Thursday, May 2, 2019

आदत से मजबूर हैं


राजेश कुमार पूनिया
आदत से मजबूर हैं। (स्वच्छता पर लघु नाटक)

जगबीर- (पान खाते हुए) भोला सुनो, ये कुड़ा करकट कब उठाओगे, और ये पतझड़ में गिरे पत्ते  क्या यहीं सूख जाएंगे। सफाई क्यों नहीं करते हो? महीने में आ जाते हो रुपये लेने।

भोलानंद- जी वो कल ही उठा दूगां। अब पतझरिया में हर और पत्ते ही पत्ते बिखर जाते हैं। कोई कितना साफ करे।

जगबीर- देखो याद करके उठा लेना, बता दिया तुमको।

भोलानंद- कल साफ मिलेगा जी।

जगबीर- (सड़क पर चलते-चलते, साथी के साथ बातचीत) हर और साफ सफाई रहे तो कितना अच्छा हो। कितनी गंदगी है यहां, ये कैसा शहर हुआ भला। देखो भाई, सफाई या स्वच्छता पर कहना मुश्किल हो सकता है, लेकिन करना तो बहुत आसान है।
सतीश - अपना मुंह तो एक मिनट के लिए भी खाली नहीं कर पाते। बस इतना ही कहुंगा पर उपदेश कुशल बहुतेरे

जगबीर- पर उपदेश कुशल बहुतेरे, मतलब?

सतीश- घर जाकर समझोगे।  आदत  बदलो अपनी। मुझे प्रतिवर्ष अपने विभाग में स्वच्छता पर निबंध या लेक्चर देने पर पुरस्कार मिलता रहा है, लेकिन सफाई करना इतर बात होती है। भाई जी, भारत को स्वच्छ बनाने के लिये केवल  गांधी जी का चश्मा ही काफी नही। हम सबको गांधीजी की विचारधारा को सम्पूर्णता से  समझना चाहिए।
आकाश- (बात बीच में ही काटते हुए) यही तो बिमारी है। कोई कुछ अच्छा करे वो भी नहीं सुहाता लोगों को। हम बात कर रहे थे सफाई की, और आप इसे ले आये अपनी घटिया  राजनीतिक बहस पर।
साथी- जिसका काम उसे ही साजे।

आकाश- क्या अनाप-शनाप कह रहे हो। इस युग में तो ऐसी बात न करो। दुनिया कहां की कहां पहुंच गई है, और आप हो कि उसी जगह खड़े हो। दूसरे countries को देखो वहां कोई इतनी सफाई नहीं करता जितनी हमारे देश में होती है।
विकास-    अच्छा..!

आकाश- हाँ, बिलकुल वे लोग हमसे कम साफ- सफाई करते हैं। कई-कई दिन तक खुद तो नहाते नहींवो क्या जाने सफाई का अर्थ। लेकिन फिर भी वहां हर तरफ साफ-सफाई कहीं  ज्यादा नजर आती है।
आकाश-   पता है ऐसा क्यों?

विकास-   नहीं पता ... तुम बताओगे? .....चलो बताओ।

आकाश-   सिर्फ वे लोग इतना ही करतें हैं कि वे कहीं भी कुछ भी नहीं फेंकते, बस, हो गई आधी सफाई तो यूँ हीं। वहां चलते फिरते गंद नहीं फैंकते। अपनी आंख बचा कर यहां वहां नहीं  फेंकते कुछ भी।
साथी- एकदम सही कह रहे हो भैया।

आकाश- पर इन जैसों का क्या करें, सारी दुनिया में शहर को लल्लुओं की राजधानी बना दिये  हैं।

सतीश- ये बहुत प्रेम से खैनी, गुटका, तम्बाकू व पानवा का सेवन करते हैं, जब मुंह में संभाले नहीं संभलता  उबेक देते हैं यहां वहां।

विजय- अब जिसे नहीं सुधरना उसे कौन सुधार सकता है।

आकाश- सौ बार ना सुधरे, खाये गुटका, पान तम्बाकू लेकिन अपने घर। ताकि जब गंदा हो तो केवल उसे ही चिंता हो। दिक्कत तो तब है जब वो हमारे शहर को गंदा करता है।
विजय- हाँ कहना तो वाजिब है आपका, जो ये सब नहीं खाता वो भी अपने जुतों, चप्पलों में ये गंद सनाये, घुमने को मजबुर है।

आकाश- एक IDEA है मेरे जहन में सुनो-समझो तो बतांऊ।

विकास- भाई अपना आजाद देश है सबको अपनी राय रखने का हक है, ये पड़ोसी मुल्क नहीं है।

आकाश- IDEA ये है, जो public place सार्वजनिक स्थान पर मुंह में पान, गुटका इत्यादी रखा मिले उसे प्यार से हम सभी थोड़ा टोक दिया करें। केवल इतना कह दें भाई ये जो पीक मारोगे ना, उससे अपना शहर गंदा होता है, कृपया एक जगह बैठकर किसी डब्बी में रख लो या नैपकिन  का प्रयोग कर  के उसो यूज मी में डालो। प्यार से ज्यादातर लोग मान ही जाते हैं ये मेरा  अनुभव कहता है।
रणबीर-  जिन्हे नहीं मानना वे किसी की नहीं मानते।

आकाश- जो फिर भी ना माने उसे कम से कम DTC Buses, DELHI  Metro में तो न चढ़ने दें। जब इन जैसे लोग अपना मुंह खोलते हैं सारी बस में बदबू (नाक पर हवा करते हुए) हो जाती है। सही मेंऐसे लोगों की वजह से ही आधे लोग ऑटो करना पसंद करते होंगे।

रणबीर- फ्री में नैपकिन बांट दोगे फिर भी वे थूकेंगे, सड़क पर ही, मैं जानता हूँ इनकी रग-रग को। ये कहतें हैं सफाई कर्मियों को सरकार तन्ख्वाह किस बात की देती है। ये ना मानै किसी की भी, भाई ये डंडे के यार हैं डंडे के।


(सभागार में उपस्थित आप सभी से ये विनती है कि घर अपना है तो शहर भी तो अपना ही है। बस इतना ही समझ लिजिए तो ये बुरी आदत एक दिन में छूट जायेगी)

कुछ अंतराल के बाद.....(लगभग 5 सैकेंड)


पर्दे के पीछे एक शोर होता है..रोने की सी आवाज आती हैं।


(क्या हुआ ये आवाजें कैसी आ रहीं हैं), अरे वो अपना भोलानंद ....क्या हुआ भोलानंद को।  

संजय- भोलानंद अब हमारे बीच नहीं रहा,

आकाश- नहीं रहा ?

संजय- हाँ, वो सेफ्टी टैंक की सफाई करने उसमें गया था। अन्दर गैस जहरीली थी। टैंक के अन्दर ही दम घुटने से मौत हो गई उसकी। जब सारे उपकरण नहीं मिलेंगे तो यही  होगा। 

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