सर्वप्रथम, ब्लॉग से अवगत कराने के लिए भाई उन्नीकृृष्णन को अनेक धन्यवाद। यह सुखद अनुभव है कि मुझे अपनी दिल की बात इस प्लेटफार्म पर कहने का मोका मिल रहा है।सभी पाठकों को मेरा हाथ जोड़कर प्रणाम, अभिनन्दन।
दिनांक 22.01.2019
राजेश कुमार पूनिया,
आज हमे सब तरफ एक अनुभव होता है चाहे घर, दफ्तर, स्कूल, कॉलेज, बाज़ार, गांव , शहर या कोई भी जगह हो, कुछ ना कुछ ईच्छा सदैव बनी रहती है, शायद एक जगह है जहां कुछ देर के लिए हम ये कहते हैं कि "सब कुछ मिथ्या है" मन का ये भाव क्षण भर के लिए हमें संसार की हकीकत से रुबरु करा देता है ज्यों ही हम उस जगह से दूर होतें हैं जाने कैसे मन जगह-जगह डोलने लगता है। कई बार लगता है कि दुनिया में उस एक चीज के बिना रहा ही नहीं जा सकता, क्या कभी आपने सोचा है की वो कोन सी चीज है । शायद आपका जवाब होगा धन- दौलत, मगर में बात कर रहा हुँ किसी ओर की क्या है वह फिर से सोचो जरा।
हमें जो सदा ईच्छा है वह है आनन्द की , हम सभी आनन्द की तलाश में सारा समय बिता देते हैं कभी हम खुश हुए कभी दुखी हुए यूँ ही सारा जीवन निकल गया लेकिन वो आनन्द नहीं मिला जो सदा बना रहे लगता है कि वो सारी इच्छायें फिजूल थीं, जिन्हे ढूंढा किये। जब हम बच्चे हुआ करते थे उन दिनों हमें मां के हाथ की सारी चीजें परम सुख एवं आनन्द देती थी जबकि हमें धन-दौलत क्या है पता भी नहीं था, सवाल उठता है तो क्या हमें वह आनन्द केवल मां के वात्सल्य के कारण मिला या जो माँ हमें नो महीने अपने कोख में रखती है उस सम्बन्ध को हम सदा महसुस करते रहते हैं इसी कारण हम सभी अपनी माँ को ताउम्र याद करते रहते हैं इस दुनिया को सदा सदा के लिए छोड़ जाने के बाद भी शायद यही कारण है कि हमें अपनी माँ का स्मरण मात्र होने से ही एक नई सी दुनिया का नजारा होने लगता है उन दिनों की याद करके मन भर सा जाता है जबकी हमें पता है कि अब वह नही आयेगी क्योंकी एक बार वहाँ जाने वाला कहां कोई आया है।
मेरे दोस्तो, प्यारो सुनो आज जिसे भी माँ रुपी आनन्द सुख मिल रहा हो अपने को धन्य मानना क्योंकी जब कभी यह माँ का आनन्द नहीं होगा, तब आप जान पायेंगे कि मै सही कह रहा हुँ। इसलिये आज ही अपनी माँ की देह को थो़ड़ा सा गुदगुदाना थोड़ा हाथ पावं दबाना और गोद में बैठकर वही आनन्द का अनुभव करना जो आप अपने बचपन में करते थे फिर देखिये कैसे आपके घर में आनन्द का डेरा बसेरा करने लगेगा। ऒम शान्ति
दिनांक 22.01.2019
राजेश कुमार पूनिया,
आज हमे सब तरफ एक अनुभव होता है चाहे घर, दफ्तर, स्कूल, कॉलेज, बाज़ार, गांव , शहर या कोई भी जगह हो, कुछ ना कुछ ईच्छा सदैव बनी रहती है, शायद एक जगह है जहां कुछ देर के लिए हम ये कहते हैं कि "सब कुछ मिथ्या है" मन का ये भाव क्षण भर के लिए हमें संसार की हकीकत से रुबरु करा देता है ज्यों ही हम उस जगह से दूर होतें हैं जाने कैसे मन जगह-जगह डोलने लगता है। कई बार लगता है कि दुनिया में उस एक चीज के बिना रहा ही नहीं जा सकता, क्या कभी आपने सोचा है की वो कोन सी चीज है । शायद आपका जवाब होगा धन- दौलत, मगर में बात कर रहा हुँ किसी ओर की क्या है वह फिर से सोचो जरा।
हमें जो सदा ईच्छा है वह है आनन्द की , हम सभी आनन्द की तलाश में सारा समय बिता देते हैं कभी हम खुश हुए कभी दुखी हुए यूँ ही सारा जीवन निकल गया लेकिन वो आनन्द नहीं मिला जो सदा बना रहे लगता है कि वो सारी इच्छायें फिजूल थीं, जिन्हे ढूंढा किये। जब हम बच्चे हुआ करते थे उन दिनों हमें मां के हाथ की सारी चीजें परम सुख एवं आनन्द देती थी जबकि हमें धन-दौलत क्या है पता भी नहीं था, सवाल उठता है तो क्या हमें वह आनन्द केवल मां के वात्सल्य के कारण मिला या जो माँ हमें नो महीने अपने कोख में रखती है उस सम्बन्ध को हम सदा महसुस करते रहते हैं इसी कारण हम सभी अपनी माँ को ताउम्र याद करते रहते हैं इस दुनिया को सदा सदा के लिए छोड़ जाने के बाद भी शायद यही कारण है कि हमें अपनी माँ का स्मरण मात्र होने से ही एक नई सी दुनिया का नजारा होने लगता है उन दिनों की याद करके मन भर सा जाता है जबकी हमें पता है कि अब वह नही आयेगी क्योंकी एक बार वहाँ जाने वाला कहां कोई आया है।
मेरे दोस्तो, प्यारो सुनो आज जिसे भी माँ रुपी आनन्द सुख मिल रहा हो अपने को धन्य मानना क्योंकी जब कभी यह माँ का आनन्द नहीं होगा, तब आप जान पायेंगे कि मै सही कह रहा हुँ। इसलिये आज ही अपनी माँ की देह को थो़ड़ा सा गुदगुदाना थोड़ा हाथ पावं दबाना और गोद में बैठकर वही आनन्द का अनुभव करना जो आप अपने बचपन में करते थे फिर देखिये कैसे आपके घर में आनन्द का डेरा बसेरा करने लगेगा। ऒम शान्ति
nice one
ReplyDelete