समय
समय न जाने क्या करा दे इसलिए समय से तो डर कर ही
रहना चाहिये। समय ही सबको अपनी गिरफ्त में लेता जाता है। वह सब देख और सुन रहा था
लेकिन रोकता या टोकता नहीं था। महाभारत में एक तरफ युद्धिष्ठर, भीम, अर्जुन, नकुल,
सहदेव एवं स्वयं भगवान श्रीकृष्ण थे वहीं दूसरी और दुर्योधन, कर्ण, कृपाचार्य, द्रौणाचार्य,
शकुनि, नीति-अनीति समझाने वाले संत तुल्य विदुर भी थे। फिर भी महाभारत
हो कर रही। समय बलवान है।
‘विनाश काले विपरीत
बुद्दि’। मुँह से वाणी निकालने से पहले सो बार तोलो फिर
बोलो। द्रौपदी ने गलत जुबान बोली, और धृतराष्ट्र ने जुबान ही ना खोली। भाभी द्वारा
व्यंग बहुत गंभीर परिणाम में परिणित हो गया।
वैसे तो व्यक्ति में धैर्य व सहनशीलता का गुण अनेक त्रासदियों को रोकने
का सामर्थ्य रखता है, लेकिन लोभ, मोह व अपना हित साधने हेतु किया गया धैर्य व सहनशीलता
बड़े दुख का कारण भी बन जाता है। यदि पिता, पुत्र-मोह में अन्धा हो जाये और उसके कुकृत्यों
के प्रति धैर्य व सहनशीलता अपनाये तो धर्म संकट की स्थित उत्पन होना स्वाभाविक ही है।
शकुनि द्वारा द्युतक्रिड़ा में जीती द्रौपदी का चीर-हरण, भरी सभा में होता रहा,
लेकिन धृतराष्ट्र समेत सभी सिर झुकाये बैठे रहे। स्वयं श्रीकृष्ण ने कहा है कि:
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।
अभ्युमत्थानधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥
भावार्थ : हे भारत। जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब ही मैं अपने
रुप को रचता हूँ, अर्थात साकार रुप से लोगों के सम्मुख प्रकट होता हूँ। सच ही है समय से अधिक ताकत किसी में नहीं होती।
महाभारत युद्ध 18 दिनों तक चला। उसके बाद तो समय ही गवाह है।
न पुत्रः पितरं जज्ञे पिता वा पुत्रमौरसम्। भ्राता
भ्रातरं तत्र स्वस्रीयं न च मातुलः।।
अर्थातः उस युद्ध में न पुत्र पिता को, न पिता पुत्र को, न भाई भाई
को, न मामा भांजे को, न मित्र मित्र को पहचानता था। दुनिया में न जाने राजा
महाराजाओं ने कितने ही युद्ध जीते-हारे। कोई धन जोड़कर मर गया। किसी को सूई की नोक
बराबर भी भूमि न देने का भूत सवार था। कोई दुसरों की रानी, या राजकुमारी को जीतने
के लिए युद्ध करते रहे। समय गवाह है आज कोई भी दुनिया में नहीं है। समय के आगे सभी
हारे। समय ने करवट ली तो पल में राजा से रंक बन गये। सत्यवादी राजा हरिशचन्द्र किसी
के घर में दास बनकर रह गये। राजा विक्रमादित्य, राजा नल, इत्यादि को हम इतिहास की
गाथाओं में पाते हैं।
इसलिए स्वयं को सबसे ज्यादा शक्तिशाली, बुद्धिमान समझना अज्ञानता है,
जो समय शेष है उसे सहज प्रेम से ही बितायें क्योंकि एक-एक पल काल के मुख में जा
रहा है। ये काया एक दिन पंचतत्व
में ही विलीन हो जायेगी। हम सभी अपने पद की गरिमा एवं मर्यादा का ख्याल रखते हुए
निष्पक्ष एवं ईमानदारी से अपना कर्तव्य का पालन करने की भरपूर कोशिश करनी चाहिये। समय
ही अंतिम निर्णय करेगा, यदि परिणाम अच्छा है तो साधन जो भी हो, the end
justifies the means।
राजेश कुमार पूनिया
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