Friday, June 24, 2022

अज़ब आया गज़ब गया

 अजब आया गज़ब गया

 

बात  उन दिनों की नहीं कल की है। सोमवार की सुबह एक विभागीये ई- मेल सब कर्मचारियों व अधिकारियों को की जाती है, की फलां विभाग अमुक प्रतियोगिता का आयोजन कराने जा रहा है,   प्रतियोगिता में भाग  लेने वाले इच्छुक प्रतिभागी शुक्रवार तक नामांकन अद्योह्ताक्षरी को ई-मेल या पत्र द्वारा सूचित करें। 

लगभग ढाई साल से बेट घर के उसी  कोने में है जिस में था, जब कभी दरवाजे के पीछे छांका भी तो नजरे नहीं मिला पाता, वह बेट जो करारे शॉट लगाता था, जिसके मुंह बॉल का लाल रंग लग चूका था, वह ये पूछता प्रतीत होता था कि मेरी कोई गलती तो बताओ, किस दिन मेेने तुम्हारा साथ नहीं दिया, फिर ये अचानक से मुझसे बिन बताये मुंह मोड़ने का सबब, क्या कोई और मन भा गया? और में नीची नाड़ (गरदन) करके उसे कुछ न कह पाता। उसे क्या पता बाहर लहर पे लहर आती जाती हैं। कोने में पड़ा है तो जिंदा हैं, नहीं तो क्या पता । 


मेरे दिल ने भी कुलाचें खानी शुरु कर दीं, उस दिन शाम को घर पहुंच कर अपने बैट को तेल पिलाया जो कई दिनों से आराम फरमा रहा था । तेल पिलाने से होता यह है कि बैट की खुसकी नहीं रहती और तर शाॉट लगते हैं वह भी पंचम स्वर के साथ।

अगले दो दिनों तक उत्तर,पूर्व की दिशा में जहां  टीम बनाने की प्रकिया जारी थी, हमने आते जाते  कहा कि भाई हमारा नाम भी डाल देना , वेैसे मेनें ई-मेल भी कर दिया है, जवाब मिला, औके जी। 

आप जानते ही हैं कि टीम के चयन की एक प्रक्रिया होती है,  यह बात अलग है कि वे किस तरह की टीम बनाने के इच्छुक हैं, यानी, कितने  ऑफ स्पीनर, लैग स्पीनर,  कितने तेज गेंदबाज, कितने हरफनमौला (आल राउंडर) या कितने  फिल्डर टीम को जीत दिलाने के लिये आवश्यक समझते हैं। 

उस दफ्तर  में रातों रात एक राज्य स्तर की टीम का गठन किया जाता है, मालूम हुआ कि टीम गठित करने वालों में किसी को abcd  नहीं मालूम की मूली की जड़ किस तरफ होती है। समझ ही गयें होंगे,

दबाव ये कि एक सप्ताह में टीम बनाकर उनके नाम उस कार्यालय को प्रेषित करने हैं जो ये प्रतियोगिता करा रहें है। और ये विदित रहे कि सबसे कम  दबाव तो ये था कि टीम मैं किस किस को रखना है और  किस किस को बाहर का रास्ता दिखाना है। 

गत  कई  वर्षों  से  विभागीय टीम  मैदान में  धूल से सनकर कर और धूप में नहाकर  बनती आई थी वह डस्ट रहित कमरे के अंदर ठंडी हवा के साये में  में तैयार हो गई और विभाग की तरफ से नए जूते और ट्रैक सूट  उपलब्ध  कराने के उपरांत सरकारी खर्चे पर उनकी प्रैक्टिस इत्यादि का प्रबंध किया गया । क्योंकि सारे खिलाड़ी इत्ते अव्वल दर्जे के चुने गए थे अतः प्रैक्टिस  में एक आध पहुंच पाता की उन्हें पहले ही सेलेक्ट कर लिया था  अब कौन 😆 इती गैमि  में  जाये। 😄,इधर  जो अपने को सबसे बड़े  क्रिकेट के घाघ समझे  बैठे  थे, मायूसी की तंग  पिच  पे नागिन नागिन डांस रहे थे। केवल अपने अपने की दुआएं लिये और मीठी दही का आश्वादन  करके सभी  बांकुरे मैदान ए क्रिकेट में अपना जौहर  दिखाने  और  विरोधी टीम  को नाकों चने  चबाने  के लिये तत्पर खड़े हैं , और वहीं वे  घाघ खिलाडी मायूस दिल साथ वही नागिन नागिन डांस लेकिन  छत्पर  पड़े हैं।

अच्छी बात ये रही की प्रायोजकों ने हर एक टीम से 3 टीमों से खेलने  की योजना बना  रखी  थी, वे टीमों के स्तर को 1 या 2 मैचों  से नहीं आंकना  चाहते  होंगे, की कौन कितनी बेहतरीन है  और किससे बेहतरीन है, वरना  टीमों को 1st 2nd 3rd करने में क्या देर लगती, बस उतनी ही जितनी हमारे  विभाग  को टीम  बनाने में  लगी  होगी। 

में एक लेखक  की नजर  से देखता  हुँ इसलिए  भी और इसलिए भी की में भी  क्रिकेट प्रीतियोगिता का हिस्सा बनना चाहता था । चिंचित  हुँ, की जहाँ  सबसे उम्दा टीम  के सिर पे जीत  का सेहरा होगा वहीं  एक टीम  के माथे  पे ये कलंक  भी होगा की सबसे उम्दा टीम तो आपकी थी तो फिर सबसे कम स्कोर पर ही कैसे पूरे बाहर (all आउट हो गई, वहीं  आपके विरुद्ध सबसे ज्यादा रन बनाये गए, क्या न्याय अंत में  ईश्वर  करता है, सच का  गला घोंट कर  केवल दुआओं और  दही  के सहारे  कैसे मैच  जीता जाता।

अपने ओवर की पहली ही बॉल  पे चौका  लगना वैसे ही दर्द का अहसास कराता है जैसे मिर्च काटने पर ऊँगली का काटना कराता है। 



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