सामाजिक दूरी
इस मतलबी दुनिया में अधिकांश लोग केवल अपने मतलब के लिये किसी से रिश्ता रखते हैं या बनाते हैं। यूँ ही कोई किसी से बात भी नहीं करता। किसी के पास न तो समय है दूसरों के लिए और न जरुरत ही समझते हैं। अब कल ही की बात है, बचपन से बहुत प्यार करने वाले एक बेहद नजदिकी ने एक बार मुझे देखा, वैसे ही मैनें पलकें झुका कर उन्हें प्रणाम किया इतनी देर में उनके कदम मेरे आगे से बढ़ चुके थे। काफी हैरानी हुई और दुख भी कि मुझे बचपन से लेकर जवान होने तक उन्ही से ढ़ेर सारा प्यार मिला था। क्या कोई इस तरह की उम्मीद की कल्पना भी कर सकता है भला?
कोरोना महामारी काल में एक स्लोगन है, जो दवा की मानिंद है और वह है 'शोश्यल डिसटैंसिगं'। वैसे 'आपस में दो गज की दूरी बहुत जरुरी', यह कथन कहीं ज्यादा सारगर्भित है।
पहले ही शोश्यल डिसटैंसिगं है, पहले की तरह आजकल कब कोई किसी के पास जाता है या आता है। कहां वह उठ बैठ है। असल में समाज में डिसटैंस इतना बढ़ गया है की समाज का स्वास्थ्य बिगडने लगा है। रिश्ते खोखले प्रतीत होने लगे हैं। कोई किसी के दुख में साथ नहीं देता। दुख में सभी अकेले हैं। उसी के हालात पर मरने छोड़ दिया जाता है।
सभी अपने से मतलब रखते हैं, रही सही भद इस मोबाईल ने पीट दी, दूर से ही किसी से भी बात कर लेते हैं। आज से 15-20 साल पहले तक दुख- सुख की बात हमारे बुजुर्ग लोग आमने सामने बैठ कर किया करते थे।
जब उनकी बातें सुनते तो लगता था कि घर में स्वर्ग उतर आया हो। कोई किसी कहावत का सहारा लेकर कुछ कहता, तो दूसरा किंग्द्वन्ती के द्वारा अपनी बात रखता। कोई हाल ही में घटी फलां की प्रिय अथवा अप्रिय घटना को सुनाने लगता।
वाक्ई, हमारे दिमागों में जो नफरत, बैर की फफूंद लगी है, वह तो इस महामारी से भी ज्यादा खतरनाक नजर आती है। जो समय के साथ-साथ और बढ़ती है। महामारी तो कुछ समय की ही है, शायद स्वतः खत्म भी हो जाये।
इतना बैर तो दशानन रावण को भी न होगा जितना आजकल छोटी-सी बात पर हो जाता है। यदि हम किसी बात को आज सुलझा लें तो अच्छा है, अन्यथा दीर्घकाल में वह गलतफ़हमी, विकट रुप ले सकती है। इसलिये बुद्धिमान व्यक्ति बिना समय गंवाये बातचीत का रास्ता ही उत्तम समझते हैं।
कुछ लोग क्यों इतने नाशुक्रे हो गये हैं? कि वे स्वंय को ही सबसे बड़ा समझने लगते हैं। वे नहीं जानते कि जर्रे जर्रे में वही है जिसे हम सुप्रीम पॉवर कहते हैं चाहे कोई किसी नाम से भी पुकारे। आजकल उसी पॉवर की चोट समस्त मानव जाती पर पड़ रही है, क्या चोट मारने वाला दिखाई दे रहा है? नहीं ना!
जिसके आगे दूनिया की सारी शक्तियां कुंद पड़ गईं और आधुनिक चिकित्सा विज्ञान मौन। विषाणु (वायरस) कैसे निर्मित हुआ इसका भेद नही है।
विषाणु का भेद लगे न लगे लेकिन आओ जगत प्रेमियो उसकी बंदगी करें उसका भेद पायें, जो पांच तत्व से बनाकर इस जगत में लाया है और एक दिन इसमें ही मिला भी देगा। ऊं शान्ति
बिलकुल ठीक कहा भाई आपने .
ReplyDeleteधन्यवाद जी,
Deleteवैसे आप के नाम से प्रतीत होता है कि आप दक्षिण भारतीय हैं, बावजूद इसके आप हिन्दी पढ़ भी लेते हैं और लिखना भी जानते हैं। हिन्दी भाषा के लिए शुभ संकेत है।
धन्यवाद् जी .मैं एक भारतीय हूँ . हिंदी हमारा राष्ट्रभाषा हैं .
ReplyDeleteBahut achcha topic Liya hai. Aaj ke samay ko batata hai.
ReplyDeleteAap ji ki prashansha karta hun jo aapne apna kimty samay nikalkar isse padha aur saraha.
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