Tuesday, December 16, 2025

 मंज़िल के क़रीब आ गई है किस्तियाँ अपनी 

वो आँखों से दूर जाने को बेताब हैं तभी

कान भी सुना अनसुना करने लगे सभी 


मंज़िल के क़रीब आ गई है किस्तियाँ अपनी 


साहिल भी मिल मिल के छूट गए सभी 

पुख्ता सा किनारा मिल ना सका कभी 


हम दिलों के जादूगर भले ना सही ऐ सूरज 

दिलों का रफ़ू , मुक्कमल मर्ज़ख़ाना ए हज 


मंज़िल के क़रीब आ गई है किस्तियाँ अपनी 


है चिंगारी जो सुलगती रही ताउम्र, उसे थोड़ी सी हवा दे 

ना कहोगे ए दोस्त फिर कभी की अब ये ,अब वो ,दवा दे 

एचबीडी प्यारे दुलारे अरुण बुड़ाकोटी 😁🙏🥂

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