की समय पर सही दवा मिल जाये। खुद ही देखो ना..

                कहीं दूर जब दिन ढ़ल जाये, चाँद की दुल्हन बदन चुराये चुपके से आये,
                मेरे ख्यालों के आंगन में कोई सपनों के दिप जलाये, दिप जलाये।

या             जिंदगी कैसी है पहेली हाय, कभी ये रुलाये कभी ये हंसाये।

या फिर     बड़ी सूनी सूनी है जिंदगी ये जिंदगी, मैं खुद से हूँ यहां अजनबी अजनबी ।

जैसे          आये तुम याद मुझे, गाने लगी हर धड़कन, खुशबू लिये महका चंदन ।

और          मैंने कहा फूलों से हँसो, तो वो खिल खिला के हंस दिए
                और ये कहा जीवन है, भाई मेरे भाई हँसने के लिए

संगीत की दुनिया के अनमोल गीतकार की स्मृति में उनके लिखे गीतों को सुनकर बड़े हुए और बेपनाह प्यार करने वालों की तरफ से भावपूर्ण श्रध्दाजंली देता हूँ। भगवान अपने चरणों में उन्हें स्थान देवे। शांति शांति शांति





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