Tuesday, January 19, 2021

होती है अपनो से ही प्रीत, है जग की यही रीत,
पराये भी अपने ही हैं, तू दिलो को सबके जीत

आते हैं जवानी के दिन सभी पर चंद दिनों
आती है जवानी यूँ तो गधों पर पल छिनों

आज ये कुफ़्र जो तेरे जह़न में तमतमाया है
सोचना कभी, खोकर माँ बाप, क्या पाया है

लड़की हिन्दू हो या ईसाई, फर्क पड़ता नहीं भाई
लिये फेरे, आशीर्वाद बिन, ये बात रास नहीं आई

क्यों  इतना अब रोता है, बुजूर्गों के चले जाने पर
तू माफ़ करना सदा इन्हे ईश्वर, दर तेरे आने पर

रहती थी वो सदा प्रभू की चौखट पर
आज किवाड़ पूरे खुल गये द्वार के

कई साल तक रहा था सहारा उम्मीद का, पर अब छूट गया ।
कभी अंगुली पकड़ चला, आज भटका फिरे, सपना  टूट गया ।


शौक तो है हमें भी, अपने चांद पर लिखें क्या, समझ नहीं आता

हैं जो तुम्हारे लिये हम, वो औरों को दिखें क्या, समझ नहीं आता


               
तड़प रहे हम यहां, ज़नाब तो होगें राहत ही राहत में

शेर अर्ज किया तो कौन सुनेगा, जायेगी नींद आहत में

 

राहत की सांसे लेने का वक्त गया तो राहत भी चला गया

कौन सुबह से रात तलक मुहंनकाब किये बेगम बना फिरे

 

इतनी तसल्ली है. मेरे जाने तक मुल्क मेरा बोल रहा है

और तो सब ठीक ही है, बहरे के आगे बज ढोल रहा है

 

दिल की दवा देते थे सभी को,  जो कोई तंग दिल लिये आया

 दिल  दिल से  मजबूर हुआ, क्यों न शेर सुना, दर्दे दिल दूर हुआ


 बुरखा तो आशिकों का पहले ही से था दुश्मन

मोहतरमा, मास्क ने और किया दिदार दुश्कर

 

खूब धोये हाथ भी, लगाया मास्क ऊपर मास्क

होना जिसे होगा ही, यू प्लीज डोन्ट आस्क 

..... 

 पल पल  तुम  बहाने  बनाया  ना  करो 

आये  घर  कोई  तो  चाय  काली  पिलाया ना करो 











No comments:

Post a Comment