मंज़िल के क़रीब आ गई है किस्तियाँ अपनी
वो आँखों से दूर जाने को बेताब हैं तभी
कान भी सुना अनसुना करने लगे सभी
मंज़िल के क़रीब आ गई है किस्तियाँ अपनी
साहिल भी मिल मिल के छूट गए सभी
पुख्ता सा किनारा मिल ना सका कभी
हम दिलों के जादूगर भले ना सही ऐ सूरज
दिलों का रफ़ू , मुक्कमल मर्ज़ख़ाना ए हज
मंज़िल के क़रीब आ गई है किस्तियाँ अपनी
है चिंगारी जो सुलगती रही ताउम्र, उसे थोड़ी सी हवा दे
ना कहोगे ए दोस्त फिर कभी की अब ये ,अब वो ,दवा दे
एचबीडी प्यारे दुलारे अरुण बुड़ाकोटी 😁🙏🥂
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