Sunday, May 31, 2020

सोचता हूँ- कविता


*सोचता हूँ *


कैसे जातियों के जंजाल में पड़कर, ये मानव घन चक्कर हो गया
एक चोला एक जाति  था, इतना अंधा , गधा घोड़ा खच्चर हो गया

हैं छेद यहां बहूतेरे दिलों में, रफू करने वाला रफू चक्कर हो गया
ढूंढा यहां वहां उसे ताउम्र,  यूँ ही दूनिया का एक चक्कर हो गया

प्यार दिल ही में करते रहे हरपल, दिल न जाने कब कबूतर हो गया
थी सतरह बरस में गुटर गुं, वो बांका जवां अब उम्र सत्तर हो गया

अब टांगें बांकी, है मेहमधु रानी, रक्तचाप सौ जमा सत्तर हो गया
घर रानी बिन जीवन फीका, दिन ब दिन हाल बद से बत्तर हो गया

सोचा न था पाठ हमें कभी ऐसा पढ़ायेगा कैसे पुत्र कलत्तर हो गया
घर घर का यही हाल है, पैदा हों फिर काटें जैसे डेंगू मच्छर हो गया

क्लच का है मोटर में जो काम, वैसे बुजुर्ग घर का  क्लचर हो गया 
चुप अच्छा, रहो एक कोने में, बीच में बोले तो लैक्चर हो गया

10 comments:

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  2. Wah wah kya baat hai....bahut khub

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    1. अहंकार छोड़कर वचन उच्चारे|आशा है कि सबको आनंद आयेगा।

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  3. वाह वाह क्या बात है। बहुत खूब।

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  4. Wah beautifully written. The selection of words and expression, both are excellent! Very nice dear Mausa ji. Love you

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    1. आपका अनेक धन्यवाद जज साहिबा, मेरी लेखनी की उन्मुक्त हृद्य से भूरी भूरी प्रशंसा के लिये।

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    2. बेटी,
      ईश्वर से प्रेम करो,दाम नहीं कुछ लगते हैं।
      आपके निर्मल हृद्य में ही पांडुरंग बसते हैं।
      आप जैसी औलाद को हर मां बाप तरसते हैं।

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  5. Aww. This is really emotional Mausa ji😊. Thank you for your blessings at every step. Stay safe. Sabko mera pyaar..
    Regards

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  6. You are the best..aise achhe lekh likhte raho😊

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  7. You are the best..aise achhe lekh likhte raho hume bahur pasand aate hain😊

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