कलकल खलखल बहती नदी सहम सी गई जब हम उसके तट पहुंचे
हम सभी थे अति उत्साहित देखने सुनने वादियों की बिखरी छटा
वह खामोश हो गई, मौन हो गई, शौर जब हमारा असहनीय बढ़ा
हम मस्ती में चूर थे, चूरचूर नान की तरह, बूफे खाना और फोटो खिँचाना ही बस काम था
वह इधर हथेली से सहलाता नदी की लहकती कमर, साथ ही एक भाई कंकड़ ही उछालता था
सायं सायं सी ध्वनी झरनों की, अनवरत मध्धम मध्धम, होकर कानों में आने लगी
योग करते, कोई विवाह पूर्व फोटो शूट, चाय पीते लोग, टोलियाँ नई नई आने लगी
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