Sunday, March 10, 2024

दलित लहसुन प्याज हुँ

 

मैं किसी के घर नहीं जाती आजकल, पूछो, क्यों  क्या बात हुई ।

सुनो, दलित लहसुन प्याज हुँ में, जब तब धर्म-कर्म की बात हुई

भले मैं सत्ता का पत्ता काट सकती हुँ पर मेरी कोई औकात नहीं

पर है विश्वास उन्हे, खाकर मुझे, मिलती ईश्वर की सौगात नहीं।

मेरे द्द्दा कहते रहे, छोड़ जिद्द, की वहीं जाना, जरुरी नहीं।

गरीब पे रहम, निकाल वहम, ये संगमी नहाना, जरुरी नहीं

बस दिन कुछ और ठहरो, मैं दिन रात, तड़के में आने लगुंगी,

खायेंगे चाव से, भोजन परोसने से पहले मैं इनकी सलाद बनुंगी

नये त्योहार तक आखों से सबके प्याजी आसूँ नहीं थमेंगे

छल्लों में हरीहरी चटनी और रातों में जश्न के जाम जमेंगे

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