संसार
जीते जी जिसे अपने पास नहीं रखना चाहा, यहां से ले जाओ, इन्हें संभालना बस की बात नहीं। थोड़ा स्वभाव चिड़चिड़ा हो ही जाता है बुढ़ापे में। एक कहे हमारा कोई लेना देना नहीं, तुम्ही देखो, और भी जाने क्या क्या सुनना पड़ा था। उन्होनें अपने सारे फर्ज अच्छे से निभाये। जाने, परवरि़श में क्या चूक हुई।
क्या अजब बात है, उनकी प्राण विहीन फोटो पर पुष्पार्पण और अश्रू बह रहे हैं। इस दोमुहे संसार को देखकर आँसू आँखों में ही गुम हैं। यह प्रेम, प्रीत, कोई समझाये।
तेरी माया तू ही जाने।
क्या अजब बात है, उनकी प्राण विहीन फोटो पर पुष्पार्पण और अश्रू बह रहे हैं। इस दोमुहे संसार को देखकर आँसू आँखों में ही गुम हैं। यह प्रेम, प्रीत, कोई समझाये।
तेरी माया तू ही जाने।
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प्राणघातक गंभीर रोग से पीड़ित को कोई कुटिल हंसी में कहे कि सब कर्मों के फल हैं यहीं भोग कर जाना पड़ेगा। वह बीमार का हाल जानने आया है। ऐसे भी क्या मनमुटाव, जो असाघ्य रोगी के मुंह पर ही कटु शब्दों के रुप में ज़हर घोलें?
जब बीमार की जीवन लीला समाप्त हो गई तब वही, दि्वंगत आत्मा की शांति के लिये कबीर वाणी सुनाते हैं कि-
एैसी बानी बोलिये, मन का आपा खोय।
औरन को शीतल करै, आपौ शीतल होय।
तेरी माया तू ही जाने।
प्राणघातक गंभीर रोग से पीड़ित को कोई कुटिल हंसी में कहे कि सब कर्मों के फल हैं यहीं भोग कर जाना पड़ेगा। वह बीमार का हाल जानने आया है। ऐसे भी क्या मनमुटाव, जो असाघ्य रोगी के मुंह पर ही कटु शब्दों के रुप में ज़हर घोलें?
जब बीमार की जीवन लीला समाप्त हो गई तब वही, दि्वंगत आत्मा की शांति के लिये कबीर वाणी सुनाते हैं कि-
एैसी बानी बोलिये, मन का आपा खोय।
औरन को शीतल करै, आपौ शीतल होय।
तेरी माया तू ही जाने।
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बूढ़ा होना ही सौ बीमारी के बराबर होता है, ऊपर से थोड़ा वहमी हो तो और भी मुश्किल। बूढ़ों को उसके बच्चों को दिये संस्कार ही रोटी खिलाते हैं। वह, अगल पड़े अपने मां बाप से मिलने जाता, महीने बीस दिन में।
वे इसी लायक हैं, कहकर पत्नी ताने मारती। शायद इसी दुख में वह पीने भी लगा था। इस तरह कई साल गुजर गये। वह कहती कि तु मरे तो मुझे चैन मिले। और एक दिन वह चल ही बसा, सबकी जरुरतेंं पूरी करते करते।
वे इसी लायक हैं, कहकर पत्नी ताने मारती। शायद इसी दुख में वह पीने भी लगा था। इस तरह कई साल गुजर गये। वह कहती कि तु मरे तो मुझे चैन मिले। और एक दिन वह चल ही बसा, सबकी जरुरतेंं पूरी करते करते।
परिवार से प्यार बहुत था। बेटा, बेटियों को नैनों में बिठाकर रखता था। गजब है, मुखाग्नि देने वाला उसका बेटा कहता है कि पढ़ा लिखा दिया तो क्या नया काम कर दिया? ये तो सभी करते हैं, अपने बच्चों के लिये। और ऐसा क्या कर दिया? तेरी माया तू ही जाने।
क्या सोव गफ़लत के अंदर, जाग जाग उठ जाग रे
और बात तेरे काम न आवेै, रमतां के संग लाग रे
'भक्त कबीर'
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दोस्त से बड़ी कोई हस्ती नहीं होती। इसीलिये दो + हस्ती को मिलाकर ही दोस्ती बना होगा। ऐसा दौर भी आया होगा जब, ये दोस्ती हम नहीं छोड़ेंगे, तोड़ेंगे दम मगर तेरा साथ न छोड़ेंगे, जैसे अनगिनत गाने साथ गाये होंगे। आज कहां हैं हम और कहां हैं वो।
तेरी माया तू ही जाने।
तेरी माया तू ही जाने।
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वृद्धावस्था भी मति पर कैसे डाका डालती है कि आदमी अपनी प्राण प्रिय पत्नी, बेटे एवं बेटियों तक का नाम भूल जाता है। गजब की बात है कि मां बाप और भाई बहनों के नाम याद हैं।
नहीं पहचानते, कि मेरा नाम क्या है, और मैं उनका बेटा हूँ, लेकिन जब पूछो कि आपके भाई बहनों के नाम क्या हैं?, गावं का नाम क्या है? तो सभी नाम व बातें बखुबी याद हैं।
तेरी माया तू ही जाने।
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नहीं पहचानते, कि मेरा नाम क्या है, और मैं उनका बेटा हूँ, लेकिन जब पूछो कि आपके भाई बहनों के नाम क्या हैं?, गावं का नाम क्या है? तो सभी नाम व बातें बखुबी याद हैं।
तेरी माया तू ही जाने।
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Eesi ka naam jindgi hai. Eenhi sab baaton ko dekh sunkar ham spirituality ki taraf jaate hain. Shaayad ye sab maanav apne sanskaro ke hee kaaran karata ya bolta hai.
ReplyDeleteआप सही फरमाते हैं।
ReplyDeleteऊँचा मंदिर देख के, कहां लगाया मोह
सब नशा उठ जायेगा रे,नितानंद जब धोये।