Monday, April 29, 2019

लोटा(कलश)


लोटा(कलश)

आज घर से निकलते ही मंदिर जाने का मन हुआ और पंडित जी ने कल नये घर में हवन करने के लिए शुभ दिन बताया है। एक साल बाद वो दिन आ ही गया जब गृह-प्रवेश का दिन तय हो गया। घर खरीदे हुए तो एक साल हो गया है लेकिन जाने क्यों अभी तक हवन न हो सका था। सारी चीजें बहुत जल्दी करनी थी, जैसे सभी को निमन्त्रण देना, भोजन की व्यवस्था एवं पूजा सामग्री लाना। सबसे पहले सभी को कल के प्रोग्राम के लिए दूरभाष द्वारा सूचित किया। इस कार्यक्रम में परिवार एवं पड़ोसियों को ही निमन्त्रित किया था। पूजा सामग्री की सूची लेकर तुरन्त मैंने सारा पूजा का सामग्री खरीदी, मुझे ये सामान खरीदने में ज्यादा देर न लगी क्योंकी, एक दुकान जहां लिखा था यहां पूजा का सारा सामान मिलता है में पहुंच गया। साथ ही एक हवन कुंड भी ले लिया। दुकानदार ने मुझे बताया कि हवन-कुंड भी ले जाओ, दो सौ रुपये जमा करा कर, जब वापस करोगे तो जमा रुपये लौटा दिये जाएंगे। हमारा फर्ज है आपको बताना कि हवन-कुंड के बिना फर्श खराब हो जाएगा। दुसरा रास्ता है कि किसी परात में मिट्टी भर लेना, तो भी चलेगा। सही में ये बात मुझे ध्यान न थी कि हवन कुंड के बिना फर्श खराब भी हो सकता है।

पंडित जी ऑटो से आये थे। वे गली ढुंढ रहे थे। उनका मोबाईल फोन आया कि वे फलां जगह पर हैं। मैनें उन्हे वहीं मेरा इन्तजार करने के लिए कहा। कुछ देर बाद में उन्ही के साथ अपने नये घर पर आ गया। ऑटो वाले ने कहा कि 150 रुपये बने हैं। पंठित जी ने हमें भुगतान करने के लिए कहा। हमें थोड़ा अजीब तो लगा लेकिन अब किया क्या जाए। पन्डित जी ने शुरु में ही थोड़ा वक्त की पाबन्दी बता दी थी। अत: कार्यक्रम उसी के अनुसार तय किया गया था। सुबह के 9.30 बजे हवन शुरु हो गया। उन्होनें हमसे पूछा कि सब चीज ले लिये थे? मैने कहा जी पन्डित जी जैसा लिस्ट में लिखा था सभी सामान ले लिया है। उन्होने वास्तु शास्त्र के हिसाब से भगवान गणेश, लक्ष्मी, हनुमान आदि की प्रतिमाओं को एक लाईन में स्थापित कर दिया। पूजा प्रारम्भ हो गई। अब तक एक दो मेहमान भी आने शुरु हो गये थे।

पण्डित जी ने सबसे पहले हमें एक-एक फूल दिया और कहा कि सौ-सौ रुपये लगा कर सभी देवी-देवता को अर्पित करें। हमने कहे अनुसार ही अर्पित कर दिया। ऐसे ही एक परात में बने पांच देवी-देवताओं को भी हमने पांच स्थानों पर 100-100 के नोट चढ़ा दिये। कई बार पण्डित जी मंत्रोचारण के दौरान केवल ईशारे से ही रुपये चढ़ाने के लिए कहते। पण्डित जी बीच-बीच में शखंनाद द्वारा पूरे घर को पवित्र करते। जब करीब आधा घन्टा हो गया तो उन्होंने हवन कुंड में सारी लकड़ियाँ डाल कर और संवीदा डालकर अग्नि प्रज्वलित कर के कुछ देर मंत्रोचारण किये। सभी को थोड़ी-थोड़ी हवन सामग्री डालने को कहा। जब सामग्री थोड़ी सी बची तो पूर्णाहूति दे दी गई। सभी को खड़े होने को कहा। सभी औम जय जगदीश हरे...गाते हुए आरती करने लगे। दीपक थाली में रखा हुआ था। एक स्वास्तिक उस थाली में बना हुआ था। सभी को बारी-बारी से उसमें कुछ दक्षिणा रखनी होती है, और उसके बाद आरती करके आगे बढ़ानी होती है। जब लगभग सभी आरती की थाली को ले चुके थे, उन्होने आरती समाप्त कर दी। अंत में आम की पत्तियों की वंदरवाल बनाने की उन्हें याद दिलाई गई। 

हम सभी देख कर भोंचक्के हो गये कि ये केवल रुपये बटोरने के लिए ही कर रहे थे क्या? अपनी श्रद्दा अनुसार हमने वस्त्रादि से उनका मान किया, दक्षिणा में 1501 दिये। अब पंडित जी हमसे कहने लगे कि एक दोने में गाय के लिए भोजन निकाल दिजिये। सबसे पहले कन्या को भोजन कराइये। लेकिन खुद भी जल्दी में थे। उन्होने इतनी जल्दी –जल्दी में खाना खाया कि जैसे रेल छूट रही हो। पंडित जी आराम से भोजन करिये हमने उनसे जैसे ही कहा, एक कटोरी उठा कर बोले ये लाओ, अब वो लाओ, अब ये लाओ अब वो लाओ। हमारे इतने चक्कर लग गये कि हमें कहना ही पड़ा कि पंडित जी बुफे सिस्टम है आप खुद ही ले लिजिए ना। लेकिन वे बोले हम खाने के दौरान उठ-बैठ नहीं करते। आज से पहले, किसी को इतना सारा खाना इतनी जल्दी खाते न देखा था। यदि गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में होते तो पक्का रिकॉर्ड बना देते। जब खाना खा लिया तो कहने लगे ये थाली अब हमारी होती है। और साथ ही ये लोटा भी। हमने कुछ ना कहा, बस इतना ही कह पाये  जी ठीक है। चलते-चलते पंडित जी ने थोड़ा ईशारा किया कि मंदिर में बड़े पुजारी जी पुछें तो कहना 501 दक्षिणा दी है। हमें ये सुनकर थोड़ा अटपटा सा लगा, सो पूछ लिया क्यों झूठ बुलवाते हो हमसे। जो दिया है वहीं बताने में क्या हर्ज है पंडित जी। वे थोड़ा नीची नजर करके बोले आप नहीं जानते उनको बहुत धुर्त पंडित हैं। हम उनको आज से नहीं कई साल से झेल रहें हैं। उनके चेहरे के भाव ने मुझ पर गहरा असर कर दिया था, मुझे वे एक शोषित मनुष्य नजर आने लगे। इस वजह से मेरे मुहं से अनायास ही निकल गया कि, ठीक है, नहीं बताऊंगा कि आप ने क्या दक्षिणा ली।

जब जाने लगे तो कहा, अब हमारे जाने का किराया तो दीजिये, एक बड़ी सी डकार लेने के उपरान्त उन्होने कहा कि यहां से वहीं 150 रुपये बनेंगे। चलो अब इतने गये थोड़े और सही, यही सोचकर हमने उन्हे खुशी-खुशी अपने घर से विदा किया। हम सभी ने उनके जाने के बाद कई देर तक उन्हे याद करके हंसते रहे। हमारे भाई उनकी बचकाना हरकतें सहन नहीं कर पा रहे थे, उन्होंने अपना गुस्सा कई बार पीया। अगले दिन जब पत्नी को घर पर लोटा न मिला तो हमने बताया कि वो तो पंडित जी ले गये। पत्नी बोलीं, उसी लोटे(कलश) में पानी भरकर कल गृह-प्रवेश किया था, उसे कैसे ले गये पंडित जी? मैंने पहली बार किसी पंडित को लोटा(कलश) अपने साथ ले जाते देखा है। क्या वे नहीं जानते थे? कि लोटे को नहीं ले जाते और तब जब पता है कि उसी लोटे में जल भर कर गृह-प्रवेश किया था। मैंने भी उन्हे नहीं रोका ये सोचकर कि उन्हे ज्यादा ज्ञात है।

एक तो वैसे ही उन्होंने अपनी लालची हरकतों से सभी को नाखुश कर दिया था, अब हमें ये बात अत्यंत बुरी लग रही थी, थाली तो सही है जिसमें खाना खाया था। लोटे को भी अपने साथ ले गये। ज्यादा देर न करते हुए उन्हे तभी मोबाईल फोन लगाया। उधर से आवाज आई कि बोलिए बन्धु। हमने पुछा लोटा क्यों ले गये आप? उस पर आपका हक नहीं बनता, कब आऊं लेने? वे कुछ न बोल सके केवल इतना ही कहा कि कल शाम में आके ले जाना। मुझे यह दुख भी था कि पंडित जी को दे दिया तो दे दिया, अब वापस क्या मांगना। बस वजह यही थी कि लोटा झूठ बोलकर ले गये थे। दुसरा, हमारी आस्था थी कि वह लोटा जो गृह-प्रवेश के समय प्रयोग किया हो वह घर में रहना चाहिए।

जब नियत समय पर मन्दिर गया तो वे एक और बुजुर्ग पंडित जी के समीप ही बैठे हुए थे। मुझे देखते ही वे एकाएक खड़े हो गये और मुझे बोले कि मेरे पीछे-पीछे आओ। मैनें कहा कि आप यहीं ले आईये। मुझे वहीं खड़ा देखकर वे दौबारा बोले आ जाओ अन्दर ही आ जाओ। मैं समझ नहीं पा रहा था कि वे मुझे अन्दर क्यों बुला रहे हैं। चूकिं में थोड़ा क्रिकेट खेल का शौकीन हूँ, मैंने उन्हें कहा कि आप थोड़ा बात समझें मैच शुरु होने वाला है। दिल्ली का मैच है आज, मुझे मैच देखना है। वे जैसे ही अन्दर गये, बुजुर्ग पंडित जी ने मुझसे दबी आवाज में सवाल किया कि कल हवन करवाने की दक्षिणा क्या दी थी पंडित जी को? मैं अब तक सारा माजरा समझ गया था कि क्यों पंडित जी मुझे अन्दर आने के लिए चेष्टा कर रहे थे। वे नहीं चाहते होंगे कि मेरा सामना उन्ही बुजुर्ग पंडित से हो। वे बार- बार मुझे बताने के लिए मजबूर कर रहे थे। बुजुर्ग पंडित जी दौबारा बोले, ये बहुत चालाक है, इसे तुमने क्या दक्षिणा दी मुझे बता दो। मुझे ये बताने में थोड़ा संकोच हो रहा था क्योंकि उस पंठित जी ने इस पंडित जी को बहुत धुर्त कहा था। मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि असल में कौन कितने पानी में था। पहली बार मुझे ऐसे पंडित जी मिले थे जो यज्ञ हवन में बड़ी-बड़ी ज्ञान की बातें कर रहे थे लेकिन खुद थे पोंगा।

जब कभी मैं ऐसी विषम परिस्थित में फंसा हूँ वहां से केवल मेरे ईश्वर ने ही मुझे बचाया है। आज फिर मुझे एक विचार दिया। उसी समय पंठित जी लोटा लेकर आते दिखे। मैनें बुजुर्ग पंडित जी से पूछा, क्या आपको बाद में बता दूँ? देखो पंडित जी इधर ही आ रहे हैं। उन्होनें कहा एक से दौ के बीच में ये लन्च पर जाता है, तब आके बता देना। घर आकर सारी कहानी जब बच्चों को बताई तो वे कहने लगे क्या मन्दिर के पुजारी भी ऐसी सोच रखते हैं? मैंने उन्हें कहा कि बच्चों अभी तुम बहुत छोटे हो जब बड़े हो जाओगे तब समझोगे कि जिसे हम जहां ढूंढते हैं वह वहां हर बार नही मिलता।

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