Friday, January 25, 2019

रिश्ते-नाते

रिश्ते-नाते

24.01.2019


ये बात (1980-85) की है जब सभी बच्चे क्रिकेट,(बैट-बाल) गुल्ली डंडा, पिठ्ठू, स्टापू, लुका-छिप्पी इत्यादि खेलों के बहुत शौकीन थे, ना घर में टी.वी.,  टेलीफोन था ना ही फ्रीज़ आदि घर में कुछ ही चीजें होती थी जैसे  पलंग (दिवान), दो चार कुर्सीयां, मुढ्ढे, बक्सा, सन्दूक वगैरह और रसोई में अंगीठी, स्टोव  सिलबट्टा, हमाम-दस्ता जैसी बहुत सी चीजें हुआ करती थी,  कभी कोई घर आता तो  मन ये सोचकर खुशी से नाच उठता  कि मेरे लिए कुछ मिठाई, खिलोने या नये नये कपड़े आयें होगें।  मेरे परिवार के सदस्य  दिन भर आवभागवत में लगे रहते,  ओर मैं बच्चों के साथ खेलते रहता,  जब मुझे प्यास या भूख लगती तो में घर आता और माँ  पिताजी मुझसे कहते की राजा बेटा कहाँ गया था, देख तेरे  मामा मामी या चाचा जी,  ताऊ  जी तेरे लिये कितना अच्छा खिलोना या चीज लायें है।

       गाँव से चाचा जी, ताऊ जी देशी घी का चूरमा ,नूणी घी, सीत,(लस्सी) गरमियों में पील(अगूँर की तरह दिखता था लेकिन अलग ही स्वाद होता था), कचरी आदि लाते और गाँव में किसी का शादी ब्याह होता तो किसी न किसी के हाथ वो मिठाई जरुर घर आती थी, जिसमॆं पारम्परिक  जलेबी, लड्डू, इमरती, कभी कोई सुहाली लेकर आता एक बार तो कोई गुलगुले ही लेकर आ गया था  कभी घेवर, जोये(सेवियाँ) खाने को मिलतीं, सांठी, पवांड, संरसों की डाकलें, सरसों का साग, चने की टाट,बाजरे की सिरटीयां, गुड़, और भी कई प्रकार की चीजें लेकर आते थे सभी  रिश्तेदार।

      समय के साथ साथ रिश्ते नाते भी कहीं खो से गये, एैसा लगता है, आपसी भाईचारा, रिश्ते-नाते धीरे धीरे कम होते जा रहें हैं, कोई किसी के घर  तभी जाता है जब बेहद जरुरी काम हो  वरना यूँ ही मिलने-मिलाने वाले दिन तो बहुत पहले से गये।

        दरअसल,  मीडिया भी हमे रिश्तों से दूर कर रहा है क्योंकी हम उसी दुनिया  में जीने लगे हैं आमने सामने बात होती ही कहाँ है आजकल,  इसलिए  रिश्तों में पहले वाला प्यार प्रेम नही रहा, सभी के पास सारी सुख सुविधाएं हो गई हैं इसलिये औरों की जरुरत बेहद कम हो गई है। ऒम शान्ति

   




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