बचपन के रंग
जब जो चाहे वो करते थे, मां से प्यार और बाप से डरते
थे।
दिन तो वही अच्छे थे हुआ हम करते जब बच्चे थे।
दिन तो वही अच्छे थे..
शिखर दोपहरी, सिर पर छाता, न कभी गरमी में मरते थे।
मां चलती संग, पकड़े अगुंली, हाथ थोड़े धूप से जलते थे।
दिन तो वही अच्छे थे..
जब जो चाहे वो करते थे, मां से प्यार और बाप से डरते
थे।
गोदी से उठा कन्धे पर, जब पापा फिरकी घुमाया करते थे।
चक्कर आते तो, में गिर ना जाऊं यही सोच डरते थे
दिन तो वही अच्छे थे..
जब जो चाहे वो करते थे, मां से प्यार और बाप से डरते
थे।
पहने लिबास सिले जो मां ने, हाथ न उनके थकते थे।
एक कमाता और सब खाते, सबके यूं ही बच्चे पलते थे।
दिन तो वही अच्छे थे..
जब जो चाहे वो करते थे, मां से प्यार और बाप से डरते
थे।
अब न मिलेगी गैंद तुम्हारी, जब अंकल यह कहते थे।
साथी बच्चे हमसे गैंद मंगाते, हम ही अकेले फंसते थे।
दिन तो वही अच्छे थे..
जब जो चाहे वो करते थे, मां से प्यार और बाप से डरते
थे।
हवा में उड़ती पतंग हमारी बच्चे सारे देखने जुटते थे।
सो जाते शाम ही को थक कर, सपनों में फिर खुद उड़ते थे।
दिन तो वही अच्छे थे..
राजेश कुमार पूनिया पुत्र स्वर्गीय श्री पी एस पूनिया , माँ स्वर्गीय श्रीमती भगवानी देवी
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