Tuesday, June 9, 2020

बुरा वक्त ही तो है



*बुरा वक्त ही तो है*


"ये जीना भी कोई जीना है लल्लू"। कई साल पहले सुना था ये फिल्मी डायलॉग, फिल्म में श्री अमिताभ बच्चन जी ये अभिनय कर रहे थे तब लगता था कि सच में वह सही कह रहें हैं। जैसे जैसे हम थोड़े बड़े हुए हमें ये मालूम हुआ कि यह कहानी की मांग है इसलिये फिल्म में हीरो ये डायलॉग मार रहा है। धीरे धीरे फिल्मों को देखने का नजरिया भी बदल गया। 

कभी मां से बेटा बिछड़ा, कभी भाई भाई से मेले में जुदा हुआ या विलेन किसी हीरो को मारे पीटे, तो भी हमारी आंखों से आसूं न निकलते पहले की तरह। हमें ये समझ आ गई कि यह एक फिल्म है और सभी कलाकार अपने चरित्रों को निभा रहे हैं।    

असल में, रील और रियल लाईफ दोनों में हम होते कलाकार ही हैं। रील में किसी कहानी की पटकथा और डायरेक्टर की मंशा के अनुरुप हमें एक्ट करना है, और रियल लाईफ में सामने खड़ी मुश्किल घड़ी के अनुरुप। 

रील लाईफ में कहते थे 'ये जीना भी कोई जीना है लल्लू', वही इंसान रीयल लाईफ में कविता लिख रहे हैं कि, गुजर जायेगा गुजर जायेगा, बुरा वक्त ही तो है, गुजर जायेगा। फर्क यह है कि फिल्म में किसी के लिखे बोल थे, और आज अपने बोल हैं। 

आपकी कविता पढकर जनमानस में एक नई चेतना जागृत हुई होगी। एकदम सही कहते हैं, कि बुरा वक्त ही तो है गुजर जायेगा, हजारों हजार साल से इस धरती पर डायनासोर, बड़े बड़े पिंड, चक्रवात, महामारियां आई होंगी, सब वक्त के साथ चली गई। यहां कुछ भी ठहरता नहीं है। 

आओ विचारें, कैसे हम दो तरह से जीवन जी रहे हैं, एक काल्पनिक या फिल्मी और दूसरा यथार्थ। हमे जब यह बोध होगा कि हम सभी कलाकार हैं और इस अंबर के नीचे अपने अपने चरित्र निभा रहे हैं। यहां कुछ भी रियल नहीं है, हम सभी आत्मायें अपने अन्तिम गन्तव्य की और अग्रसर हैं, तब रील और रियल लाईफ में कोई भेद ही नहीं रहेगा।



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