Sunday, March 15, 2020

थोड़ा सा



थोड़ा सा

रोते बिलखते सारे, हम दुनिया में भटक रहे हैं

रोग ये कैसा आया प्रभु, मन डर से चटक रहे हैं

सभा- सम्मेलन ब्याह और शादी सब लटक रहे हैं

धोलें हाथ बारंबार फिर भोजन आदी सटक रहें हैं

मौसम है बदला, हो दर्द, जब कुछ गटक रहे हैं

हल खोजेंगे वैज्ञानिक जल्दी, थोड़ा सा अटक रहे हैं


मेरे दोस्त कहते हैं सारे, खा-पी के मरोना

फाईनली मरने से पहले ही, मर-मर के डरोना

राजेश कुमार पूनिया- दीप

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