Thursday, July 2, 2020

संवेदना


संवेदना


कटे पर नमक छिड़के तो बहुत पीड़ा होती है और कोई नमक छिड़क छिड़क के घाव कर दे, उसके बारे में क्या कहा जाए।  यूँ तो भाई बहन का रिश्ता अनमोल होता है, इस रिश्ते का किसी एक आध घटना से जोड़कर आंकलन करना बिलकुल भी ठीक नहीं होगा। यद्धपि ऐसा भी होता है, जब बहन अपने भाईयों का समाज में इस तरह से निरादर कर देती हैं, जिसे सपने में भी नहीं चाहेंगे।

सभी अपनी समझ व सामर्थ्य के अनुसार मात पिता की सेवा करते ही हैंकोई विरला एवं अभागा ही माँ बाप की सेवा नहीं करता होगा। बहन को ये वहम हो गया कि उसके भाईयों ने माँ बाप की ठीक से सेवा नहीं की। 

"वैसे तो दूसरे घर से आने वाली भीआप और हमसे  कहीं ज्यादा सेवा कर दिया करती हैंलेकिन दुनिया का दस्तूर है कि बहू की सेवा बहुत कम ही लोगों को नज़र आती है।"

कुछ दिनों के लिये माँ जी अपनी बेटी के घर मिलने गई थीं। एक दिन वहां  से फोन आया माँ जी को तकलीफ हो गई है, आकर ले जाओ।  उन्होने भी डॉक्टर को दिखा दिया था, लेकिन वह बिमारी समझ नहीं पाये।

हम उन्हे अपने घर ले आये, और बड़े अस्पताल में दिखाया। बहुत अफ़सोस हुआ कि माँ जी को कर्क रोग ने अपने चंगुल में बुरी तरह से ले लिया था। उन्हें पेट में असहाय दर्द होने लगा था, जैसे बिच्छू एक साथ डंक मार रहे हों, साथ ही उल्टियां भी होने लगी थी।कई चिकित्सालयों में ईलाज कराया अंत में डाक्टरों ने उन्हे पैलिएटिव कैयर देना शुरु कर दिया। उनकी असहनीय पीड़ा को मोरफिन इंजैक्शन देकर कम किया जाता था।

हमने कई जगह माथा टेका, मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे। यदि माँ जी को कुछ हो गया तो,  बुरे विचार सताने लगे।ऐसी अनहोनी, कभी न सोचा था कि इतने बुरे दिन आ जायेंगे।

आज तक हर वो चीज़ जो माँ जी ने कही, कोशिश रहती की पूरी कर सकें। भले ही दफ़्तर को देरी हो जाती। जो कामकाजी हैं वे जानती हैं कि जब घर में कोई नौकर चाकर न हो तो घर का कितना काम हो जाता है। 

बहुत ही अच्छे दिन कट रहे थे, मां जी की इच्छा हुई तो कभी सब्ज़ी काट दीकभी दूध उबाल दिया। कभी जब साग, कढ़ी खाने का मन होता तो कहतीं कि तू हट आज मैं बनाऊँगी ये सौदा। 

दीदी रहती तो दूर थी पर उनका आना जाना लगा रहता था। हम उनके आने पर खुश होते। तरह तरह के पकवान बनाते। जब सुबह के सारे काम निपटा के मैं ड्यूटी जाने लगती तो यह ज़रुर चाहती की वे और कुछ दिन यहीं रूकें,  इसलिये  दीदी मेरे पीछे से चले मत जाना, ये कहकर ही बाहर पांव रखती। कितने अच्छे दिन थे वे।

सुना है कि जब ग्रहों की चाल बदलती है तो अच्छा  या बुरा प्रभाव अवश्य ही पड़ता है। दीदी,  जो हर महीने आ जाया करती थीं, माँ जी के जाने के बाद, कई सालों से  मेरे घर न आई हैं। उनकी नज़र में माँ जी की हमने वह सेवा नहीं की जो होनी चाहिये थी, इसलिये ही वह बिमारी से चल बसीं।

ऐसा समय बहुत दुविधा में डाल देता है, जब अपनी ही बात सही लगती है और दूसरों की सब गलत। 

माँ जी के जीवनकाल में, जो सुख मिला, कैसे बतलाऊँ, कभी कहा सुनी भी हुई तो वहीं  प्यार भी अथाह मिला। सुबह की बेला व संध्या में हम जब सैर पर जाते तो लगता ही नहीं कि हम सास बहू हैं। लगता कि कोई हम उम्र ही हैं। उनको लता जी के सदाबहार गीतों के बोल गुनगुनाने में बहुत आनंद आता।

कई बार, जैसे बच्चे राह में चलते चलते फूल पत्तियों को तोड़ते और सुंघते हैंवैसे ही मां जी भी किसी फूल या पत्ती को हाथ में पकड़कर पूछती की बेटी ये क्यां की फूल पत्ती सै?

क्यों उन्हें मरवे के पत्ते और संतरे के छिलकों की खुशबू बहुत अच्छी लगती थी, मैं जान न पाई। मरवे की चटनी बनाना मैंने उन्ही से सीखा ।

मेरे दफ्तर से घर लौटने पर जब माँ जी अपनत्व से कहतीं, ऐ बेटी ला, तेल लगा दे मेरे बालों में। 'मेरी  थकान जाने कहां चली जाती और मेरा मन, मरवे व संतरे के छिलकों की खुशबू की तरह महक जाता।'

काश! आप होतीं, आपको कितना अच्छा लगता कि तुम्हारे पोता पोती अब जवान हो गये हैं।  

बहुदा, बहुएं सासु माँ को बहुत बुरा भला कहा करती हैं। सब को  'मेरी माँ जी जैसी सास ही मिली हो, ये मंगल कामना है।'






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