Tuesday, March 17, 2020

नई सुबह


नई सुबह

    कहते थे डिंपी जिसे  इतनी बड़ी कब हो गई
  वही बचपन की डिंपी अब रुपम जज हो गई

सालो तक मेहनत की तब नीदं उसकी खो गई
देखते ही देखते सोलह से छब्बीस कब हो गई

  कहते थे डिंपी जिसे  इतनी बड़ी कब हो गई
  वही बचपन की डिंपी अब रुपम जज हो गई

कभी भाई बहन की गोदी मे सो गई 
वही आज डिंपी से जज रुपम हो गई

  कहते थे डिंपी जिसे  इतनी बड़ी कब हो गई
  वही बचपन की डिंपी अब रुपम जज हो गई

रुपम अनुपम काम कर गई
मात पितू की रुपम शान बन गई

  कहते थे डिंपी जिसे  इतनी बड़ी कब हो गई
  वही बचपन की डिंपी अब रुपम जज हो गई

'अन्याय से मुक्ति' नारा, अब गरीब की सुबह हो गई 
'शिक्षित बनो और संघर्ष करो', यह रेस  शुरु हो गई 

  कहते थे डिंपी जिसे  इतनी बड़ी कब हो गई
  वही बचपन की डिंपी अब रुपम जज हो गई

राजेश कुमार पूनिया -दीप

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